<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947</id><updated>2011-11-21T04:23:55.608-08:00</updated><category term='यहां वहां जहां तहां'/><category term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><category term='तारीफ़'/><category term='कविता की कोशिश'/><category term='उपन्‍यास की तर्ज पर'/><category term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><category term='श्री गणेशाय नम:'/><category term='विचार ही जगह है'/><category term='दोस्‍तों का घर'/><category term='अंतिम यात्रा'/><category term='यह जो घर है'/><category term='चिंता की लकीरें'/><title type='text'>दिल्‍ली दरभंगा छोटी लाइन...</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>50</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8111631364424778330</id><published>2010-09-14T11:08:00.000-07:00</published><updated>2010-09-14T13:18:24.284-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यह जो घर है'/><title type='text'>हरा रंग और हरी बांसुरी</title><content type='html'>मेरी बेटी को हरा रंग बहुत पसंद है। यही वो रंग है, जिसे उसने ठीक ठीक पहचान लिया है। उसकी कोई भी फरमाइश हरे रंग से शुरू होती है। कैसा गुब्‍बारा चाहिए, ग्रीन वाला। वह उजले और लाल रंग को भी पहचान लेती है, लेकिन चाहिए उसे कोई चीज ग्रीन वाली ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के दिन उसे स्‍कूल से बांसुरी मिली। उसे फूंक कर आवाज निकालती है और कहती है, ये मेरा फ्ल्यूट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज दोपहर का किस्‍सा है। हम सब खाना खा रहे थे। वह खुद से अपना प्रिय घी-भात खा रही थी। अचानक बांसुरी की आवाज आयी। वह चौंकी। बालकनी की तरफ भागी। मैं भी पीछे पीछे गया। बांसुरी वाला दूर निकल गया था। मैंने जोर की हांक लगा कर उसे वापस बुलाया। दस रुपये से सौ रुपये की रेंज तक की बांसुरी उसके पास थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरे धागे से बंधी हुई एक बांसुरी थी। 80 रुपये की। वह जिद ठान बैठी कि उसे वही &lt;b&gt;ग्रीन वाली फ्ल्‍यूट&lt;/b&gt; चाहिए। पर उसकी फांक बड़ी थी और उसके लिए उसे फूंकना असंभव था। पर असल बात इस कड़की में उसकी जिद के लिए 80 रुपये खर्च करने से बचने की थी। मैं नीचे गया और दस रुपये की एक बांसुरी ले आया। पर हरे की जिद ने उसके पांव और आंख को पागल कर दिया। वह पांव पटकती रही। चीखती-चिल्‍लाती रही। रोती रही। आंख से आंसू आते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी मां ने दस रुपये की बांसुरी को हरे स्‍केच से रंगने की कोशिश की, लेकिन उसे सारा फ्रॉड समझ में आ गया। उसने रोना धोना जारी रखा कि उसे तो वही वाला फ्ल्‍यूट चाहिए - जिसमें ग्रीन वाला धागा बंधा था। वह अधीर हो रही थी और हम, उसे कैसे संभालें, इस फिक्र में नये नये तरीके सोच रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी आपाधापी में मुक्‍ता अपनी थाली बालकनी की दीवार पर छोड़ आयी। थोड़ी ही देर में देखा कि सुर का सुर अचानक बदला और वो हंसने लगी। उसकी नजर बालकनी की दीवार पर रखी मां की थाली पर थी, जिसके पास एक गिलहरी आ गयी थी और भात के दाने चुन चुन कर खा रही थी। वह खुश हो गयी और हरी वाली बांसुरी भूल गयी। हम सब फिर उसी एक दृश्‍य में रम गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुर की जिद, उसे मनाने की कोशिशें और फिर बिना मनाये हुए किसी और मामले में उसकी हंसी इन दिनों हमारे घर में रोजमर्रा का जीवन प्रसंग हो चला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/8mN6T82yS8s?hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/8mN6T82yS8s?hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8111631364424778330?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8111631364424778330/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8111631364424778330' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8111631364424778330'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8111631364424778330'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='हरा रंग और हरी बांसुरी'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-190757581408037229</id><published>2009-01-30T18:51:00.001-08:00</published><updated>2009-01-30T18:55:27.905-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;वहां जहां जीवित लोग काम करते हैं&lt;br /&gt;मुर्दा चुप्पी सी लगती है जबकि ऐसा नहीं कि लोगों ने बातें करनी बंद कर दी हैं&lt;br /&gt;उनके सामने अब भी रखी जाती हैं चाय की प्यालियां&lt;br /&gt;और वे उसे उठा कर पास पास हो लेते हैं&lt;br /&gt;एक दूसरे की ओर चेहरा करके&lt;br /&gt;देखते हैं ऐसे जैसे अब तक देखे गये चेहरे आज आखिरी बार देख रहे हों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब जानते हैं पूरा वाक्य लिखना और अधूरे वाक्य के बाद उनका दिमाग सुन्न पड़ जाता है&lt;br /&gt;एक लंबे अभ्यास की छाया में मशीनी रूप से पूरे होते हैं वाक्य&lt;br /&gt;और जिनमें अनुपस्थित रहता है एक सचेत नागरिक और निष्पक्ष पत्रकार&lt;br /&gt;ये अनुपस्थिति तो यूं भी रहती आयी है&lt;br /&gt;लेकिन हालात बताने के लिए&lt;br /&gt;तमाम विरोधाभास के बावजूद इसका ज़िक्र अभी ज्यादा जरूरी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचत के लिए कम की गयी रोशनी और बांटे गये अंधेरे में&lt;br /&gt;आशंका की आड़ी तिरछी रेखाएं स्पष्ट आकृति में ढल रही हैं&lt;br /&gt;सबके पास इसका हिसाब नहीं है कि दो महीने बाद मकान का किराया कैसे दिया जाएगा&lt;br /&gt;राशन दुकानदार से क्या कहा जाएगा&lt;br /&gt;और जिनके बच्चे हैं वे उनकी ज़िद को ढाढ़स के किस रूपक से कमज़ोर करेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं&lt;br /&gt;और उन्हें काम से निकाला नहीं गया है!&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-190757581408037229?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/190757581408037229/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=190757581408037229' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/190757581408037229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/190757581408037229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4324840892958032030</id><published>2008-11-30T10:35:00.000-08:00</published><updated>2008-12-02T01:09:18.909-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंता की लकीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>नागरिकनामा : न सिहरन, न अपराधबोध!</title><content type='html'>&lt;strong&gt;भोपाल।&lt;/strong&gt; 26 नवंबर की रात हम घर जल्‍दी आ गये थे। इंग्‍लैंड के साथ पांचवां वन डे मैच था। इंडिया की जीत के साथ ही हमने एनडीटीवी इंडिया लगा कर देखा कि इस पांचवें और तयशुदा जीत पर कैसी ख़बरें आ रही हैं। हम उन नये मुहावरों को जानने के लिए भी मैच ख़त्‍म होने के बाद टीवी चैनलों पर जाते हैं - जो किसी भी मीडिया एथिक्‍स से ऊपर गढ़े जाते हैं। जैसे कि धोनी का धमाल या फिर धोनी की टोली ने किया धराशायी। एनडीटीवी इंडिया पर क्रिकेट था - लेकिन शोर मचाने के लिए मशहूर स्‍टार न्‍यूज और आजतक पर मुंबई में ताबड़तोड़ गोलीबारी के फ्लैश आ रहे थे। मिनटों में बाक़ी के चैनलों ने भी मुंबई का रुख कर लिया। रात गहरा रही थी और मामला संगीन होता जा रहा था। हम वक्‍त पर सोये और सुबह के अखबार ने हमें बताया कि मुंबई में सौ जानें जा चुकी हैं और सुबह के साढ़े तीन बजे तक - जब अखबार का आखिरी पन्‍ना छपने जा रहा था - बेकाबू आतंकवादियों की दहशतगर्दी और एनएसजी कमांडोज़ का ऑपरेशन जारी था। हमने बिना किसी हड़बड़ी के टीवी ऑन किया। हां, अब भी आतंकवादियों पर काबू करने की कोशिशें जारी थीं। लोगों के मारे जाने का सिलसिला भी जारी था। हम सुबह नाश्‍ता नहीं करते (एक कटोरी कॉर्नफ्लेक्स खाने को आप भी नाश्‍ता नहीं ही कहेंगे) - इसलिए नाश्‍ता नहीं करने के रोज़मर्रे के साथ घर से निकले। साथ में लंचबॉक्‍स लेकर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑफिस पहुंचने तक मुंबई में सब कुछ चल रहा था। अब हम एक्‍साइटेड हुए - क्‍योंकि इस एक्‍साइटमेंट की काम को ज़रूरत थी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय में हम कुछ रोज़ से लड़के-लड़कियों के साथ इंट्रैक्‍ट करने के लिए जाते हैं - वही सब बीच-बीच में बताते रहे हैं कि &lt;a href="http://www.dailymotion.com/video/x6nwk5_a-wednesday-wwwbhejafrynet-part-1_music" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;‘अ वेन्‍सडे’&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; एक फिल्‍म आयी थी - आप देखते - कमाल की फिल्‍म थी। आम आदमी का गुस्‍सा, आतंकवाद, मीडिया के इस्‍तेमाल पर वैसी फिल्‍म अब तक नहीं बनी - वगैरा-वगैरा। हमारे न्‍यूज एडिटर महेश लिलोरिया ने जब कहा कि हम मुंबई में चल रहे मौजूदा घपले को रील लाइफ के ड्रामा से जोड़ते हैं, तो हमारे एक्‍साइटमेंट को एक आधार मिला। हम इस संतोष के साथ घर लौटे कि आज का अखबार हमने कमाल का निकाला है। कल लोग देखेंगे, तो वाह तो कहेंगे ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने दोपहर में लंच किया। रात में डिनर। सोने से पहले जब टीवी ऑफ कर रहे थे - मुंबई में आतंकी कार्रवाई पर काबू की कोशिश जारी थी। यानी 24 घंटे बाद भी सीन साफ नहीं था। हम सो गये, क्‍योंकि रोज़ रात को सो जाने का नियम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह हमने सबसे पहले अपना अखबार खोला और बार-बार उसे निहारा। अपने कमाल पर निहाल हुए - लेकिन एमएससी ईएम की एक छात्रा के फोन ने हतोत्‍साहित कर दिया। उसने ‘अ वेन्‍सडे’ के साथ मुंबई मामले की तुलना पर एतराज़ जाहिर किया था। हमने उससे कहा कि अपना एतराज़ लिख कर भेज दो - हम उसे भी छापेंगे। आज भी हम कॉर्नफ्लेक्‍स खाकर, लंच लेकर ऑफिस गये और न्‍यूज एडिटर से फीडबैक लिया। उन्‍होंने बताया कि आज का अखबार देख कर सब चकित हैं। मैंने उन्‍हें सुबह के फोन वाला फीडबैक दिया और उस छात्रा को दफ्तर भी बुला लिया। दोनों ने खूब बहस की और कोई एक दूसरे को कन्विंस नहीं कर सका। 28 नवंबर की शाम मा.च.प.सं.विवि की एक नौजवान टोली ने धावा बोला। उनके हाथों में कागज़ थे, जिन पर नीली स्‍याहियों में कुछ-कुछ दर्ज था। वो गुस्‍सा था - जो मुंबई हादसे के बाद उन्‍होंने जाहिर किया था। ज्‍यादातर लोग नेताओं को गोली मार देने के पक्ष में थे। हमने उन्‍हें भरोसा दिया कि अब आज तो नहीं, लेकिन कल जरूर उन सबके विचार अखबार में छापेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन सीधे घर लौटने का प्रोग्राम नहीं था। बीवी बेटी को लेकर न्‍यू मार्केट में थी। हम वहीं मिले। खरीदारी की। दुकानों में टीवी चैनल्स मुंबई का समाचार दे रहे थे। लोग गाहे-बगाहे, अपनी-अपनी दिलचस्‍पी के हिसाब से एक-आध बार उधर भी नज़रें दौड़ा लेते थे। इन्‍हीं लोगों में हम भी शामिल थे। हमने 28 नवंबर की शाम का डिनर बाहर ही किया। घर लौटे। सो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे दिन सुबह नौ बजे के आसपास जवानों के ऑपरेशंस तो ख़त्‍म हो चुके थे, लेकिन ताज में सर्च अभियान चल रहा था, जो अगले कुछ घंटों तक चलने वाला था। हम रोज़मर्रा की तरह ही विचलित थे, सहज थे, शांत थे - वो सब थे, जो लगभग रोज़ ही होते हैं - अलग-अलग वक्‍त पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे देश में बहस जारी थी। बीजेपी ने विज्ञापनों से देश के अखबार पाट दिये। आतंकवाद को कुचलना है, तो बीजेपी को वोट दो। बीजेपी की राजनीति देश की आवाज़ नहीं है, फिर भी देश 29 नवंबर को शिवराज पाटिल का इस्‍तीफा चाह रहा था। हमने 29 नवंबर को गुस्‍साये नौजवानों का जो स्‍पीकअप अखबार के पेज पर चस्‍पां किया - उसमें एक प्रमोद दुबे भी थे। उन्‍होंने लिखा, ‘मैं प्रमोद दुबे, भारत का एक साधारण नागरिक हूं, जो कहीं पदासीन, प्रतिष्ठित या मनोनीत नहीं है। साधारण हूं, इसलिए भारत की बढ़ती असाधारण समस्‍याओं के प्रति उदासीन हूं। तो भारत का यह साधारण नागरिक यह स्‍वीकार करता है कि वह व्‍यवस्‍था के साथ म्‍युचुअल कांस्पिरेसी में शरीक रहा है।’ मुझे लगा कि आज भी हम विचारोत्तेजना की स्‍टाइलशीट में अख़बार फिट करके घर लौटे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;30 नवंबर। दोपहर से पहले शिवराज पाटिल इस्‍तीफा दे चुके थे। हमने सुबह टीवी पर खबर नहीं देखी थी - एक फिल्‍म देखते रह गये थे। इस्‍तीफे की ख़बर मुझे श्रीकांत सिंह, एचओडी, एमएससी ईएम, मा.च.प.सं.विवि से मिली। हम दोनों विश्‍वविद्यालय के एमएससी ईएम के फ्रेशर्स डे में मौजूद थे। मेरी बेटी गोद में थी। उन्‍होंने एक लिफाफे में भरा मौद्रिक आशीर्वाद उसके हाथ में थमाया और मुझसे पूछा - आज इसका जन्‍मदिन है न। छात्र-छात्राओं ने मेरी बेटी के जन्‍मदिन पर भव्‍य आयोजन किया था। केक से लेकर बैलून, चमकी, समोसा, मिठाई तक। हम मियां-बीवी अंदर से भर आये थे। ये भरना आयोजन की भव्‍यता से गदगद होकर हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले तीन दिनों तक मुंबई में जो हुआ - हम एक बार भी नहीं रोये थे। बल्कि कई बार किसी न किसी बात पर ठठा कर हंसे थे। &lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-4324840892958032030?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/4324840892958032030/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=4324840892958032030' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4324840892958032030'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4324840892958032030'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='नागरिकनामा : न सिहरन, न अपराधबोध!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8992574641189536832</id><published>2008-09-08T07:47:00.000-07:00</published><updated>2008-09-08T08:13:05.096-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़?</title><content type='html'>अभी दिल्‍ली में हैं। बोरिया-बिस्‍तर समेटने में लगे हैं। पिछले 12 सालों में पटना के अलावा दिल्‍ली दूसरा ठौर रहा, जहां लगातार तीन साल कट गये। सामान सहेजते हुए मुक्‍ता कई सारे काग़ज़ हाथ में थमाती रहती है। पुराने काग़ज़ों का पुलिंदा आपकी कई यात्राओं तक साथ रहता है - जब त‍क उन काग़ज़ों का मर्म आपका पीछा करता रहता है। हर बार सामान समेटते हुए आप ऐसे काग़ज़ों में से खुद चुनते हैं कि अगले मोड़ तक इनमें कौन अब साथ रहेगा, और कौन-से काग़ज़ अब टुकड़ों में बदल देना है। किन यादों की अब आपको ज़रूरत नहीं। इन्‍हीं में से मज़्कूर आलम की एक कविता मिली। मज़्कूर मेरे साथ देवघर में काम करते थे। प्रभात ख़बर का देवघर संस्‍करण पत्रकारिता का उनका शुरुआती सफ़र रहा। इसके बाद वे नवबिहार, हिंदुस्‍तान दैनिक, आईनेक्‍स्‍ट से जुड़ते रहे और अलग होते रहे। फिलहाल लंबे समय से द संडे इंडियन के भोजपुरी संस्‍करण में हैं। उनकी ये कविता मैं भोपाल नहीं ले जा रहा। सादा काग़ज़ पर पूरी कविता टाइप्‍ड है - श्रीलिपि फॉन्‍ट में। हाथ से ऊपर लिखा है, &lt;em&gt;बड़े भाई अविनाश को।&lt;/em&gt; काग़ज़ के पीछे भी हाथ की लिखाई है, &lt;em&gt;माफ करेंगे, तुमसे अपनापन का बोध होता है न, लेकिन कह नहीं सकता; इसलिए लिख रहा हूं।&lt;/em&gt; कविता का शीर्षक है - &lt;strong&gt;कामरेड! तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़...&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;पुते हुए चेहरों में&lt;br /&gt;बिस्‍तर की सलवटों को&lt;br /&gt;कैमरा से खींचते या दिखाते,&lt;br /&gt;गर्मागर्म ख़बरों को परोसते&lt;br /&gt;व्‍यूवर्स बटोरते&lt;br /&gt;मेरा भारत महान, वंदे मातरम् का नारा लगाते&lt;br /&gt;तुम भी तो डायना की जान के ग्राहक तो नहीं बन जाओगे?&lt;br /&gt;तुम्‍हारी रातें गर्म और उमस भरी तो नहीं हो जाएंगी&lt;br /&gt;जो करवटों में बीतेंगी?&lt;br /&gt;गेट्स व अंबानी की मटकती चालों पर&lt;br /&gt;फिदा तो नहीं हो जाओगे?&lt;br /&gt;सभ्‍यता व संस्‍कृति की संचार क्रांति पर सवार तो नहीं हो जाओगे?&lt;br /&gt;भूख, अकाल और विस्‍थापितों पर&lt;br /&gt;क्‍या तब भी पैन होती रहेंगी तुम्‍हारी निगाहें?&lt;br /&gt;बाढ़ के शब्‍दचित्रों को ढाल सकोगे रूपक में?&lt;br /&gt;कहीं तुम भी बाज़ीगर तो नहीं बन जाओगे&lt;br /&gt;आंखों के इशारे से सत्ता पलटने वाले मर्डोक की तरह?&lt;br /&gt;कहीं ऐसा न हो&lt;br /&gt;व्‍यवस्‍था परिवर्तन को लात मारकर भेज दो परिधि पर&lt;br /&gt;और छोड़ दो उसे अंतरिक्ष में ज़मीन का चक्‍कर लगाने के लिए&lt;br /&gt;कि वह ख़्वाब ज़‍िंदा भी रहे&lt;br /&gt;और उस पर गुरुत्‍वाकर्षण बल भी न लगे&lt;br /&gt;पर सुविधा परिवर्तन होता रहे,&lt;br /&gt;बाज़ार के खनकते व खनखनाते कोलाहल में&lt;br /&gt;जहां बिकने को बहुत कुछ है&lt;br /&gt;और बहुत भारी है ख़रीदारों की जेब&lt;br /&gt;वहां बिकने वाली ख़बरों के बीच&lt;br /&gt;बचा सकोगे अपने आप को?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामरेड&lt;br /&gt;तुम सुन रहे हो न मेरी आवाज़?&lt;br /&gt;तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़?&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;ये कविता मज़्कूर ने जब बस्‍ते में रखी होगी, तब मुझे शायद पता नहीं होगा। वो भावुक लड़का है और मैं उसका लिखा नहीं पढ़ता। खास कर व्‍यक्तिगत रूप से लिखी उसकी पातियां। क्‍योंकि संवेदना के किसी पचड़े में पड़ कर मैं खुद को दुखी नहीं करना चाहता। अब सुखी रहना चाहता हूं। लेकिन सफ़र की तैयारी में मिलने वाले पुराने काग़ज़ पुराना दुख दोहरा देते हैं। मज़्कूर ये कविता मैंने आज पहली बार पढ़ी।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8992574641189536832?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8992574641189536832/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8992574641189536832' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8992574641189536832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8992574641189536832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़?'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-7711832227487485946</id><published>2008-08-29T02:13:00.000-07:00</published><updated>2008-08-29T02:45:46.201-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंतिम यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं</title><content type='html'>&lt;b&gt;मुशायरे&lt;/b&gt; कभी सुना करते थे। साइकिल पर चढ़ कर मोराबादी से हरमू कॉलोनी तक जाने का जुनून अब तक ज़ेहन में है। ये रांची की बात है। बाद में शहीद चौक के पास जिला स्‍कूल में भी एक कवि सम्‍मेलन हुआ था - जिसमें उन दिनों शहर में अच्‍छी खासी चर्चा पाने वाले एक हास्‍य कवि ने पत्‍नी चालीसा का पाठ किया था। एक बार बेगूसराय में केडी झा और प्रदीप बिहारी के सौजन्‍य से हमने भी अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन में शिरकत की थी, जिसमें ज्‍यादातर आस-पड़ोस के कवि थे। अखिल भारतीयता के नाम पर यश मालवीय आये थे, जिन्‍होंने मेरी गुजारिश पर सुनाया था - &lt;i&gt;कहो सदाशिव कैसे हो।&lt;/i&gt; ज्‍यादातर कवि सम्‍मेलन बस ऐसे ही हुआ करते थे। कोई दरभंगा का दुष्‍यंत आ जाता था, तो कोई समस्‍तीपुर के साहिर आ जाते थे। असल मुशायरे में जाना एनडीटीवी की नौकरी के पहले साल में हुआ। कुमार संजॉय सिंह ले गये थे, जो एनडीटीवी इंडिया पर &lt;i&gt;अर्ज किया है&lt;/i&gt; के प्रस्‍तोता थे। वसीम बरेलवी और खातिर गजनवी को वहां सुना। खातिर गजनवी की मौत हाल ही में हुई। उन्‍होंने सुनाया था, &lt;i&gt;गो जरा सी बात पर बरसों के याराने गये। लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गये।&lt;/i&gt; उस मुशायरे का जिक्र एक आर्टिकल में मैंने किया था, जो &lt;a href="http://hansmonthly.com" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;हंस&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; में छपा। मैंने लिख दिया था कि चवन्‍नी छाप शायरों की सोहबत में रहने वाले संजॉय सिंह मुझे इस शानदार मुशायरे में ले गये थे। चवन्‍नी छाप वाली बात पर संजॉय जी से जो झगड़ा हुआ, वो आज तक जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गालिब पर एक समारोह था, बल्‍लीमारान में - तब एक मुशायरा हुआ। वो पहला मुशायरा था, जिसमें शुरू से आखिर तक बैठकर हमारी रात गुज़री। मेरा दोस्‍त और मै‍थिली-हिंदी में कविताएं-आलोचना लिखने वाला पंकज पराशर साथ था और जमशेदपुर की मेरी परिचित रश्मि भी थी, जिन्‍हें मैं अपने साथ ले गया था। या ये भी हुआ होगा कि वे मुझे अपने साथ ले गये होंगे - याद नहीं। मुनव्‍वर राना, गोपालदास नीरज, बाल कवि बैरागी, निदा फाजली सब थे। लेकिन जिस एक शख्सियत की वजह से मैं यहां मुशायरों के जिक्र में उलझा हुआ हूं, वे थे &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ahmed_Faraz" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;अहमद फराज़&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;। अभी अभी अपने चाहने वालों से हमेशा के लिए विदा हो चुके फराज़ साहब की गजल हमने टूटे हुए दिल के दिनों में खूब गाये हैं - &lt;i&gt;रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ। आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।&lt;/i&gt; अहमद फराज साहब ने बल्‍लीमारान में बहुत सारी गजलें सुनायीं। लेकिन एक गजल की याद हमेशा ताजा रहती है। वो मैं आप सबके लिए यहां पब्लिश कर रहा हूं।&lt;blockquote&gt;&lt;i&gt;सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं&lt;br /&gt;सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है रब्‍त है उस को खराब हालों से&lt;br /&gt;सो अपने आप को बर्बाद करके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है दर्द की गाहक है चश्‍मे नाज़ुक उसकी&lt;br /&gt;सो हम भी उसकी गली से गुज़रके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उस को भी है शेरो शायरी से शगफ&lt;br /&gt;सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं&lt;br /&gt;ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है रात उसे चांद तकता रहता है&lt;br /&gt;सितारे बामे फलक से उतरके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आंखें&lt;br /&gt;सुना है उसको हिरन दश्‍त भर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है दिन को उसे तितलियां सताती हैं&lt;br /&gt;सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है रात से बढ़ कर है काकुलें उसकी&lt;br /&gt;सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसकी सियह चश्‍मगी क़यामत है&lt;br /&gt;सो उसको सुर्माफ़रोश आंख भर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं&lt;br /&gt;सो हम बहार पर इल्‍ज़ाम धर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है आईना तमसाल है जबीं उसका&lt;br /&gt;जो सादा दिल हैं... बन संवर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में&lt;br /&gt;मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है चश्‍मे तसव्‍वुर से दश्‍ते इमकां में&lt;br /&gt;पलंग ज़ावे उस की कमर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं&lt;br /&gt;कि फूल अपनी क़बाएं कतर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो सर्व-क़द है मगर बे-गुले मुराद नहीं&lt;br /&gt;कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस एक निगाह से लुटता है क़ा‍फ़‍िला दिल का&lt;br /&gt;सो रह-रवाने तमन्‍ना भी डर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है उसके शबिस्‍तां से मुत्तसिल है बहिश्‍त&lt;br /&gt;मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं&lt;br /&gt;चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे&lt;br /&gt;कभी कभी दरो दीवार घर के देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानियां ही सही सब मुबालग़े ही सही&lt;br /&gt;अगर वो ख़्वाब है ताबीर करके देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जाएं&lt;br /&gt;फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-7711832227487485946?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/7711832227487485946/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=7711832227487485946' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7711832227487485946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7711832227487485946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/08/blog-post_29.html' title='चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-1536534258959047571</id><published>2008-08-23T06:46:00.000-07:00</published><updated>2008-08-23T07:05:47.224-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>देवता मेरे सपने चुराते हैं और महंथों को बेच आते हैं!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SLAXljXnBsI/AAAAAAAAC0E/Qwe2UNJYUu8/s1600-h/viyogi3.jpg" target="_blank"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SLAXljXnBsI/AAAAAAAAC0E/Qwe2UNJYUu8/s400/viyogi3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5237712300548753090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;i&gt;&lt;a href="http://mithila-mihir.blogspot.com/2007/05/blog-post.html" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;तारानंद वियोगी&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; मैथिली के बड़े कवि हैं। उनकी कविताओं का हिंदी में एक चयन अगले माह नयी किताब प्रकाशन से छपने वाला है। चयन और अनुवाद मेरा है। संकलन की भूमिका यहां प्रस्‍तुत है। साथ ही दो कविताएं भी। नोश फरमाएं।&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;तारानंद वियोगी&lt;/b&gt; की कविताएं मेरे लिए महज पाठ-सामग्री कभी नहीं रहीं, उन तमाम शब्‍दों की तरह जो अनगिनत लेखकों ने इजाद किये और जिन शब्‍दों ने हमारे लिए दुनिया को जानने-समझने वाले दरवाजे की सांकल उतारी। तारानंद की कविताओं ने मेरी निजी दुनिया का निर्माण किया है, जिसमें चलने-बोलने-सोचने और लिखने का तरीका शामिल है। मेरी पैदाइश के ठीक से अठारह बरस भी नहीं हुए थे, जब तारानंद से मेरा परिचय हुआ। मैं उस वक्‍त अभिव्‍यक्ति के खेत में उगा हुआ नवान्‍न था और वे हमारी भाषा को कहन की नयी गली में ले जाने वाले समर्थ साहित्यिक युवा। इस गली में परंपरा की झोपड़पट्टियां नहीं थीं, आधुनिकता के बनते हुए मकान थे। उस वक्‍त उनके पास विधाओं की कोई ऐसी सड़क नहीं थी, जिस पर वे दौड़ नहीं रहे थे। उनके अलावा मेरे पास उस वक्‍त बाबा नागार्जुन थे, जो सांसों की आखिरी तकलीफ से गुजर रहे थे और कभी कभार मेरे कागज पर थरथराती उंगलियों में कलम फंसाकर प्रसाद की तरह कुछ वर्ण खींच देते थे। सा‍हित्‍य की मेरी पाठशाला में वह पहली कक्षा थी, तो तारानंद वियोगी मेरे महाविद्यालय। मेरी अपनी आवारगी ने विश्‍वविद्यालय में दाखिल नहीं होने दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारानंद वियोगी महिषी के रहने वाले हैं। ये गांव बिहार के सहरसा जिले में पड़ता है। इसी गांव में शंकराचार्य से शास्‍त्रार्थ करने वाले मंडन मिश्र हुए और राजकमल चौधरी भी, जिनके हिंदी उपन्‍यासों और जिनकी मैथिली कहानियों ने आने वाली पीढ़‍ियों को एक नयी लीक, नया साहस दिया। महिषी में ही सिद्ध शक्तिपीठ तारास्‍थान है, जिसकी वजह से शहरी रहवासियों की भीड़ आये दिन जुटती रहती है। तारानंद की अपनी शख्सियत में महिषी के इन तीनों तत्‍वों का निचोड़ मौजूद है। एक सिरे से आप उनकी कविताएं पढ़‍िए, मंडन मिश्र का तर्क कौशल, राजकमल चौधरी का आधुनिक-बोध और तारास्‍थान की आस्‍था का त्रिकोण आपको हर जगह मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलनसार तारानंद एकांतिक भी हैं, जो उनकी अध्‍ययनशीलता को बनाये रखता है। वे संस्‍कृत के विद्यार्थी रहे हैं और अंग्रेजी की शतकाधिक पुस्‍तकें उन्‍होंने पढ़ी हैं। वे बचपन में अल्‍पकालिक चरवाहा भी रहे - बकरी चराते थे। वे उन समकालीन कवियों की तरह नहीं हैं, जिनके पांवों में हमेशा चप्‍पलें रहीं और जो संवेदना के कारोबार को एक शानदार सेल्‍समैन की तरह आगे बढ़ाना जानते हैं। उनका प्रिय श्‍लोक है - ईशावास्‍य मिदं सर्वम्। ईश्‍वर सभी जगह है। वो ईश्‍वर जो आपकी चालाकियों को उंगलियों पर गिन रहा है। वो ईश्‍वर जो आपके शार्टकट का हिसाब सहेज कर रख रहा है। इसलिए चाहे वो जीवन जीने का मोर्चा हो या कविता रचने का, ईमानदारी और पवित्रता तारानंद के लिए पहली शर्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संग्रह में उनकी जितनी भी कविताएं हैं, उन्‍हें जोड़ेंगे तो आपको उनका जीवनवृत्त मिलेगा। एक ऐसा जीवनवृत्त जिसमें जितनी मात्रा में संताप है, तो उम्‍मीद के आसार भी लगभग उतनी ही मात्रा में है। उनकी कविताएं सिर्फ दृश्‍य नहीं हैं - दर्शन हैं, जो जीने की नयी राह देते हैं। तारानंद वियोगी कविताएं मनुष्‍यता के विविध आयामों की चर्चा करती चलती है। खेमों-जातियों में बंटे समाज की नयी व्‍याख्‍या करती चलती है। सरकारी दफ़्तरों में फैले भ्रष्‍टाचार की तल्‍ख रिपोर्ट करती चलती है। ये तीन तथ्‍य मैं उनकी महज तीन कविताओं को सामने रख कर जाहिर कर रहा हूं - बुद्ध का दुख, ब्राह्मणों का गांव और गांधी जी। वरना जितनी कविताएं, उतने अर्थ। हर कविता इतिहास और समाजशास्‍त्र की पगडंडी पर अनोखी संवेदना के क़दमों से चलती हुई। इन कविताओं का अनुवाद मेरे लिए संभव नहीं था। ठीक उसी तरह जैसे किसी भी लोकभाषा के साहित्‍य का अनुवाद किसी दूसरी भाषा में संभव नहीं, अगर उस साहित्‍य की चेतना भाषाई मौलिकता में नहायी हुई हो। यानी ये कविताएं अपनी मूल भाषाई लय में जो कह रही हैं - सिर्फ उसके सारों का ये संकलन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिए तो यह उस काम की तरह है, जो अभी खत्‍म नहीं हुआ है और जो कायदे से शुरू भी नहीं हुआ है।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;div style="font-size:130%;"&gt;&lt;b&gt;ईशावास्यमिदंसर्वम्&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;समूचे ब्रह्मांड में फैले हैं देवता&lt;br /&gt;तीनों लोकों में चौदह भुवनों में दसों दिशाओं में&lt;br /&gt;जल में थल में अनिल अनल में&lt;br /&gt;ओह! कोई जगह खाली नहीं बची&lt;br /&gt;जहां आदमी सिर्फ अपने साथ हो सके&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तरस गया हूं तड़प रहा हूं एकांत के लिए&lt;br /&gt;लेकिन ये देवता! जीना हराम कर दिया है इन्होंने!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी पीता हूं&lt;br /&gt;तो बैक्टीरिया वायरस की तरह&lt;br /&gt;जाने कितने देवता मेरे आमाशय में पहुंच जाते हैं&lt;br /&gt;कैसे खाऊं अन्न?&lt;br /&gt;वृक्ष के फल भी शुद्ध नहीं हैं न मुरगी के अंडे&lt;br /&gt;जाने किस धूर्त्त ने इस मिलावट की शुरुआत की&lt;br /&gt;कि पांच हजार वर्षों से&lt;br /&gt;मेरा स्वास्थ्य चौपट चल रहा है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीलर की तरह ये&lt;br /&gt;अंडे बच्चे देते जा रहे हैं&lt;br /&gt;बढ़ती जा रही है मिलावट&lt;br /&gt;हराम होता जाता है आदमी का जीवन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी से प्रेमालाप तक नहीं कर सकता चुपचाप&lt;br /&gt;जाने कितने देवता&lt;br /&gt;टकटकी लगाकर&lt;br /&gt;घूरते रहते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना वीर्य तक नहीं बचा विशुद्ध&lt;br /&gt;कि हम वो बच्चे पैदा कर सकें&lt;br /&gt;जो सिर्फ हमारे हों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुख समझो मेरा दुख&lt;br /&gt;देवता मेरे सपने चुराते हैं&lt;br /&gt;और महंथों को बेच आते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-size:130%;"&gt;&lt;b&gt;त्वया समं यास्यति&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;बड़े तेजस्वी थे वह राजा&lt;br /&gt;मगर एक दिन चले गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े खूंखार थे&lt;br /&gt;थे बड़े मायावी&lt;br /&gt;एक और राजा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े मेधावी थे&lt;br /&gt;जाने कैसे सूंघ लेते थे ख़तरा&lt;br /&gt;और पैदा होने से पहले मार डालते थे&lt;br /&gt;मगर एक दिन&lt;br /&gt;खुद भी मार डाले गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और आये&lt;br /&gt;वह भगवान थे&lt;br /&gt;एक और आये&lt;br /&gt;वह शैतान थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समंदर को चूस लेने वाले आये&lt;br /&gt;सूरज को ढंक देने वाले आये&lt;br /&gt;कुछ घोड़ों पर कुछ बैलों पर&lt;br /&gt;कुछ गोलों पर कुछ थैलों पर&lt;br /&gt;कुछ खाली आये कुछ भरे हुए&lt;br /&gt;कुछ ज़िन्दा कुछ मरे हुए&lt;br /&gt;मगर सब गये&lt;br /&gt;सबके सब चले गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चमको बमको राजा&lt;br /&gt;अकड़ो पकड़ो&lt;br /&gt;जो चले गए वह तुम नहीं थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चलाओ गोलियां &lt;br /&gt;और स्वादो मछलियां &lt;br /&gt;चप्पा-चप्पा जमीन नपवा लो &lt;br /&gt;टके-टके पर लिख लो अपना नाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाओ गाओ राजा&lt;br /&gt;पीओ जीओ&lt;br /&gt;मस्ती करो राजा मस्ती &lt;br /&gt;दुश्मन के हिस्से जाए पस्ती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भरभराओ राजा&lt;br /&gt;मगर चरमराओ मत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बेबस धरती&lt;br /&gt;किसी के साथ गयी तो नहीं&lt;br /&gt;पर तुम्हारे साथ जाएगी&lt;br /&gt;पक्का जाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे साथ नहीं&lt;br /&gt;तो क्या ज़हन्नुम में जाएगी?&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-1536534258959047571?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/1536534258959047571/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=1536534258959047571' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1536534258959047571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1536534258959047571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/08/blog-post_23.html' title='देवता मेरे सपने चुराते हैं और महंथों को बेच आते हैं!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SLAXljXnBsI/AAAAAAAAC0E/Qwe2UNJYUu8/s72-c/viyogi3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-3036788602356626409</id><published>2008-08-19T23:44:00.000-07:00</published><updated>2008-08-19T23:49:12.074-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>अब मैं यहीं ठीक हूं</title><content type='html'>&lt;i&gt;एक गांव था जो कभी वही एक जगह थी जहां हम पहुंचना चाहते थे&lt;br /&gt;एक घर बनाना चाहते थे ज़‍िंदगी के आख़‍िरी वर्षों की योजना में खाली पड़ी कुल चार कट्ठा ज़मीन पर&lt;br /&gt;एक दालान का नक्‍शा भी था जहां खाट से लगी बेंत की एक छड़ी के बारे में हम सोचते थे&lt;br /&gt;बाबूजी के पास कुछ सालों में नयी डिजाइन की एक छड़ी आ जाती थी&lt;br /&gt;बाबा के पास एक छड़ी उस रंग की थी, जिसका नाम पीले और मटमैले के बीच कुछ हो सकता है&lt;br /&gt;उनके चलने की कुछ डूबती सी स्‍मृतियां हैं जिसमें सिर्फ़ आवाज़ें हैं&lt;br /&gt;खट खट खट एक लय में गुंथी हुई ध्‍वनि&lt;br /&gt;अक्‍सर अचानक नींद से हम जागते हैं जैसे वैसी ही खट खट अभी भी सीढ़‍ियों से चढ़ कर ऊपर तक आ रही है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही एक जगह थी, जहां जाकर हम रोना चाहते थे&lt;br /&gt;लगभग चीखते हुए आम के बगीचों के बीच खड़े होकर&lt;br /&gt;रुदन जो बगीचा ख़त्‍म होने के बाद नदी की धीमी धार से टकरा कर हम तक लौट आती&lt;br /&gt;सिर्फ़ हम जानते कि हम रोये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थकान और अपमान से भरी यात्राओं में बहुत देर तक हम सिर्फ़ गांव लौटने के बारे में सोचते रहे&lt;br /&gt;सोचते हुए हमने शहर में एक छत खरीदी&lt;br /&gt;सोचते हुए हमने नयी रिश्‍तेदारियों का जंगल खड़ा किया&lt;br /&gt;साचते हुए हमने तय किया कि ये दोस्‍त है ये दुश्‍मन ये ऐसा है जिससे कोई रिश्‍ता नहीं&lt;br /&gt;सोचते हुए ही हमने भुला दिये गांव के सारे के सारे चेहरे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन गूगल टॉक पर ललित मनोहर दास का आमंत्रण देख कर चौंके&lt;br /&gt;ऐसे नाम तो हमारे गांव में हुआ करते थे&lt;br /&gt;जैसे हमारे पिता का नाम लक्ष्‍मीकांत दास और उनके चचेरे भाई का नाम उदयकांत दास है&lt;br /&gt;स्‍वीकार के बाद का पहला संदेश एक आत्‍मीय संबोधन था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्‍ना चा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी इस बात की है कि इस संबोधन का मुझ पर कोई असर नहीं था&lt;br /&gt;इस बात की जानकारी और ज़‍िक्र के बावजूद कि संबोधन का स्रोत दरअसल गांव ही है&lt;br /&gt;वो एक लड़का जो मेरी ही तरह गांव से निकल कर अब भी गांव लौटने की बात सोच रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब मैं सोच रहा हूं एक दूसरे घर के बारे में&lt;br /&gt;जो बुंदेलखंड या पहाड़ के किसी खाली कस्‍बे में मुझे मिल जाता&lt;br /&gt;मंगल पर पानी की तस्‍वीरों के बाद&lt;br /&gt;एक वेबसाइट पर मामूली रकम पर&lt;br /&gt;अंतरिक्ष में ज़मीन खरीदने की इच्‍छा भी जाग रही है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनों के बगैर की गयी यात्रा में बहुत दूर तक साथ रहीं स्‍मृतियां&lt;br /&gt;जिसमें चेहरे थे और थे कुछ संबोधन&lt;br /&gt;सब छूट गया सब मिट गया अब सिर्फ़ मैं हूं&lt;br /&gt;मेरी उंगलियां कंप्‍यूटर पर चलती हैं आंखें स्‍क्रीन पर जमती हैं&lt;br /&gt;कोई दे जाता है चाय की एक प्‍याली बगल में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै कृतज्ञ हूं अपने वर्तमान का&lt;br /&gt;पुरानी तस्‍वीरों से भरा अलबम पिछली बार शहर बदलते हुए कहीं खो गया!&lt;/i&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-3036788602356626409?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/3036788602356626409/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=3036788602356626409' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3036788602356626409'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3036788602356626409'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/08/blog-post_19.html' title='अब मैं यहीं ठीक हूं'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-6229702223730541739</id><published>2008-08-15T03:49:00.000-07:00</published><updated>2008-08-15T04:02:56.692-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यहां वहां जहां तहां'/><title type='text'>पांच रुपये का चमकता सिक्‍का तब भी हमारी जेब में था</title><content type='html'>&lt;i&gt;&lt;b&gt;(&lt;a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/ज्ञानेन्द्रपति" target="_blank"&gt;ज्ञानेंद्रपति&lt;/a&gt; से क्षमायाचना सहित)&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौ बरस पहले भोपाल आया था। बारिश के दिन नहीं थे। दिन भर धूप चढ़ी रहती थी। चौराहों के पास दुकानों में पीले पोहे में धंसी हुई धनिया की छोटी-छोटी पत्तियां तब भी हमारी तरफ झांकती थीं। मुझे ज्ञानेंद्रपति ने सुबह सुबह बुला लिया था। इससे पहले हिंदी के इस शानदार कवि से मेरी एकमात्र मुलाकात बनारस जन संस्‍कृति मंच के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के दौरान 94 या 95 में हुई थी। मेरी कविताएं उन दिनों संभवा में छपी थीं, जिसके संपादक बिहार पुलिस सेवा के अधिकारी &lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/bihar/4_4_4000344_1.html" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;ध्रुवनारायण गुप्‍त&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; थे। दिन में हमारा परिचय ज्ञानेंद्रपति से हुआ, तो मैंने काफी आत्‍मविश्‍वास के साथ उन्‍हें बताया था कि मैं कवि हूं और मेरी कविताएं अमुक जगह छपी हैं। रात में कवि सम्‍मेलन था, जिसमें &lt;a href="http://anahadnaad.wordpress.com/2008/05/30/ashtabhuja-shukla-poem-kavijan-khoj-rahe-amaraaee/" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;अष्टभुजा शुक्‍ल&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; ने भी कविताएं पढ़ी थीं और ज्ञानेंद्र जी ने संभवा की कविताओं के जिक्र के साथ कविता पढ़ने के लिए मुझे मंच पर आमंत्रित किया था। मैंने एक कविता पढ़ी थी, मुझे आज भी याद है...&lt;blockquote&gt;&lt;i&gt;गे सजनी पोरुकों ने देलियउ साड़ी तोरा दिबाली मे&lt;br /&gt;छलहुं कतेक बदहाली मे... ना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभ घर सभ दरबज्‍जा गेलहुं&lt;br /&gt;सजनी नंगटे मुंह छिछिएलहुं&lt;br /&gt;तहियो बीतल पछिला दिन सभ सुनू अकाली मे&lt;br /&gt;छलहुं कतेक बदहाली मे... ना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;की होइ छई ई कालाजार&lt;br /&gt;बाबू छोड़ि‍ देलनि संसार&lt;br /&gt;आ हुन कर श्राद्ध केलहुं मां कें सोनक कनबाली मे&lt;br /&gt;छलहुं कतेक बदहाली मे... ना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछुए खेत हमर बांचल छल&lt;br /&gt;ओकरो एक सांझ लए बेचल&lt;br /&gt;आ सभटा सपना बहल दियादक घर कें नाली मे&lt;br /&gt;छलहुं कतेक बदहाली मे... ना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(प्रिय, माफ करना, पिछली दिवाली में भी मैं तुम्‍हारे लिए साड़ी नहीं ला सका। घर की माली हालत ठीक नहीं थी। सबके दरवाजे गया। सब जगह नंगा होना पड़ा। फिर भी दुख में ही दिन बीते। पता नहीं ये कालाजार क्‍या होता है कि पिता जी स्‍वर्गवासी हो गये। उनका श्राद्ध मां की सोने की कनबाली बेच कर करना पड़ा। थोड़े खेत बचे थे, उसे भी एक शाम की भूख के लिए बेच देना पड़ा। सारे सपने रिश्‍तेदारों के घर से निकलने वाली नाली में बह गये। प्रिय माफ करना, पिछली दिवाली में भी मैं तुम्‍हारे लिए साड़ी नहीं ला सका। घर की माली हालत ठीक नहीं थी।)&lt;/i&gt;&lt;/blockquote&gt;ये कविता उन दिनों दिल्‍ली से छपने वाले समकालीन जनमत के एक अंक में छपी। उन्‍हीं दिनों के परिचय का हवाला भोपाल में मिलने पर मैंने दिया, तो ज्ञानेंद्रपति पहचान गये। भोपाल &lt;a href="http://www.cseindia.org/" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;सीएसई&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; की फेलोशिप के चक्‍कर में आया था और &lt;a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/आग्नेय" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;आग्‍नेय जी&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; के कहने पर धर्मनिरपेक्षता पर आयोजित वृहद संवाद में रुक गया था। उन्‍होंने होटल में ठहरने का इंतजाम कर दिया था और आने-जाने का एसी किराया भी आवंटित किया था, जिसका एक बड़ा हिस्‍सा मैंने सेकंड क्‍लास स्‍लीपर में सफर करके बचा लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानेंद्रपति भोपाल स्‍टेशन के पास ही किसी होटल में रुके थे। सुबह उनके पास पहुंचा, तो करीब आठ बज रहे थे। वे बेसब्री से मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। हमदोनों निकले और लगभग पूरे दिन भोपाल के चक्‍कर काटते रहे। पैदल। रात हो गयी। जब घर लौटे तो पांव वैसे ही फूले हुए लग रहे थे, जैसे कांवर यात्रा से घर लौटे श्रद्धालुओं के पैर फूले हुए होते हैं। पार्क, मस्जिदों (जिनमें एक &lt;a href="http://naiebaraten.blogspot.com/2008_08_01_archive.html#7979412962666705760" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;ताजुल मस्जिद&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; भी थी), झीलों से गुजरते हुए भोपाल से गले तक भर गये और दूसरी सुबह ज्ञानेंद्रपति के पास जाने की हिम्‍मत नहीं हुई। वे आज भी मेरा इंतजार कर रहे हैं, लेकिन मैं उन्‍हें उतनी फुर्सत से आज तक नहीं मिला हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वाकया इसी बीच का है। उसी शाम हमसे एक भिखारी टकराया। हाथ मेरी जेब में चला गया। ज्ञानेंद्रपति ने मेरा हाथ पकड़‍ लिया। भिखारी को डांट कर भगाया और फिर मुझे बुरी तरह डांटा। कहा कि भीख देना कितना बड़ा अपराध है! उस शाम जेब के भीतर मेरी उंगलियों में फंसा पांच का सिक्‍का जेब में ही फिसल गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन आज इसी भोपाल में मैंने एक बच्‍ची को पांच का सिक्‍का थमाया। भास्‍कर के कॉर्पोरेट एडिटोरियल के स्‍थानीय संपादक मुकेश भूषण के साथ जब मैं एक रेस्‍टोरेंट से दोपहर का भोजन करके निकला, तो आठ-नौ साल की एक बच्‍ची मेरे पीछे-पीछे चलने लगी। मुझे लगा कि पद्मिनी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पद्मिनी यूनियन कार्बाइड की विनाशलीला में नष्‍ट हो गयी उड़‍िया बस्‍ती की वो बच्‍ची थी, जो अपने पिता के साथ भोपाल आयी थी और एक शाम घर के प्‍यारे तोते को पका कर घर के लोगों ने जब कई दिनों की अपनी भूख मिटायी, उसके अगले दिन से पद्मिनी बस्‍ती के दोस्‍त भाइयों के साथ रेलों में झाड़ू लगा कर पैसे जुटाने लगी। एक बार बनारस स्‍टेशन पर वो अकेली रह गयी, तो जिस्‍म के दलालों ने उसे वेश्‍या मंडी में पहुंचाना चाहा। लेकिन बहादुर पद्मिनी उन्‍हें चकमा देने में सफल हो गयी। पद्मिनी इन दिनों मेरी रूह में बसी हुई है, क्‍योंकि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dominique_Lapierre" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;डोमिनीक लापिएर&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; और जेवियर मोरो की किताब &lt;a href="http://namaste20matsu.blogspot.com/2005/06/blog-post_27.html" target="_blank"&gt;&lt;b&gt;भोपाल बारह बज कर पांच मिनट&lt;/b&gt;&lt;/a&gt; मेरे साथ हमेशा रह रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस बात में यकीन करता हूं कि किसी वंचित पर इस तरह दया दिखाने से कुछ भी नहीं बदलेगा। इसके बावजूद मैं इन्‍हें अब यूं ही सामान्‍य नजरों से नहीं देख सकूंगा। मेरे पांच रुपये इनकी किस्‍मत की तारीख नहीं लिखेंगे - लेकिन चंद मिनटों के लिए ही सही, किसी की आंखों में चमक और रोशनी और उम्‍मीद तो उतार ही सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैंने तय किया है कि अब मैं ज्ञानेंद्रपति की बात नहीं मानूंगा।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-6229702223730541739?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/6229702223730541739/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=6229702223730541739' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6229702223730541739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6229702223730541739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='पांच रुपये का चमकता सिक्‍का तब भी हमारी जेब में था'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8238864777233001076</id><published>2008-07-05T21:31:00.000-07:00</published><updated>2008-07-05T22:42:50.693-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तारीफ़'/><title type='text'>शुक्रिया कहने की इजाज़त चाहूंगा सर</title><content type='html'>&lt;a href="http://librarykvpattom.wordpress.com/2008/03/02/%E2%80%98teaching-profession-is-in-a-deep-crisis%E2%80%99/" target="_blank"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SHBSH7W_n_I/AAAAAAAACss/qVRXW01NehE/s200/Krishna+Kumar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5219762264269103090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;यह एक बड़े पुरस्‍कार की तरह है। आज जनसत्ता में शिक्षाशास्‍त्री और एनसीईआरटी के निदेशक &lt;strong&gt;कृष्‍ण कुमार&lt;/strong&gt; ने लिखने के रियाज़ में लगे मुझ जैसे अल्‍पज्ञात लेखक को तवज्‍जो दी है। पहले इसी ब्‍लॉग पर छपे &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/06/blog-post_21.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;रैंप पर अंतिम औरत का इतिहास&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; और बाद में जनसत्ता के ‘दुनिया मेरे आगे ’ स्‍तंभ में ‘वह आख़‍िरी औरत ’ शीर्षक से छपे निबंध को पढ़ कर उन्‍होंने मुझे फोन किया था। फोन पर उन्‍होंने जिस तरह की खुशी ज़ाहिर की, उसे बताना मेरे लिए असमंजस की तरह था। मुझे लगता था कि जो मेरे उल्‍लास, मेरी खुशी को ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू ’ के मुहावरे वाले झोले में नहीं रखेंगे, उन सबको मैंने बताया कि कृष्‍ण कुमार जी ने मुझे कंप्‍लीमेंट दिया है। बाद में मैंने पता लगा ही लिया कि &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_29.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अपूर्वानंद&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; से उन्‍होंने मेरा फोन नंबर जुटाया था। मैंने उन्‍हें याद दिलाया कि 97-98 के साल में कुछ दोपहरी और सांझ मैं आपके यहां आता था। लेकिन मिलने-जुलने को लेकर मेरे निरुत्‍साह में एक लंबा अरसा यूं ही गुज़र गया। कृष्‍ण कुमार जी ने जनसत्ता में फोन पर की गयी उस प्रशंसा को जिस तरह से सार्वजनिक किया है, उसे पढ़ कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। जिन शहरों में जनसत्ता नहीं जाता है और जो जनसत्ता के पाठक नहीं हैं - उनके लिए कृष्‍ण कुमार जी का आलेख मैं &lt;strong&gt;दिल्‍ली-दरभंगा छोटी लाइन&lt;/strong&gt; पर भी डाल रहा हूं।&lt;/em&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;मुक्ति की चाल&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/836630.cms" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कृष्‍ण कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हर शब्‍द&lt;/strong&gt; अपने भीतर एक छोटा-सा इतिहास समाये रहता है, यह बात मुझे मालूम थी, पर यह समानांतर सत्‍य - कि शब्‍द में भविष्‍य भी झिलमिलाता है - मेरे लिए इसी पखवाड़े खुला। इस अख़बार में ‘दुनिया मेरे आगे’ एक स्‍तंभ छपता है, जिसमें कभी-कभी कुछ ग़ैरनिष्‍कर्षी गद्य पढ़ने को मिल जाता है। आठ-दस दिन पहले इस स्‍तंभ के तहत अविनाश की टिप्‍पणी पढ़ कर उस ख़बर का खुलासा मेरे लिए थोड़ी देर से हुआ, जो कई दिन पहले अख़बारों में सचित्र आ चुकी थी। ख़बर उन औरतों के बारे में थी, जो सुलभ इंटरनेशनल की पहल और मदद से मैला उठाने के काम से हटायी जा सकी हैं। अलवर की ये महिलाएं संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा घोषित ‘सफाई वर्ष’ के अंतर्गत न्‍यूयार्क में होने वाले एक कार्यक्रम के लिए चुनी गयी हैं। इस कार्यक्रम का एक तरह का पूर्वाभ्‍यास, जो दिल्‍ली में हुआ, अविनाश के संक्षिप्‍त निबंध का विषय था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अविनाश के निबंध का शीर्षक ‘वह आख़‍िरी औरत’ सतह पर महात्‍मा गांधी के मशहूर उद्धरण की गूंज लिये था, जिसमें उन्‍होंने आख़‍िरी आदमी की फिक्र की ज़रूरत बतायी है। मगर शुरुआती पैरा सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम के मंच और अगला पैरा गांव को शहर से जोड़ने वाली कंकरीली पगडंडी पर बचपन में बाबूजी द्वारा देख लिये जाने के बारे में था। शेष लेख में उस कैटवॉक का चित्रण था, जो अलवर की महिलाओं ने भारत के विख्‍यात फैशन मॉडलों के साथ सीरीफोर्ट सभागार के मंच पर की। इंटरनेट पर विकीपीडिया देख कर अविनाश यह पता लगा चुके थे कि कैटवॉक उस नुमाइशी चाल के लिए इस्‍तेमाल किया जाने वाला शब्‍द है, जो कपड़ों के नये फैशन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित की जाती है। मैला ढोने जैसा काम करने वाली महिलाएं नीली साड़ी पहन कर, अमीर मॉडलों के साथ चलीं, फिर अमेरिका जाकर वहां भी कैटवॉक करेंगी। अविनाश ने इस प्रसंग की जटिलता को बड़ी संभली हुई तराश के साथ याद किया था। लेख के आख़‍िरी हिस्‍से में एक अधूरी खुशी के आंसू भी थे, एक बड़े-से अंधेरे की घुटन भी, और एकदम अंत में मेरे जैसे कस्‍बाई संस्‍कार वाले लोगों को महानगर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी राहत देता आया समोसा भी बदस्‍तूर मौजूद था। इस तरह वह लेख नहीं, पूरी दुनिया थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परसों वह दुनिया न्‍यूयार्क में साकार हुई। संयुक्‍त राष्‍ट्र के उच्‍च पदासीन अधिकारियों के सम्‍मुख वह कैटवॉक अपनी पूरी शोभा सहित संपन्‍न हुई। अलवर की औरतों का मुक्‍त गीत विश्‍व की समाचार एजेंसियों की ख़बर बना। अंतत: मेरा भी मन हुआ कि पुस्‍तकालय के वृहद शब्‍दकोश में कैटवॉक का अर्थ देखूं। फैशन परेड वाला अर्थ सबसे पहले दिया गया था, जिसके तहत मॉडल नये कपड़े पहने एक उठी हुई सतह पर दर्शकों और कैमरे के सामने चलती हैं। इसके बाद भी कई अर्थ दिये थे। मुझे उन सभी अर्थों को पढ़ना ज़रूरी लगा, क्‍योंकि बिल्लियों में मेरी दिलचस्‍पी बचपन से रही है। मैं यह जानने को उत्‍सुक था कि फैशन की दुनिया में बिल्‍ली कैसे शामिल हो गयी। भाषा के इतिहास में चले किसी अनोखे खेल के नियम समझने की जिज्ञासावश मैंने पत्‍नी से कहा कि वे शब्‍दकोश की महीन छपाई पढ़ें, क्‍योंकि मेरी आंखों में इतनी रोशनी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्‍दकोश में लिखा था कि ‘कैटवॉक’ मूलत: संकरे पुलनुमा ढांचे को कहा जाता था, जिसे निर्माणाधीन इमारतों में, जहाजों और रेलों में मज़दूरों और सफाई कर्मचारियों के लिए बनाया जाता है। लकड़ी, बांस या धातु का यह संकरा ढांचा ऊंचाई पर स्थित छज्‍जों या पानी की टंकियों तक पहुंचने में मदद करता है। टंकी साफ करके कर्मचारी के लौट आने के बाद ढांचा हटाया जा सकता है। इसे कैटवॉक कहते थे। पीछे बिल्‍ली की तरह संभल कर कदम रखने और चौकन्‍ना रहने की ज़रूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सघन अर्थछाया के आलोक में अलवर की मैला ढोने वाली औरतों का पहले दिल्‍ली, फिर न्‍यूयार्क में प्रायोजित कैटवॉक थोड़ा दूर तक देखा जा सकता है। फैशन मॉडलों के साथ कैटवॉक की उपयुक्‍तता प्रायोजकों को संभवत: इसलिए सूझी होगी, क्‍योंकि मैला ढोने से मुक्‍त किये गये ये इंसान नारी थे, पुरुष नहीं। कपड़ों के नये फैशन का विज्ञापन करने वाली कैटवॉक मुख्‍यत: औरतों की परेड रही है, आदमी अभी-अभी और बहुत कम संख्‍या में आने शुरू हुए हैं। मैला ढोने वाली महिला को शख्सियत मिली, अविनाश के लेख में आये आंसू इसी बात की खुशी के थे। शख्सियत एक ऐसे आयोजन से मिली, जो भूमंडलीकरण के युग में नारी की घुटन के अभूतपूर्व विस्‍तार से जुड़ा है, यह बात उसी अंधेरे का ख़ौफ़ पैदा करती है, जो जनगढ़ सिंह श्‍याम ने जापान की व्‍यापारिक आर्ट गैलरी में अपनी आदिवासी आंखों के एकदम सामने महसूस किया होगा। जानकार लोग कहते हैं कि कैटवॉक कर रही औरत को अपनी आंखों में वही भाव लाना सिखाया जाता है, जो उमंग के साथ कंघी कर रहे किशोर के चेहरे पर स्‍वाभाविक रूप से इस सोच के साथ आ जाता है कि कोई मुझे देख रहा है। संकरे, रपटे या मुंडेर पर चल रही बिल्‍ली में यह भाव नहीं होता। पर बिल्‍ली मनुष्‍य को क्‍या-क्‍या सिखाये। हजारों साल के साहचर्य के बाद भी वह मानव को यह नहीं सिखा सकी कि आत्‍मसम्‍मान एक ऐसा भाव है, जो कहीं और जाकर नहीं, यहीं व्‍यक्‍त होना चाहिए और अपने ही मन और देह में प्रकटना चाहिए, मुजरे के दर्शकों की आंखों से नहीं।&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8238864777233001076?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8238864777233001076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8238864777233001076' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8238864777233001076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8238864777233001076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='शुक्रिया कहने की इजाज़त चाहूंगा सर'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SHBSH7W_n_I/AAAAAAAACss/qVRXW01NehE/s72-c/Krishna+Kumar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-845467110962707460</id><published>2008-06-21T12:04:00.000-07:00</published><updated>2008-06-22T11:57:48.486-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यहां वहां जहां तहां'/><title type='text'>रैंप पर अंतिम औरत का इतिहास</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;ऑडिटोरियम&lt;/strong&gt; में उम्‍मीद से अधिक लोग थे। मंच ख़ाली था - घुमावदार रोशनियों का वृत्त उसे बहला रहा था। हम देर से पहुंचे थे और वक्‍त से कुछ भी शुरू नहीं हुआ था। जो शुरू होना था, वो कैटवॉक था, जिसमें हमारी दिलचस्‍पी इस वहम के साथ कभी नहीं रही कि मंच पर चलते हुए किसी को क्‍या देखना। आपके क़दम तमीज से ज़मीन पर पड़ते हैं या बेडौल बदतमीज़ी से - इसमें किसी की क्‍या दिलचस्‍पी हो सकती है भला!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे गांव से एक पगडंडी निकलती है, जो शहर पहुंचाती है। जेल की दीवार का एक कोना हमारे गांव की ओर देखता है और दूसरा कोना शहर की ओर। हम शायद शहर से लौट रहे थे, रास्‍ते के कंकड़-पत्थर को पैर मारते हुए। अचानक पीछे नज़र पड़ी। बाबूजी आ रहे थे। उनकी छवि इतनी सख़्त हुआ करती थी कि हमारा अपनी तरह से जीने का पूरा आत्‍मविश्‍वास घुटनों के बल रेंगने लगता था। पहले हमारे पांव सीधे हुए और फिर इतने करीने से आगे बढ़े जैसे पहले कभी उन पांवों ने शैतानियां की ही न हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़मीन पर क़दम रखना आपकी एक आदत हो सकती है कि आप ऐसे ही रखेंगे, जैसे रखते आये हैं। लेकिन नकलची अक्‍सर आपकी तरह से डग भर कर आपको बताएंगे कि आपके चलने में क्‍या ख़ास बात है। इसलिए क़दम कारीगर के हों या कलाकार के, वे अपनी फ़‍ितरत से पहचान लिये जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकिपीडिया से मैं थोड़ा और दुरुस्‍त हुआ कि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Catwalk" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कैटवॉक&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; दरअसल कपड़ों की नुमाइश का इवेंट होता है। 21 जून, शनिवार की शाम को मैं इसलिए भी सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम चला गया, क्‍योंकि &lt;strong&gt;मदन झा&lt;/strong&gt; ने पहले ईमेल किया था, फिर फोन किया और आख़‍िर में एक एसएमएस। मदन झा सरोकारों वाले अख़बारनवीस रहे हैं और एक बार वे दरभंगा से पटना तक मुझे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर लाये थे। रास्‍ते में मुज़फ़्फ़रपुर के पास लाइनहोटल में बढ़‍िया खाना भी खिलाया था। तब वे &lt;strong&gt;टाइम्‍स ऑफ इंडिया&lt;/strong&gt; के दरभंगा कॉरस्‍पॉन्‍डेंट थे या &lt;strong&gt;इंडियन नेशन&lt;/strong&gt; पटना में आ गये थे, ये याद नहीं। क़रीब 12 साल पहले का वाक़या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उन्‍होंने अलवर की उस महिला से मिलवाया था, जो पहले सर पर मैला ढोती थी और अब सुलभ इंटरनेशनल से जुड़ी है और पुरानी मैला प्रथा के अंधेरे को याद भी नहीं करना चाहती। &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/05/blog-post.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;भगवती की कहानी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; आपको याद होगी। इन्‍हीं के बीच की कुछ महिलाएं यूनाइटेड नेशन जा रही हैं। वहां कैटवॉक करेंगी। ऐश्‍वर्या राय उस मौक़े की गवाह बनेंगी। परदेस में कैटवाक का देसी रिहर्सल ही था, जिसमें देश के &lt;a href="http://www.missionsanitation.com/models1.html#01" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;टॉप 21 मॉडल&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; अलवर की राजकुमारियों के साथ रैंप पर चल रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.apunkachoice.com/people/act532/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;जस्‍सी रंधावा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://puja.instablogs.com/entry/model-carol-graciass-slipping-bustier-latest-mms-hit/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कारोल ग्रैसिया&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://movies.indiainfo.com/wallpapers/view_album.php?set_albumName=album50" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;राहुल देव&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://my-movies-world.blogspot.com/2007/05/aryan-vaidya-just-missed.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;आर्यन वैद्य&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के साथ सारे के सारे मॉडल सबसे पहले रैंप पर चले और पर्दे के पीछे लौट गये। एक मॉडल बची रह गयीं, &lt;a href="http://www.starswelove.com/bollywood/women/sheetal_malhar01.htm" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;शीतल मल्‍हार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। मंच के पार्श्व पर्दे के पास खड़ी होकर मुस्‍करायी और उसके पास आसमानी रंग की साड़ी पहने एक औरत आयी। दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और रैंप के आख़‍िरी किनारे तक आये और फिर लौट कर एक ओर खड़े हो गये। फिर और भी मॉडल ऐसी ही जोड़ी बना कर रैंप पर आये। किनारे खड़े होते गये। मॉडल्‍स और अलवर की साधारण औरतों के क़दमताल से सुर मिलाने वाला संगीत दिल में धम-धम बज रहा था। मेरी आंखों का कोर भीग गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक छिछली भावुकता थी, जो अक्‍सर सिनेमा के दृश्‍य देखते हुए मेरी आंखें भिगो जाती है। यह जानते हुए कि दुनिया एक रंगमंच है और शोक, असफलता, विरह, भूख के बाद जितने भी आंसू गिरते हैं, वे संवेदनशीलता की महज एक अदा होते है। शनिवार, 21 जून की शाम जब मेरी आंख भीगी, तो वह एक अदा थी या आदत या कोई चीज़ थी, जो सचमुच दिल को भेद गयी थी, मैं समझ नहीं पाया। मेरे सामने ऊंच-नीच की रीत को रौंदने वाले दृश्‍य खड़े थे और वह महज नाटक नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी देर हॉल में गुमसुम बैठने के बाद मैं बाहर निकल आया। &lt;a href="http://anubhaw.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;गिरींद्र&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; से भेंट हुई। &lt;strong&gt;संजय त्रिपाठी&lt;/strong&gt; मिला, पटना के दिनों का मेरा दोस्‍त। हम सीरीफोर्ट की सरहद से बाहर निकल समोसा खा आये। लौटे तो बारिश की बूंद मेरी हथेली पर गिरी। वे आंसू नहीं थे क्‍योंकि इस वक्‍त हम सब किसी बात पर हंस रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइए, आख़‍िर में अलवर की इन महिलाओं पर एक फिल्‍म देखें, &lt;em&gt;नयी दिशा...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="375" height="294"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/15amMIejJ_4&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/15amMIejJ_4&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" width="375" height="294"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-845467110962707460?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/845467110962707460/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=845467110962707460' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/845467110962707460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/845467110962707460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/06/blog-post_21.html' title='रैंप पर अंतिम औरत का इतिहास'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-5235460419321990955</id><published>2008-06-14T11:44:00.003-07:00</published><updated>2008-06-14T12:11:23.551-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><title type='text'>मीरा से मुलाक़ात</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SFQXfhXryrI/AAAAAAAAClE/TM4pMzzFw5o/s1600-h/meera1.JPG" target="_blank"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SFQXfhXryrI/AAAAAAAAClE/TM4pMzzFw5o/s200/meera1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5211816499075599026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;बेड लाउंज... एंड बार।&lt;/strong&gt; लकड़ी का मजबूत फाटक पहाड़ खिसकाने की तरह खुला। रोशनी की आंधी ने आंखों में अंधेरे के धूल बिखेर दिये। हड़बड़ा कर मैंने फाटक छोड़ दिया। वह अपनी जगह आकर लग गया। मेरी एक हथेली पर डर था, दूसरी पर संकोच। दीवार के पार रोशनी का समंदर था। उसमें जाना ही था। डुबकी लगानी ही थी। दूसरी बार मैंने फाटक को मजबूती से हाथ लगाया। रोशनी के फाहे चेहरे पर आने दिये। अब मैं अनगिनत फुसफुसाहटों और एक लरजती हुई गूंजती आवाज के बीच गुमसुम आ टिका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बार किसी पुराने शहर के अंधेरे स्टूडियो की तरह खाली और रहस्यमय था। बीच से लकड़ी की एक सीढ़ी ऊपर जाती थी। ऊपर की दुनिया बस एक हाथ के फासले पर थी, आंखों के ठीक सामने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह ‘मीरा’ थी... रोशनी जहां से फूट रही थी, रोशनी जहां पर झर रही थी। मीरा बीच सीढ़ी पर बैठी GEO टीवी को इंटरव्यू दे रही थी। कह रही थी - ‘दो मुल्कों की मोहब्बत के लिए मैं और मेरी इज्ज़त भी कुर्बान होती है, तो ये सर और ये मेरा जिस्म हाजिर है’ - फिर सरहद पार की बातें और हिंदुस्तान की मिट्‌टी का किस्सा। यह मेरे लिए रोशनी की दुनिया थी और अंधेरे का सबब। यहां मैं आंखें फाड़ कर अपनी खामोशी को और गहरा करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा था। यक़ीनन जो दुनिया आपकी नहीं है, उस दुनिया में आपकी भाषा समझी भी नहीं जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मैंने सुना, मीरा चिल्ला रही हैं - ‘एक गैर मुल्क मुझे बेपनाह इज्ज़त दे रहा है, और मेरा अपना ही मुल्क मेरे कपड़े फाड़ रहा है - आपको शर्म आनी चाहिए - आपने मुझको लेकर कंट्रोवर्सी क्रिएट की, फिर भी मैं आपको इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुई - कम-अज-कम मेरे मुल्क में मेरी पूरी बात पहुंचाएं।’&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;(मालूम हो कि पाकिस्तानी न्यूज चैनल GEO ने ही मीरा के हिंदुस्तान में चुंबन दृश्‍य देनेवाली ख़बर को फ्लैश किया था, जिसके बाद पाकिस्तान में हंगामा और प्रदर्शन हुआ था)&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;बहरहाल, GEO का संवाददाता सिमटा-सिकुड़ा ‘ज़रूर मीरा, ज़रूर’ ही कह पाया था कि मीरा यह ऐलान करती हुई वहां से निकल गयी कि मुझे बाथरूम की ज़ोरदार तलब हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बार की चौड़ी गली से जाती हुई किसी नदी की तरह जा रही थी। पीले एहसासवाली उजली साड़ी जमीन से लिपट रही थी। वह उन्हें हाथों में समेटने की कोशिश करती हुई जा रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह आयी, तब तक दूसरा सेट सीढ़ी के ऊपरवाली दुनिया में तैयार था। बीच रास्ते में मैंने टोका, ‘मीरा... मैं... अविनाश... आपने वक़्त दिया था...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जी हां, याद आया, मैं अभी आयी...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह गयी और फिर कभी लौट कर नहीं आयी। मैंने सुना, ऊपर से उनकी आवाज़ आ रही थी, मेकअप... लिपिस्टिक...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘जी हां, अब पूछिए सवाल...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सवाल के लिए जिस चैनल से अनुरोध किया जा रहा था, उसकी खूबसूरत-सी संवाददाता ने सवाल शुरू करना चाहा ही था कि मीरा ने कहा कि यह मुझे ठीक जगह नहीं लग रही है... कितना मजा आएगा, अगर हम बार की चौड़ी गली में ऊंची वाली कुर्सी पर बैठ कर बातें करें। संवाददाता ने ‘ओके’ कहा और कुछ लड़के कैमरे की उठा-पटक में मशगूल हो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक भट्‌ट साहब तशरीफ लाये। वह सीढ़ियों से टिक कर ऊपर मुखातिब हुए। मीरा को देखने की कोशिश करते हुए आवाज़ लगायी, ‘मीरा जी सलाम वालेकुम।’ शायद मीरा ने उनकी आवाज़ सुनी नहीं। भट्‌ट साहब ने दुबारे कहा, ‘सलाम वालेकुम मीरा जी!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार मीरा ने लगभग चौंकते हुए जवाब दिया, ‘भट्‌ट साब! कैसे हैं आप? प्लीज आप ऊपर आइए, मेरे पास बैठिए... इंटरव्यू में मैं नर्वस हो रही हूं...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब सीढ़ियों पर अपने क़दमों की तेज़ आहट के साथ ऊपर गये। मीरा उनसे लिपट गयीं। भट्‌ट साहब पीले एहसासवाली मीरा की श्‍वेत-धवल साड़ी की तारीफों के पुल बांधने लगे, ‘क्या बात है, आज तो कहर ढा रही हैं आप!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीरा ने कहा, ‘भट्‌ट साब! साढ़े तीन लाख की साड़ी है... पूरी कढ़ाई हाथों की है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब जैसे चौंके, ‘अरे! ग़रीब हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसे मुल्क में साड़ी साढ़े तीन लाख की! मीरा जी, आपने तो कमाल ही कर दिया! अब तक तो आप मुझे नायिका ही लग रही थीं, अब तो पूरी की पूरी महंगी भी लग रही हैं! वाह, क्या बात है!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीरा ने कहा, ‘भट्‌ट साब! अच्छी लगती है न, इसलिए!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब नीचे आये और फोन पर लगातार मुलायमियत से भरी हुई चीख़ में व्यस्त हो गये। उन्हें फुर्सत हुई, तो मैंने आगे जाकर हाथ बढ़ाया, ‘भट्‌ट साब, मैं...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने गर्मजोशी से अपनी बांहों में मुझे लिया, ‘अरे, कबसे हैं आप?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मुझे तकरीबन डेढ़ घंटे हो गये भट्‌ट साब, पर मीरा जी को फुर्सत ही नहीं मिल रही है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब ने मीरा को पुकारा। मीरा सीढ़ी पर चुप क़दमों से उतर रही थीं। भट्‌ट साहब ने प्यार से झिड़की देते हुए मीरा से कहा, ‘मीरा जी, आपने इन्हें डेढ़ घंटे से बिठा रखा है और आप टीवी कैमरा के सामने बक-बक बक-बक किये जा रही हैं!’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीरा ने कहा, ‘मैं क्या करूं भट्‌ट साब! जैसा आप कहिए मैं करती हूं!’ यह कह कर मीरा बार की चौड़ी गली में तैयार नये सेट की रोशनी में फैल गयीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब मेरी ओर मुड़े, ‘अब आपको मीरा जी से नया समय लेना पड़ेगा। देखा आपने, वह कितनी व्यस्त हैं। अब वह स्टार हो गयी हैं। देखा, कितनी महंगी साड़ी पहन रखी है। इस मुल्क में बड़ी दिक्कत है। वैसे तो यह दूसरे मुल्कों की दिक्कत भी हो सकती है कि जब तक बताओ नहीं कि यह इतने दाम की चीज़ है, उसकी कीमत का पता ही नहीं चलता। नहीं! कीमती चीज़ का एहसास कराने के लिए उसकी कीमत की डीटेल्स बतानी ज़रूरी हो जाती है।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लगा भट्‌ट साब मुझसे बातें कर रहे हैं। मैंने पूछा, ‘भट्‌ट साब, अब सारांश जैसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भट्‌ट साहब झुंझलाये, ‘कोई नहीं देखेगा। कोई नहीं देखता। ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ कितने लोग देखने गये? आपने देखी?’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘हां’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘अलग हट कर है न!’ भट्‌ट साहब ने कहा, ‘न्न! सारांश नहीं चलेगी अब, कभी नहीं!’ और वह फिर किसी फोन पर मशगूल हो गये। शायद उधर से कोई बहुत करीब का था। कह रहे थे, ‘मादर... फोन ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी है। सुबह से पचास बार लोगों को बता चुका हूं... बहन के... शोएब अख्तर और गैंगस्टर के बारे में... मादर... फिर भी पूछे जा रहे हैं, पूछे जा रहे हैं...’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने हाथ हिला कर विदा लेने की कोशिश की। उन्होंने अपनी आंखें बहुत छोटी कर लीं। मैं डर गया। मैं डरना नहीं चाहता था, इसलिए बिना जवाब की आशा के मैं लकड़ी के उसी पहाड़ जैसे फाटक से बाहर निकल आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर धूप थी, धूल थी, बस थी, पसीना था... और पसीना बहाती हुई ज़‍िंदगी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;OO&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने रात को घर आकर मीरा को एसएमएस किया। मीराबाई की पंक्ति को रोमन में टाइप करके : &lt;em&gt;कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मास; दो नैना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन की आस!&lt;/em&gt; मीरा का जवाब तुरत आया। बल्कि वह जवाब नहीं था, सवाल था : tell me your name... मैंने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। पर, मुझे रात में अच्छी नींद आयी। &lt;p align="right"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;तब का एड्रेस&lt;/strong&gt; : 1104, ए विंग, धीरज रेसीडेंसी, गोरेगांव बस डिपो, ओशीवाड़ा, गोरेगांव (वेस्ट), मुंबई&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-5235460419321990955?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/5235460419321990955/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=5235460419321990955' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5235460419321990955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5235460419321990955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/06/blog-post_14.html' title='मीरा से मुलाक़ात'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SFQXfhXryrI/AAAAAAAAClE/TM4pMzzFw5o/s72-c/meera1.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-7704854386405032886</id><published>2008-06-02T22:46:00.000-07:00</published><updated>2008-06-02T22:47:59.359-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंता की लकीरें'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>परिवार में पहली बार सार्वजनिक</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;बचपन से लेकर मेरा सफ़र बहुत छुपा हुआ रहा है। मैंने पढ़ा, नहीं पढ़ा - किसी को मतलब नहीं था। कभी-कभी राय मिली, तो वो भले सबकी सुनी - लेकिन हमेशा वही पढ़ा, जो मेरे मन को कबूल था। कभी कॉमिक्‍स, कभी पराग। थोड़े बड़े हुए तो सुमित्रानंदन पंत, काका हाथरसी और नवीं के दिनों में पहली बार गोदान। ये रांची के दिन थे। दरभंगा में लघु पत्रिकाओं से दोस्‍ती हुई और वहीं पाश, धूमिल और राजकमल चौधरी कविताओं को पढ़ते हुए किसी ने मुझे टोका नहीं। घर में मेरा संवाद ही किसी से नहीं था। था भी तो मेरी तरफ से नहीं था। मुझे लोग करियर के बारे में सलाह देते, डांटते, पीटते - लेकिन एकतरफा सबको अनसुना करते हुए मेरी आवारागर्दी के किस्‍सों की निजी डायरी मोटी होती गयी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी की पीढ़ी में किसी से मेरी बात नहीं होती। हां-हूं। बस इतना ही। &lt;a href="http://prashant7aug.blogspot.com/2007/12/blog-post_26.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;पापा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; से भी नहीं, जो आमतौर पर हम भाई-बहनों से काफी बातें करते हैं। उस वक्‍त पापा की पोस्टिंग विक्रमगंज में थी और मम्‍मी, छोटू, दीदी, बाबू पटना में रहते थे। मेरे लिए ये एक ऐसा आश्‍वस्‍त करने वाला ठिकाना था कि जिस दिन घर का खाना खाने का मन होता था - पहुंच जाता था। पहुंचना अक्‍सर रात में ही होता था, जैसा कि बाबू ने &lt;a href="http://prashant7aug.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;एक पोस्‍ट&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; में मेरे बारे में लिखा भी है। वहां मुझे शास्‍त्रीय संगीत सुनने को मिलता था और &lt;a href="http://www.orkut.co.in/Profile.aspx?uid=14494743183651277813" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;छोटू&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; होता, तो साथ में कैरम खेलता था और वो हर बार मुझे हरा देता था। पहले तो अक्‍सर होता था, बाद में बीआईटी सिंदरी पढ़ने चला गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर संवाद यहां भी न पापा से था, न मम्‍मी से, न बाबू से, न छोटू से। सिर्फ &lt;a href="http://prashant7aug.blogspot.com/2007/12/blog-post_10.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;दीदी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; से मेरी बात होती थी। उम्र में मुझसे तीन-चार साल छोटी होगी, लेकिन हमारे पूरे परिवार में उसे सब लोग दीदी ही कहते हैं। उसका नाम रश्मि प्रियदर्शिनी है। अब शादी के बाद हो सकता है उसने अपने नाम में कुछ फेरबदल की होगी, मुझे नहीं बताया है। अब जब मैं याद करने की कोशिश करता हूं तो परिवार में संवादहीनता की भरी-पूरी स्थितियों के बीच एक रश्मि ही थी, जिससे मैंने ख़ूब बात की। सब तरह की बातें। सपनों और सिद्धांतों की बातें। अपने प्‍यार की बातें। अख़बार की बातें। उससे ख़ूब बहसें भी होती थीं, लेकिन ज़्यादातर मेरी बातों से सहमत हो जाती थी। मैं उसे अक्‍सर उकसाया करता था, जीवन यूं ही बर्बाद करने से कुछ नहीं होगा - तुम्‍हारी अंग्रेज़ी अच्‍छी है, कुछ कर लो। वह कहती थी कि हां, करूंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली बार, जब छोटू की शादी में वो मिली, तो मैंने उसे याद दिलाया था सब। उसकी प्‍यारी बेटी उसके साथ थी। उसने कहा कि जो वो नहीं कर सकी, अब उसकी बेटी करेगी। मैं इंतज़ार कर रहा हूं कि उसकी बेटी बड़ी हो और उसके साथ रहने का मौक़ा मिले तो उसके साथ भी बहसबाज़ी करूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रश्मि को मैं बताया करता था कि अख़बार में क्‍या हो रहा है, मुझे क्‍या करना है। वह घर में बताती होगी, तो लोगों को पता होगा - वरना मेरे अरमानों की ख़बर सिर्फ़ हमारे-उसके बीच ही रही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रश्मि का अध्‍याय छोड़ दें, तो अब तक सिर्फ़ मैं ही जानता रहा हूं कि मैंने पटना में कितने विरोध और झंझावातों के बीच पत्रकारिता की। प्रभात ख़बर में ट्रेनी सब एडिटर की जगह मिली थी और सि‍र्फ़ चार साल बाद उस अख़बार की साप्‍ताहिक पत्रिका का संपादक मुझे बनाया गया था और फिर दो साल बाद ही पूरे संस्‍करण का समन्‍वय संपादक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना से लेकर रांची, दिल्‍ली, देवघर, मुंबई में कितने अवसर आये होंगे, जब प्रति‍कूल परिस्थितियां मेरे आगे के सफ़र में दीवार बन कर खड़ी हो गयी हों। मैंने सब पार किया। कभी विरोध की प‍रवाह नहीं की। थोड़ा विचलित ज़रूर हुआ, लेकिन तुरत संभल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार बहुत विचलित हूं - क्‍योंकि अपने साथ हुए तमाम हादसों की ख़बर, जो सिर्फ़ मैं जानता था - आज मेरा परिवार भी जानता है। और वो भी ब्‍लॉग में अपनी सार्वजनिक उपस्थिति की वजह से।&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;(अजीब है ये ब्‍लॉग भी। बाबू भी इतना शानदार लिख रहा है कि कई बार मुझे ताज्‍जुब होता है कि हमेशा ख़ामोश रहने वाला ये लड़का और अचानक बीच एक चुहल भरी ग़ैर साहित्यिक बात कहके ग़ायब हो जाने वाला ये लड़का इतनी संजीदगी से चीज़ों को देखता भी है! मैं उसके ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी नहीं करता - क्‍योंकि कई बार मुझे समझ में नहीं आता, मैं क्‍या लिखूं। &lt;a href="http://hgdp.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;ज्ञानदत्त जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; जब उसकी तारीफ़ करते हैं, तो बहुत खुशी होती है।)&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;परसों ऑनलाइन था, तो छोटू चैट बॉक्‍स में आ गया। उसने पूछा कि हिंदी ब्‍लॉगिंग में ये क्‍या हो रहा है - आपके बारे में क्‍या-क्‍या लिखा जा रहा है - मुझे कुछ नहीं पता - पापा बता रहे थे। मैंने कुछ जवाब नहीं दिया। मैंने उसे लिखा कि किसी बेईमान आदमी की नीयत पर उंगली उठाने की सज़ा जो मिल सकती थी, मिल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पूरी उम्‍मीद है कि बात उसकी समझ में नहीं आयी होगी। मेरे उन तमाम दोस्‍तों की तरह, जो एक लड़ाई में मुझे अकेला छोड़ गये। अच्‍छा हुआ, वरना उन तमाम दोस्‍तों का चरित्र हनन करने की कोशिश भी की जाती। उनके विवेक ने उन्‍हें बचा लिया। विरोधियों का चक्रव्‍यूह तो मेरी नियति रही है - मुझे अकेले ही लड़ना है - और सोचे हुए सफ़र को पूरा करना है।&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-7704854386405032886?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/7704854386405032886/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=7704854386405032886' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7704854386405032886'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7704854386405032886'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='परिवार में पहली बार सार्वजनिक'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8758693892256288456</id><published>2008-05-13T15:08:00.001-07:00</published><updated>2008-05-14T13:03:05.666-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यहां वहां जहां तहां'/><title type='text'>भगवती के साथ एक दोपहर</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SCtFMHNwWaI/AAAAAAAACfc/nirsGW4PDCY/s1600-h/07-03-08_1410.jpg" target="_blank"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SCtFMHNwWaI/AAAAAAAACfc/nirsGW4PDCY/s320/07-03-08_1410.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5200326269126859170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;होटल इंटरकांटीनेंटल&lt;/strong&gt;। बाराखंभा रोड। नयी दिल्‍ली। ठीक एक दिन पहले इसी जगह भारतीय क्रिकेट टीम मौजूद थी। ऑस्‍ट्रेलिया से जीत का सेहरा बांध कर लौटी टीम ने यहीं कल शाम डिनर किया, जहां आज हम और भगवती साथ-साथ लंच कर रहे हैं। दो छोर पर मौजूद दो दुनिया एक जैसी चमकती फर्श पर खड़ी है। दिल्‍ली की पहली कतार के महंगे होटलों में से एक इं‍टरकांटिनेंटल अमीरी के शिखर पर तैरने वाली क्रिकेट टीम और राजस्‍थान के अलवर ज़‍िले में कभी मैला ढोने वाली भगवती और उस जैसी दर्जनों महिलाओं में कोई भेद नहीं कर रहा है, इससे मैं थोड़ा परेशान हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्‍या ये उतना ही सच है, जितना दिख रहा है?&lt;br /&gt;आज़ाद भारत में खुशहाल साम्‍यवाद की ये तस्‍वीर वैसी ही है, जैसी दिख रही है?&lt;br /&gt;क्‍या भगवती और सचिन तेंदुलकर इस मुल्‍क के बराबर के नागरिक हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं थोड़ा हैरान था और मेरी हैरानी से बेफिक्र भगवती ने कहा कि वो यहां पहले भी आ चुकी है। यानी जो दृश्‍य मेरे लिए अब भी असामान्‍य है, उसके लिए सामान्‍य हो चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती का मायका दिल्‍ली है। बापूधाम में, जो धौलाकुआं से आगे पड़ता है। भगवती कहती है, मौर्या होटल - ताज होटल के पीछे मायके वालों की बस्‍ती थी। वा‍ल्‍मीकि समाज की बस्‍ती। ये अब भी है, लेकिन अब मकानों-दुकानों में रौनक आ गयी है और पुरानी बस्‍ती लगती ही नहीं। पांच बहनों और एक भाई के बोझ को जल्‍दी-जल्‍दी उतारते हुए मां-बाप ने जहां-तहां सबकी शादी कर दी। भगवती की किस्‍मत ज़्यादा ख़राब निकली। अलवर में उसके ससुराल की औरतें मैला ढोती थीं। नयी-नवेली बहू ने ठीक से घूंघट भी नहीं उतारा था कि इस बदबूदार परंपरा के फटे हुए कपड़े पहनने के लिए ज़ोर‍ दिया जाने लगा। भगवती को उबकाई आयी। खूब रोयी भगवती। भाग आयी दिल्‍ली। अपने मायके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता थे कि नियति के लिखे पर भरोसा करते थे, लेकिन भाई को बहन की पी‍ड़ा से ज़्यादा वास्‍ता था। उसने कहा कि अब अलवर मत जाना। भगवती रही लगभग साल भर - लेकिन समाज के उंगली उठाने से पहले ही भाई ने दुनियादारी समझी और भगवती से कहा कि बहन, अब जो किस्‍मत में मिला है, उसे तो लेना ही पड़ेगा। भगवती लौट आयी अलवर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती की कहानी को उसकी ज़ुबानी हम सुन रहे थे और छोटा-सा रिकॉर्डर ख़ामोशी से सब कुछ लिख रहा था। और भी लोग थे, लेकिन सबसे अनजान अपनी कहानी सुनाती हुई भगवती के चेहरे का भाव अच्‍छे-बुरे, खुशबू-बदबू वाले दिनों के हिसाब से बदल रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पति को लगता था कि मैला ढोना ठीक बात नहीं है, लेकिन सास-जेठानी का ज़ोर ज़्यादा था। वे कहते कि बच्‍चे होंगे और जब तक छोटे रहेंगे, तब तक तो ठीक - लेकिन जब बड़े होंगे तो एक आदमी की कमाई से गुजारा चलेगा नहीं। मैला ढोना अभी से शुरू करोगी, तो बाद में आसानी होगी। भगवती ने मिन्‍नत की, लेकिन सास को लगा मैला ढोने में क्‍या है - भगवती को न मना करना चाहिए, न मिन्‍नत। भगवती ने मन मार कर मैला ढोना शुरू किया। महीनों घर लौट कर उल्‍टी आती थी, बाद में आदत बन गयी। दुबली काया वैसी ही रही, क्‍योंकि इस जीवन से मन जुड़ नहीं पाया। पेट भर खाने की दिक्‍कत रही और मैल के छींटों से देह में बसती हुई बीमारी ससुराल में सबके लिए आम थी। भगवती ऐसी जगह ब्‍याहने के लिए मां-बाप को कोसती रही और सिर पर मैला ढोती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी गंदगी में बच्‍चे हुए और बड़े होने लगे। भगवती को पता ही नहीं चला और उम्र गुज़रती रही। हमने उनकी उम्र पूछी, तो चुप हो गयीं। कभी किसी ने पूछा ही नहीं था। मेरा ख़याल था‍ कि पचपन-साठ होगी। चेहरे से झांकती हुई झुर्रियों से तो ऐसा ही लगता था। मैंने एक बार फिर पूछा, तो उन्‍होंने कहा कि पता नहीं। होगा चालीस। थोड़ा अधिक भी हो सकता है। यानी ख़याल और हकीक़त में 15-20 साल का फर्क था। मुझे उम्‍मीद थी कि भगवती का ब्‍याह सत्तर के दशक में हुआ होगा, लेकिन उन्‍होंने कहा कि उनकी शादी के आसपास ही इंदिरा गांधी का मर्डर हुआ था। संजय गांधी को भाषण देते हुए जब उन्‍होंने सुना था, तब वो बच्‍ची थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदनसीब भारत की उमर ऐसे ही ढली हुई नज़र आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती के तीन बच्‍चे हैं। एक बेटी, दो बेटा। बेटी की शादी दिल्‍ली कैंट में कर दी। दिल्‍ली में सिर पर मैला ढोने का रिवाज़ नहीं है। बेटी दूसरों के घरों में सफाई का काम करती है। मैला नहीं ढोती है। सुखी है। भगवती को संतोष है। लेकिन बेटे की शादी हुई, तो बहू ने छोड़ दिया। अदालत में तलाक के लिए अर्जी़ दे दी। बहू मैला ढोने वालों की बस्‍ती में नहीं रहना चाहती थी। वो दिल्‍ली वाली थी। तब की नहीं, जब की भगवती है। वो उस दिल्‍ली की लड़की थी, जहां आधुनिक संस्‍कृति अब बड़े घर से निकल कर सड़कों और निम्‍न मध्‍यवर्गीय बस्तियों तक में पहुंच चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन किसी ने आकर कहा कि कोई पाठक जी आये हैं। कहते हैं, मैला ढोना पाप है। भगवती इस पाप से छुटकारा चाहती थी और पाठक जी ने भगवती को मुक्ति दिलायी। अब भगवती कहती है कि भगवान ने भेजा था उन्‍हें। ज़‍िंदगी की राह आसान कर देने वालों के लिए भगवान जैसा जुमला भारतीय ज़ुबानों में ख़ूब चलता है और भगवती भी ऐसी ज़ुबान में बोलने वाली एक भारतीय नागरिक थी - जिसके लिए कोई ऐसा काम इस देश में नहीं था, जो मैला ढोने के विकल्‍प के तौर पर उसके सामने होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती विंदेश्‍वर पाठक की बात कर रही थी, जिन्‍होंने देश में सुलभ आंदोलन खड़ा किया और अब मैला ढोने वाली महिलाओं को नरक से निकालने की कोशिश में लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने ग़ौर किया कि जब विंदेश्‍वर पाठक के जीवन से जुड़े एक प्रसंग की नाट्य-प्रस्‍तुति होटल इंटरकांटीनेंटल के उस हॉल में चल रही थी, तो भगवती का चेहरा उदास था। एक सांड ने एक बच्‍चे पर हमला बोल दिया। बच्‍चे की मां मैला ढोती थी, इसलिए वो अछूत था। किसी ने उस बच्‍चे को नहीं बचाया। उसे कराहते हुए लोगों ने देखा, लेकिन किसी ने उसे अस्‍पताल नहीं पहुंचाया। वो मासूम एक निरीह मौत मारा गया। बिहार के बेतिया ज़‍िले का वो हादसा विंदेश्‍वर पाठक के बचपन का सबसे मार्मिक हिस्‍सा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती ने कहा कि हमारे बच्‍चों के साथ अब ऐसा नहीं होगा। वे अब जहां कहीं भी जाती हैं, उन्‍हें उसी गिलास में पानी पीने के लिए लोग देते हैं, जिसमें वो खुद पीते हैं। भगवती अब सुलभ आंदोलन की एक कार्यकर्ता हैं। वो पापड़ बनाती हैं, वो बड़ी बनाती हैं। भगवती के हाथों की बनी ये चीज़ बाज़ार में बिकती है। भगवती को पैसे मिलते हैं। घर में टीवी है, फ्रीज़ है। थोड़े दिनों से फ़्रीज़ ख़राब हो गया है, जो ठीक हो जाएगा। अब ज़‍िंदगी से मलाल नहीं है भगवती को। मैला ढोने का काम बहुत पीछे छूट गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भगवती की जेठानी, ननद, देवरानी अब भी मैला ढोती है। भगवती के पास आती हैं। कहती हैं, हमें भी इस नरक से निकालो। मोहल्‍ले की दूसरी औरतें भी आती हैं। सुलभ में काम दिलाने को कहती हैं। भगवती कहती हैं, धीरज धरो। सुलभ सबका है। सबको काम मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये भारतीय आशावाद है, भगवती जिसकी कायल है। नियति ने अच्‍छे घर से निकाल कर कठिन समय में ला खड़ा किया। वो दिन भी कट गये और अब खुशहाली है। बड़ा बेटा किसी के बाग़ की रखवाली करता है। अदालत में केस निपट जाएगा, तो दूसरी शादी भी हो जाएगी। छोटे बेटे को कुछ दिनों बाद कामकाज के लिए दिल्‍ली भेज देगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुलभ ने जो संबल दिया है, उससे ज़‍िंदगी अब राजी-खुशी कटेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होटल इंटरकांटीनेंटल का एयर कंडिशनर तेज़ था। मेरे पांव कांप रहे थे। हाथों में दाल-भात और तली हुई मछली से भरी प्‍लेट हिल रही थी। लेकिन भगवती नीले आसमानी रंग की साड़ी में खूब खिल रही थी। उसकी प्‍लेट में मेरी प्‍लेट से ज़्यादा मछली थी... और वो हिल भी नहीं रही थी!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8758693892256288456?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8758693892256288456/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8758693892256288456' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8758693892256288456'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8758693892256288456'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='भगवती के साथ एक दोपहर'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SCtFMHNwWaI/AAAAAAAACfc/nirsGW4PDCY/s72-c/07-03-08_1410.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8271952989773301829</id><published>2008-03-29T14:01:00.000-07:00</published><updated>2008-03-29T14:07:43.243-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>सिनेमा हॉल के बाहर का सिनेमा आंखों में ज्‍यादा बसता है</title><content type='html'>(अधूरा गद्य जिसमें कहीं कहीं अधूरी कविताई) &lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;कुछ वक्त कुछ बेवक्त मगर अक्‍सर तीन बजे &lt;br /&gt;या उससे थोड़ा पहले, जब धूप का ताप अधिक महसूस होता है &lt;br /&gt;हमारी कालोनी के अंत में या शुरू में बने सिनेमा हाल से &lt;br /&gt;(जो तब बना था, जब हॉल में बैठ कर कैम्‍पा कोला पीने वाले&lt;br /&gt;सबसे अमीर होते थे) &lt;br /&gt;निकलती हुई पसीने में भीगी भीड़ पर हमारा रिक्‍शावाला &lt;br /&gt;घंटी बजाता रह जाता है &lt;br /&gt;वरना अमूमन सुबह-शाम ऑफिस आने-जाने के वक्त में &lt;br /&gt;आश्रम और आईटीओ-लक्ष्‍मीनगर पुल पर जो जाम लगते हैं... &lt;br /&gt;ठीक वैसा ही जाम तो नहीं लगता &lt;br /&gt;लेकिन इच्‍छा होती है - सिनेमा हाल से निकल कर लोग &lt;br /&gt;सभ्‍यता से सड़क की बायीं तरफ एक कतार में क्‍यों नहीं चलते! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी का रिक्‍शा किसी की रेहड़ &lt;br /&gt;किसी की चुप्‍पी किसी के तेवर &lt;br /&gt;कहीं नहीं दिखते हैं जेवर &lt;br /&gt;तांबई चमक से तने हुए ललाट से कंधे पर टपकती &lt;br /&gt;है पसीने की बूंद जिसमें मिली है एक कहानी, कुछ &lt;br /&gt;मार-धाड़, बेपनाह रोशनी, तिलस्‍मी अंधेरा, &lt;br /&gt;हांफते हुए चेहरे &lt;br /&gt;सिनेमा हाल से निकल कर असीम शांति &lt;br /&gt;मन में घुमड़ते हुए उल्‍लास से ज्‍यादा जल्‍दी में हम हैं &lt;br /&gt;लेकिन मुख्‍य मार्ग की ट्रैफिक पुलिस यहां हमारा साथ देने कभी &lt;br /&gt;नहीं आएगी वो यहां के लिए नहीं होती &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे मन में लगे जाम को हटाने के लिए नहीं होती है ट्रैफिक पुलिस &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये गरीब लोग हैं, जो अभी पुराने सिनेमा हॉल में बासी &lt;br /&gt;फिल्‍में देख कर उनसे ज्‍यादा आनंद पाते हैं जो नई सदी के &lt;br /&gt;सिनेमा हालों में आज की बनी फिल्‍म आज ही देख कर &lt;br /&gt;गंभीर सावधानी के साथ निराश समीक्षक की तरह निकलते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोबी ने पतलून प्रेस की पहनी नयी कमीज &lt;br /&gt;सौ रुपये में देख सिनेमा पटक रहे हैं खीझ &lt;br /&gt;ये आदम की नयी नस्‍ल हैं इनकी यही तमीज &lt;br /&gt;कहीं कहीं से क्रीज उखड़ गयी है अंधेरे में जानवर की तरह लड़की &lt;br /&gt;को चूमते-चाटते दरअसल और लंबी चलनी थी फिल्‍म मगर &lt;br /&gt;समय के संक्षिप्‍त इतिहास में अवसर का दरवाजा &lt;br /&gt;फिलहाल बंद होने के बाद बुझे-बुझे मॉल से निकलते हुए &lt;br /&gt;ये यूं ही लगते हैं निस्‍तेज, अनाकर्षक &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुंच कर याद आता है रास्‍ता गुलाबी पॉलिस्‍टर सलवार-कमीज पर &lt;br /&gt;उसी रंग की ओढ़नी जिसका कोर लहराता है पीछे-पीछे और उंगलियों से &lt;br /&gt;छू लेने को जी चाहता है जब तक चेहरा सामने नहीं आता &lt;br /&gt;तब तक हमारे मन में एक पूरी प्रेम कहानी बनती है और यूं ही बिगड़ &lt;br /&gt;जाती है वो कालोनी से सटे सीलन भरे कमरों वाले मोहल्‍ले की सबसे पतली &lt;br /&gt;गली में चली जाती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले हफ्ते किसी दिन नून शो से निकलते हुए ऐसे ही दिख जाएगी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होता यह है कि जो कहानी अंधेरा मारधाड़ सांसों की धौंकनी सिनेमा हॉल के अंदर &lt;br /&gt;चलती है जहां करोड़ों का सिनेमा बनता है रुपयों में देखा जाता है और गणित का &lt;br /&gt;हिसाब अरबों के ठिकाने लगता है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होता यह है &lt;br /&gt;कि उस सिनेमा हाल के बाहर का सिनेमा &lt;br /&gt;आंखों में ज्‍यादा बसता है&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8271952989773301829?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8271952989773301829/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8271952989773301829' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8271952989773301829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8271952989773301829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/03/blog-post_29.html' title='सिनेमा हॉल के बाहर का सिनेमा आंखों में ज्‍यादा बसता है'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-5099919632609049081</id><published>2008-03-13T07:20:00.000-07:00</published><updated>2008-03-13T07:30:36.610-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंतिम यात्रा'/><title type='text'>आइए, रवीश को संबल दें, सहारा दें</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a href="http://naisadak.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;रवीश&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; पटना में हैं। पिछले कुछ दिनों से। बाबूजी की तबीयत ख़राब थी। वे अस्‍पताल में थे। रवीश का पिता से कुछ ज्‍यादा ही लगाव रहा है। आपस की बातचीत में वे अक्‍सर पिता के बारे में बताते रहे हैं। आज उनका मैसेज आया, Babuji cudnt Survive... एक दुखद संदेश। जाना ही पड़ता है एक दिन। सबको। लेकिन इस नियति को मान कर सहज शायद ही कोई होता है। बरसों के रिश्‍ते, बरसों की हार्दिकता को नियति के हवाले कैसे किया जा सकता है? रवीश इस वक्‍त दुखी हैं। बात कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। शायद कोई भी नहीं होता होगा, ऐसे वक्‍त में। हम सब उनके दुख को सहारा दे सकते हैं। रवीश को संबल दे सकते हैं।&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-5099919632609049081?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/5099919632609049081/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=5099919632609049081' title='33 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5099919632609049081'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5099919632609049081'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='आइए, रवीश को संबल दें, सहारा दें'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>33</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-7915460267963062475</id><published>2008-02-12T09:31:00.000-08:00</published><updated>2008-02-12T13:53:51.071-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>मानो राहू चंद्रमा पर चाबुक चलायो है</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;अबीर की दोपहर&lt;/strong&gt; होती थी। सबसे अधिक खिलता था पीला रंग। वो हाथों से उड़ता था और बालों से गुज़रते हुए चेहरे को सहलाता था। गीतों के बीच उठती मादक स्‍वरलहरी इन अबीरों को बौरा देती थी। फिर ये पूरा गांव घूम आते थे। दरवाज़े-दरवाजे़। हमारे हाथ में ज़्यादा से ज़्यादा एक जोड़ी झाल होता था। होली में कोरस का सुर अपने उठान के वक्‍त लय और ताल नहीं देखता, लिहाजा बेसुरा झाल भी उसमें अपना अक्‍स खोज लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने कायदे से कुछ भी बजाना नहीं सीखा। सिवाय गाल बजाने जैसे मुहावरे के, जो झूठ के अब तक के सफ़र में आज भी काम आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आकाशवाणी दरभंगा में एक कलाकार थे। आंखों की रोशनी बचपन से नहीं थी। हम वहां कैज़ुअल आर्टिस्‍ट थे। यूं भी अपने शहर की सांस्‍कृतिक आवोहवा में बेताल की तरह उड़ते रहने के दिन थे और हमारी हसरतें इतनी थीं कि सिनेमा हॉल को छोड़ कर दो-ढाई घंटे से ज़्यादा कहीं बैठने नहीं देती थीं। एक बार उन्‍होंने हार‍मोनियम सिखाने का वायदा किया। चाचा के पास बेतिया में हारमोनियम था, जिसे उठा कर हम दरभंगा ले आये थे। उनसे सरगम सीख पाये। &lt;em&gt;सा सा सा सा निधा निधा प म प गग प म प गरे गरे नि रे सा। सा नि ध, ध म प, म प ग, प ग रे, ग रे सा।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर देशी शराब की दुकान पर हमें ले जाते। पौव्‍वा खरीदते और कहते - आओ रंग जमाएं। लेकिन उन दिनों वे हमें पीना नहीं सिखा पाये। हम कुछ और देर तक बचे रहना चाहते थे। बाद में तो शराब कुछ ऐसे शुरू हुई, मानो उससे जनम-जनम का अपनापा हो। लेकिन तब शराब नहीं पीने के कुबोध में ही हारमोनियम के मास्‍टर हमसे छूट गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शास्‍त्रीयता से लगाव हो गया था। इसलिए तो बेहद बूढ़े हो चले &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_16.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;लल्‍ला&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की सभी ग्रामीण गीतों से पहले गायी गयी रुबाई हम ग़ौर से सुनने की कोशिश करते थे! वे फाग हों, चाहे चैती, गीत के प्रथमाक्षर से पहले वे साहित्यिक छंद पेश करते थे। छंद कुछ इस तरह होता था,&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;नागरी नवेली अलबेली बृषभान जू के&lt;br /&gt;जेवर जड़ाऊं नख शिख लो सजायो है&lt;br /&gt;फूलन की सेजन पै सोय रही चंद्रमुखी&lt;br /&gt;आयो ब्रजराज तहं औचक जगायो है&lt;br /&gt;कहें कवि दयाराम भूषण अंग शोभत अति&lt;br /&gt;दृगन की शोभा देखि मृगशावक लजायो है&lt;br /&gt;तो वाही समय एक लट लटकी कपोलन पै&lt;br /&gt;मानो राहू चंद्रमा पर चाबुक चलायो है&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;ये छंद हमें इस भागती-दौड़ती दिल्‍ली में फिर से मिल गया। हमारे दफ्तर में एक वरिष्‍ठ साथी हैं, सत्‍येंद्र रंजन। आज वे ब्‍लॉगर भी हैं। &lt;a href="http://left-liberal.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;इंक़लाब&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; उनका ब्‍लॉग है। दो साल पहले मार्च में बनारस में हुए सिलसिलेवार धमाके के बाद एनडीटीवी की ओर से गंगा घाट पर आयोजित एक लाइव कंसर्ट में जब छन्‍नूलाल मिश्रा को सुना, उसके बाद उन्‍हें और सुनने के लिए बेचैन हो गया। उस कंसर्ट में छन्‍नूलाल जी ने गाया था, &lt;a href="http://thevariegatedsky.blogspot.com/2007/03/holi-khele-digambar.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;दिगंबर खेले मसाने में होली&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। छन्‍नूलाल जी के बहुत सारे गाने मिल गये, लेकिन श्‍मशान में शिव की होली नहीं मिली। मैं शुक्रगुज़ार हूं सत्‍येंद्र जी का कि उन्‍होंने हमें एक घंटे की एक सीडी उपलब्‍ध करवायी, जो एक लाइव कंसर्ट की निजी रिकॉर्डिंग है। ये बाज़ार में नहीं है। ये दुर्गा वंदना से शुरू होती है, ठुमरी, दादरा, चैती, फाग के बाद राम-केवट संवाद पर विराम लेती है। इन दिनों जब भी मैं एक घंटे से अधिक के सफ़र में होता हूं, मेरे कानों में स्‍पीकर इसी कंसर्ट को बार-बार सुनने के लिए लगा होता है।&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/644806_jmlyuxnksr_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/644806_jmlyuxnksr_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-7915460267963062475?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/7915460267963062475/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=7915460267963062475' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7915460267963062475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7915460267963062475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='मानो राहू चंद्रमा पर चाबुक चलायो है'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-2758586969923032383</id><published>2008-01-11T09:02:00.000-08:00</published><updated>2008-01-15T10:18:05.146-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>अपनी भाषा की कविता के बारे में</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;हम&lt;/strong&gt; किसी भी इलाक़ाई भाषा से किस तरह के साहित्‍य की अपेक्षा रखते हैं? इलाक़े की संवेदना, सामाजिक वैविध्‍य और देश की मुख्‍यधारा में इलाक़े का योगदान। क्‍या मैथिली कविता इन कसौटियों पर उतरती है? अगर मैं एक प्रवासी मैथिल हूं, तो क्‍या मुझे मेरे इलाक़े की कविता अपनी मिट्टी के महत्‍व से साक्षात्‍कार कराती है? मिथिला, जो बदल रहा है, गांवों में जिस तरह जीवन मूल्‍य बदल रहे हैं, उसकी आहट कविता दे रही है या फिर पुराने मुहावरों के खोल में घुसी हुई कविता सिर्फ स्‍मृतियों की चित्रकारी बनी हुई है? प्रकाशनों की कठिन डगर और साहित्‍य संपर्क की संकरी गलियों में टहलने के चलते मिथिला का काव्‍य संस्‍कार पूरी तरह हमारे सामने नहीं है, इसलिए मैं मैथिली कविता पर बोलने, बात करने के लिए सही अथॉरिटी नहीं हूं। लेकिन छोटे भूगोल वाली भाषाओं की सीमा और सहूलियत ये होती है कि इसमें हम बिना विशेषज्ञता के भी अपने अनुभव शेयर करते हैं। इसी सहूलियत का लाभ उठाते हुए मैथिली कविता पर थोड़ी बात करने का साहस कर रहा हूं।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सामने नारायणजी की एक कविता है। &lt;strong&gt;मंदिर&lt;/strong&gt;। कविता में मंदिर एक प्रतीक है, जिसकी धुरी पर बदले हुए गांव की कथा कही जा रही है। ताश खेलना हो तो मंदिर पर चलो, जुआ-चिलम करना है तो मंदिर पर चलो। पुराने सामाजिक मूल्‍य के हिसाब से जो अनैतिक है, उसका अड्डा पुराने समाज की सबसे पवित्र जगह बन रहा है। अंत में एक सवाल है कि ऐसा ही मंदिर अयोध्‍या में बनाने की भी कोशिश हो रही है। छोटी-सी कविता में नये मिथिला में बनते हुए सामाजिक मुहावरे भी हैं और एक ताक़तवर राजनीतिक टिप्‍पणी भी। ये कविता नयी सदी के पांचवें या छठे साल में लिखी गयी और अंतिका के अप्रैल 05 - मार्च 06 कें संयुक्‍तांक में छपी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पचास साल पहले &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Nagarjun" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;यात्री नागार्जुन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की कविता देखिए। &lt;strong&gt;उमा भाइ छोड़लनि फुफकार&lt;/strong&gt;। इस कविता में यात्री जी एक ऐसे अहम्‍मन्‍य आदमी की कथा कहते हैं, जो अपने विपक्षी का गला रेतने वाले को हज़ार रुपये इनाम देगा। इनाम ही नहीं हत्‍या के मुक़दमे की पैरवी के लिए दो हज़ार और देगा। वो आदमी बताता है कि उसका बेटा रेल में अफसर है और बेटी का ससुर रावण का अवतार है। इस पूरी घटना का गवाह बनने के लिए वो पूरे समाज को आमंत्रित भी करेगा। यानी समाज में उमा भाई जैसे लोगों के लिए जगह है और सम्‍मान भी। यात्री नागार्जुन की ये कविता मिथिला दर्शन के मई 1954 के अंक में छपी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दोनों संदर्भ कविताओं के समय में पचास साल का फर्क है और ये दोनों ही कविताएं अपने समाज पर तीखा व्‍यंग्‍य है। जाति और गोत्र की पवित्रता-श्रेष्‍ठता गाने वाली काव्‍य-पीढ़‍ियों के बीच मैथिली कविता की ये धारा अभी भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही है - क्‍योंकि आलोचना की समग्रता में इस धारा का मूल्‍यांकन अभी नहीं हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैथिली कविता में सौंदर्य के कुछ ख़ास ज़मीनी बिंब मिलते हैं, जो मुग्‍ध करते हैं। ये बिंब अभिजात संस्‍कार का अतिक्रमण करते हैं, मैथिली कविता को नया रास्‍ता दिखाते हैं। एक बानगी कुलानंद मिश्र की यही कविता है - &lt;em&gt;ओ धान रोपैत हाथ सं सीउथ परक खढ़ कें हटौने रहय। थोड़े गिल्‍ल माटि ओकरा कपार पर टिकुलि जकां सटि गेल रहै। हम सोचने रही। एहने रमनगर मुद्रा मे हमरो आंगनवालीक फोटो बेजाय तं नहिये लगतनि।&lt;/em&gt; (धान रोपते हुए उसने अपनी मांग से एक खर (-पतवार) हटाया। थोड़ी गीली मिट्टी उसके माथे पर टिकुली की तरह चिपक गयी। हम सोचने लगे। ऐसे ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में मेरी बीवी की तस्‍वीर भी बुरी नहीं लगेगी।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कविताएं ऐसी हैं, जिसका रुप-बिंब, जिसके मुहावरे दूसरे भूगोल वाले पाठकों को भी समझने में आसानी होगी। लेकिन असल लोकभाषा का सबसे मौलिक रचाव भी मैथिली कविता में इस वक्‍त सक्रिय है, जिसको समझने के लिए मैथिल होना ज़रूरी है। हरेकृष्‍ण झा ऐसे ही प्रगतिशील मैथिली कवि हैं, जिनकी काव्‍य भाषा अनुवाद के लिहाज़ से सर्वाधिक जटिल है। लाल धामा, रसनचौकी, रागभास, कलमबाग, अकादारुन आदि-आदि जैसे शब्‍द अब मैथिली कविता के बाड़ से बाहर हो रहे हैं। लेकिन हरेकृष्‍ण झा ऐसे हज़ार-हज़ार शब्‍दों के माध्‍यम से नये मिथिला का कथा-काव्‍य रच रहे हैं। हरेकृष्‍ण झा लंबे समय तक जनांदोलनों में सक्रिय रहे हैं। ऐसी पृष्‍ठभूमि से आये लेखकों के बारे में आमतौर पर ये समझ होती है कि वे पुराने लोकमुहावरों और शब्‍दों से इसलिए परहेज करते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि भाषाई अभिव्‍यक्ति के ये औजार सामंती बुनावट वाले हैं। मैथिली की बहुत सारी प्रगतिशील कविताओं में इस्‍तेमाल की गयी भाषाओं से भी ये धारणा बनी, जिसमें ऐसे नारे-मुहावरे आये, जो सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठते थे। लेकिन हरेकृष्‍ण झा का शब्‍द संसार मिथिला की मिट्टी और हरित वन क्षेत्रों की कहानियों से भरा हुआ है, जिसमें आधुनिक जीवन मूल्‍य की क्रांतिकारी अनुगूंजें लोकगीत की तरह मौजूद हैं। पिछले चार दशक से हरेकृष्‍ण कविताएं लिख रहे हैं और अब जाकर उनका एक संकलन छप सका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक उसी तरह विद्यानंद झा की कविताएं भी स्‍मृतियों के ऐसे आख्‍यान में हमें ले जाती हैं, जहां से मिथिला की रीति-नीति को समझने में आसानी होती है। उनकी कविताएं दार्शनिक अंदाज़ में एक मैथिल प्रवासी की दैनंदिन अ‍नुभूतियों की ऐतिहासिक व्‍याख्‍या करती है। उनकी एक शृंखलाबद्ध कविता है, मृत्‍यु से पहले। कविता कहती है कि सामाजिक रूप से दिखती हुई निष्‍ठा दरअसल कितनी विसंगतियों का लेखा-जोखा होती है। कविता कहती है कि मरने से पहले आदमी की मानवीय कुंठाएं कैसे सहज रूप से प्रदर्शित होने लगती हैं। आखिरी वक्‍त के दारूण विवरण भी कविता को ख़ास बनाते हैं। जैसे एक बहुत ही सामान्‍य-सी दिखने वाली पंक्ति है, जो पूरी कविता में एक लय की तरह बंधी हुई है, आप देखें - उठैत सुरुजक संग / उठैत अछि बुरहीक राग / शांत होइत अछि / सांझ भेला पर / थाकि गेला पर। (उठते हुए सूरज के संग / उठता है बूढ़ी का राग / शांत होता है शाम होने पर / थक जाने पर) विद्यानंद झा के पास ऐसी कविताओं की लंबी फेहरिस्‍त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तमाम कवि अस्‍सी और दो हजार के बीच सक्रिय रहे हैं। लेकिन जो नवान्‍न हैं और नब्‍बे के बाद जिन्‍होंने अपने अस्तित्‍व से संघर्ष करती हुई मैथिली को अपनी अभिव्‍यक्ति के लिए चुना, उनकी कविताएं भी मैथिली को एक नया विस्‍तार देती हैं। इनमें से ज्‍यादातर कवि शहरी संवेदनाओं के साथ बड़े हुए, लेकिन जड़ों की तलाश की छटपटाहट इन्‍हें बार-बार ग्रामीण संवेदनाओं के सामने बौना सिद्ध करती रही। ये समस्‍याएं उन महिला रचनाकारों के लिए ज्‍यादा रही, जिनके लिए सामाजिक जकड़बंदी के चलते इन दोनों संवेदनाओं का ख़ास मतलब नहीं है। गांवों में उनके हिस्‍से पर्दा और दीवार है और शहर की आधुनिकता का दरवाज़ा भी उनके लिए ज़्यादा नहीं खुला है। मुक्‍ता की एक कविता प्रैक्टिकल इस बेचैनी को शब्‍द देती है - मेडिकल तैयारी लेल / बहरेबाक हमर रस्‍ता भेल बन्‍न / पिता कहलनि, नहि अछि बुत्ता / मर्यादा आ कुल-प्रतिष्‍ठा लग नत प्रतिभा / गामक माटि-पानि मे चासनी बनि घुलि रहल अछि / आ हम भविष्‍य तकैत क' रहल छी होम साइंसक प्रैक्टिकल... (मेडिकल की तैयारी लेल / बाहर जाने का रास्‍ता हुआ बंद / पिता ने कहा, नहीं है औकात / मर्यादा और कुल प्रतिष्‍ठा के आगे नत प्रतिभा / गांव की मिट्टी-पानी में चाशनी बन घुल रही है / और हम भविष्‍य को देखते हुए कर रहे हैं होम साइंस का प्रैक्टिकल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ऐसे कवि ज्‍यादा हैं, जो मिथिला में नहीं रहते।  रोजी-रोटी और दूसरी कई वजहों से वे परदेस में रहते हैं। मैथिली में लिखना उनके लिए परायों की भीड़ में मौलिक होने की छटपटाहट भी होती है, इसलिए वे लिखते हैं। उनमें हम एक भाषा का अपना प्रवाह न भी देखें, तो संवेदना और स्‍मृतियों का प्रवाह ज़रूर मिलेगा। कृष्‍णमोहन झा, सारंग कुमार, संजय कुंदन, कुमार मनीष अरविंद, धीरेंद्र प्रेमर्षि, रमण कुमार सिंह, नूतन चंद्र, कामिनी, विनय भूषण, अजित कुमार आजाद, पंकज पराशर अपनी भाषा में सक्रिय ऐसे ही प्रवासी कवि हैं। प्रगतिशील काव्‍यधारा में पलास के वन और नागफनी जैसे गैरमैथिल शब्‍द-बिंबों के प्रयोग वाली अनेकानेक कविताओं को छोड़ दें, तो ज़्यादातर कविताएं मिथिला को समझ रही हैं और अभिव्‍यक्‍त कर रही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जिस एक कवि से मैं सबसे ज्‍यादा प्रभावित रहा हूं, वे हैं तारानंद वियोगी। वे दलित परिवार से आते हैं और उनकी कविता उन्‍नत सामाजिक चेतना से भरी-भरी होती है। अंतिका में ही उनकी कविता बाभनक गांव छपी, जो मिथिला के सामाजिक सत्ता-संघर्ष का इतिहास-वर्तमान इस तरह बताती है, जैसे कोई आदमी चीख़ रहा है, रो रहा है और सबसे दारुण दुख को अपनी अंतरात्‍मा से गा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैथिली कविता ऐसी ही असंख्‍य लय की तलाश में भारतीय भाषा साहित्‍य में एक ख़ास जगह बना रही है।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-2758586969923032383?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/2758586969923032383/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=2758586969923032383' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2758586969923032383'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2758586969923032383'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/01/blog-post_11.html' title='अपनी भाषा की कविता के बारे में'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-6577677006324504060</id><published>2008-01-03T04:42:00.000-08:00</published><updated>2008-01-03T05:38:05.152-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>वो काग़ज़ की कश्‍ती वो बारिश का पानी!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;नौजवानी&lt;/strong&gt; में एक अजीब सी गुन-धुन होती है। आप आवारा हैं और मां-बाप का आप पर बस नहीं, तो आप या तो कुछ नहीं बनना चाहते या सब कुछ बन जाना चाहते हैं। जैसे एक वक्त था, जब मुझे लगता था कि मैं भारतीय सिनेमा का एक ज़रूरी हिस्सा बनूं। ठीक-ठीक ऐसा ही ख़याल नहीं होगा। ख़याल ये होगा कि या तो बड़ा अभिनेता बनूं या बड़ा निर्देशक। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mukesh" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मुकेश&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की मोटी जिल्दवाली किताबें देख कर नाक से गाने वाले दिनों में ये भी ख़याल रहा होगा कि गायक ही बन जाऊं। जो चीज़ें हमें बांधती थीं, वो सब हम होना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय समाज की फूटती हुई कोंपलों के ये ख़याल बताते हैं कि सिनेमा का उस पर कितना गहरा असर है। ये असर रंगों-रोशनियों का है, जो आमतौर पर हमारे समाज से अब भी ग़ायब हैं। गांवों में अगर बिजली गयी है, तो अब भी बहुत कम रहती है। देश के बड़े शहरों के अलावा जो बचे हुए शहर और कस्बे हैं, वहां तो पूरे-पूरे दिन और पूरी-पूरी रात बिजली होती ही नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो दिन थे, जब चंदा जुटाया जाता था। हर घर से पांच-पांच रुपये की रक़म बंधती थी। साठ रुपये हो जाते थे, तो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी और तीन सिनेमा के कैसेट आते थे। सत्तर रुपये में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी रंगीन हो जाती थी। बैटरी ज़रूरी था। फिर जगमगाते बलखाते सीन के बीच बिना पलक झपके रतजगा होता था। ये रतजगा हममें से कइयों के बचपन का हिस्सा रहा होगा और अब हमारी स्मृतियों की सबसे बारीक, मुलायम परत पर वो रतजगा मौजूद है।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन की फिल्मों के नाम नहीं होते। वे सिर्फ जादू होते हैं। हर नया सिनेमा तब एक वाक़या होता था। उन वाक़यों से हमारी मुठभेड़ हमें पैसे चुराने का साहस देती थी। हम पैसे चुरा कर फिल्में देखते थे और मार खाते थे और फिर फिल्में देखते थे। सिनेमा देखने जैसे नैतिक असमंजस ने कभी हमारे मनोबल को नहीं गिराया। इसके बावजूद नहीं, जब आठवीं की तिमाही परीक्षा में सात विषयों के अंक लाल घेरे में रंग कर सामने रख दिये गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों, जब हमारी मासूम आंखें परदे को पूरा-पूरा देख भी नहीं पाती होंगी, बाबूजी पांच बहनों और तीन बेटियों के अपने परिवार को &lt;strong&gt;गंगाधाम&lt;/strong&gt; दिखाने ले गये थे। दरभंगा के &lt;em&gt;सोसाइटी सिनेमा हॉल&lt;/em&gt; में तब लोकभाषाओं की फिल्में लगती थीं। क्या देख पाये, क्या नहीं, अब याद नहीं। इतना ही याद है कि गांव में उसके बाद जहां कही चार लोगों के बीच मैं फंसता और वे मुझे गाना सुनाने को कहते, तो मैं सुनाता था- &lt;em&gt;मोर भंगिया के मनाय दs हो भोले नाथ, मोर भंगिया के मनाय दs।&lt;/em&gt; इसके बाद थोड़ी मूढ़ी (फरही) देकर सब मुझे भगा देते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव में नये पहुना का मान तब तक नहीं होता था, जब तक वे ससुराल के नौनिहालों के साथ बैठकर सिनेमा हॉल में कैम्पाकोला की पार्टी नहीं देते थे। ऐसी टोलियों में जाकर हमने &lt;a href="http://www.youtube.com/results?search_query=masoom+%281983%29&amp;search=Search" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मासूम&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; देखी, &lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=O2lvkumf1hs" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;सदा सुहागन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; देखी। नाम याद रखने लायक होश में आने से पहले देखी हुई फिल्मों के नाम ज़ेहन में नहीं हैं। चंद रोशनियों की खुदबुदाहट है, जो अब भी कभी-कभी अवचेतन में चमक उठती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी बहनों का हीरो जीतेंद्र था। लिहाजा हम भी &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jeetendra" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;जीतेंद्र&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; को अपना हीरो मानते थे। जबकि वे जीतेंद्र के ढलते हुए दिन थे। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Amitabh_Bachchan" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अमिताभ बच्चन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; कांग्रेस की राजनीति में उलझे हुए थे। &lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=vKHT3QDzEg0" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;डिस्को डांसर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के बाद &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Mithun_Chakraborty" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मिथुन चक्रवर्ती&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; शबाब पर थे और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Govinda_(actor)" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;गोविंदा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का जलवा अब आने ही वाला था। आप सोचिए, भारतीय सिनेमा के इन चंचल चितेरों ने हमारी किशोर दुनिया को किस कदर बेचैन कर दिया होगा। हम नाचना चाहते थे। चीखना-चिल्लाना चाहते थे। लेकिन घर की धीर-गंभीर दीवारें आंखें तरेर कर देखती थीं। हम सहम कर कोर्स की किताबें ढूंढ़ने लग जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन फिर भी अगला सिनेमा देखने के लिए सेंध मारने की तैयारी में जुट जाते थे।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-6577677006324504060?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/6577677006324504060/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=6577677006324504060' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6577677006324504060'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6577677006324504060'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='वो काग़ज़ की कश्‍ती वो बारिश का पानी!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-2702289716234764493</id><published>2007-12-28T21:21:00.000-08:00</published><updated>2007-12-28T21:27:34.556-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>बेटी है ठुमरी उम्‍मीदों की टेक</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;a href="http://shravanidas.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;श्रावणी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के लिए&lt;/em&gt;&lt;blockquote&gt;छोटी सी चादर रजाई सा भार&lt;br /&gt;फाहे सी बेटी हवा पर सवार&lt;br /&gt;मां की, बुआ की हथेली कहार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रे हैया रे हैया&lt;br /&gt;रे डोला रे डोला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चावल के चलते सुहागन है सूप&lt;br /&gt;जाड़े की संगत में दुपहर की धूप&lt;br /&gt;सरसों की मालिश में खिला खिला रूप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रे हैया रे हैया&lt;br /&gt;रे डोला रे डोला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे-से घर में है बालकनी एक&lt;br /&gt;बेटी है ठुमरी उम्‍मीदों की टेक&lt;br /&gt;चादर को देती है पांवों से फेंक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रे हैया रे हैया&lt;br /&gt;रे डोला रे डोला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उजाले का दिन अंधेरे की रात&lt;br /&gt;उनींदे में हंस हंस के करती है बात&lt;br /&gt;फूल सी फुहारे सी नन्‍हीं सौगात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रे हैया रे हैया&lt;br /&gt;रे डोला रे डोला&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-2702289716234764493?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/2702289716234764493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=2702289716234764493' title='39 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2702289716234764493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2702289716234764493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/12/blog-post_28.html' title='बेटी है ठुमरी उम्‍मीदों की टेक'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>39</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4303256830371175915</id><published>2007-12-22T10:42:00.000-08:00</published><updated>2007-12-22T11:08:46.112-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>बन में बोलन लागे मोर</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R21f3sG2qCI/AAAAAAAABvY/yVWuc_D-eiE/s1600-h/saawan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R21f3sG2qCI/AAAAAAAABvY/yVWuc_D-eiE/s200/saawan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5146875359491696674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;हमारे गांव&lt;/strong&gt; के किनारे से एक नदी बहती है। बागमती। कई बार हमने उसके ओर-छोर की खोज की और ज्यादा से ज्यादा एक बांध के ओर-छोर को ही जान पाये। नदी किनारे एक मंदिर और डोम के दो-चार घर की याद है। एक डोमिन थी, जो बांस के सामान घर में दे जाती थी। उसका चेहरा हमारी मां से मिलता था। एक बार बाढ़ की रिपोर्टिंग करने पटना से गांव गया, तो डोमिन एक तंबू तान कर बांध पर रह रही थी। हम शहर के स्‍टूडियो से भाड़े का कैमरामैन ले‍कर पहुंचे थे। उस डोमिन की तस्‍वीर अख़बार में छपी, जिसे शायद वह नहीं देख पायी होगी। अख़बार का सर्कुलेशन उतना नहीं था, जो बाढ़ विस्‍थापितों से भरे बांध तक पहुंच पाता।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सावन में बाढ़ आती थी। सावन में ही कांवरियों की टोली बाबाधाम के लिए निकलती थी और फूल गये पांव में पट्टी बांध कर लौटती थी। हमारे घर चिउड़ा, इलायची दाना और पेड़े का एक टुकड़ा आता था। साथ में केसरिया रंग की बद्धी भी आती थी, जिसे गले में लटकाये हमारा बचपन बीता है। प्रगतिशीलता की ऐसी पहली बयार कभी नहीं बही कि हम उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 99 के सावन में मेरी मां मरी। बांध के पार बाढ़ थी, इसलिए हमारी आम गाछी में उसे जलाया गया। एक पेड़ को काटकर चिता बनायी गयी। मेरा हाथ पकड़कर उस चिता में चारों दिशाओं से किसी आग दिलवायी और वो धू-धू करके जल उठी। कई लोग सावन में मरते हैं और सुना है जलाने के लिए लकड़ी नहीं मिलती। मिल भी जाती है, तो जलने में मुश्किल होती है। रिवाज ये है कि जब तक चिता पूरी न जले, कठिहारी (हमारे यहां का शब्‍द है लाश के साथ श्‍मशान गये लोगों के लिए) में गये लोग वापिस नहीं लौटते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सावन में हमने कम लोगों को सुखी देखा है। एक बार गांव के अपने दोस्‍त भाई के साथ किसी बीयर बार में शाम बिता कर हम शहर में ख़ूब भीगे और सखी-सहेलियों के बारे में बातें करते रह गये। शहर से गांव पैदल लौटे। वो बेहतर गवैया है और होली में उसके रहने से गांव में रौनक रहती है। वो पिछले कई सालों से गांव जा रहा है और मैं पिछले कई सालों से गांव नहीं गया हूं। आजकल वो आईसीआईसीआई बैंक के लखनऊ ब्रांच में अफसर है और उसने कार भी ख़रीद ली है। मेरी ही तरह फैल गया है और कोई बता रहा था, इस साल जो होली बीती, उसमें वह अपनी कार से गांव गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैथिली के एक नाटककार हैं महेंद्र मलंगिया। उनका एक नाटक है - ओकरा आंगनक बारहमासा। बारह महीने के दुखी-दारुण जीवन की दिल को बेधने वाली कारुणिक कथा है। उसमें सावन का एक रुलाने वाला राग है। वरना सावन के सुख में भीगे गीतों को ही हम जानते हैं। सावन में ही &lt;a href="http://www.beatofindia.com/forms/kajri.htm" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कजरी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; गायी जाती है और अक्‍सर विरह के सुर में होती है। हम ज़‍िंदगी की बेहतरीन सुबहों में अपनी बुआओं से कजरी सुनते आये हैं। बाद में रेडियो स्‍टेशन से कजरी के कई अंदाज़ हमारे हिस्‍से आये। &lt;a href="http://delhi.kijiji.in/c-For-Sale-Music-Movies-documentary-film-Padmashree-Vindhyavasini-Devi-works-life-W0QQAdIdZ27848653" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;पद्मश्री विंध्‍यवासिनी देवी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की आवाज़ में कजरी सुनी। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shubha_Mudgal" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;शुभा मुदगल&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Shobha_gurtu" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;शोभा गुर्टू&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने भी कजरी गायी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जो कजरी हमने &lt;a href="http://www.worldwiderecordsindia.com/artist_details.asp?artistid=8" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;छन्‍नूलाल मिश्रा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की आवाज़ में सुनी है, उसका कोई जवाब नहीं है। बनारसी फकीरी वाली आवाज़। गंगाघाटों पर आवारा उड़ते हुए कुछ खोजती-सी। पान की खस-खस से भरी हुई। दीवाना बनाने के लिए सबसे निर्गुण आवाज़। ऐसी आवाज़ इस धरती पर अकेली है। सुनिए, उनकी आवाज़ में ये बेमिसाल बनारसी कजरी,&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/608719_pbcjocefzy_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/608719_pbcjocefzy_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-4303256830371175915?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/4303256830371175915/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=4303256830371175915' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4303256830371175915'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4303256830371175915'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/12/blog-post_22.html' title='बन में बोलन लागे मोर'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R21f3sG2qCI/AAAAAAAABvY/yVWuc_D-eiE/s72-c/saawan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4006825765969391693</id><published>2007-12-15T10:45:00.000-08:00</published><updated>2007-12-15T11:01:06.378-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>शहनाई के सुर में वे दिन!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;थी वो शहनाई&lt;/strong&gt;, जिसकी मूठ पर दो पतली पत्तियां पसीने की तरह चमकती थी। हमारे बरामदे पर दो छरहरी काली देह वाले ग़रीब आदमी के होठों में सटकर उससे जो धुन निकलती थी, उसने हमारी ज़‍िंदगी की लय तैयार की है। बुआओं के ब्‍याह के वक्‍त तक हमारे पांव मिट्टी पर नंगे ही रहते थे, तब से हम इससे निकलने वाली धुन के दीवाने हैं। आख़‍िरी बार चाचा के ब्‍याह में बजी थी शहनाई, उसके बाद गांव ही छूट गया। मां ने उस ब्‍याह में बड़े शौक से बैंड पार्टी बुलायी थी। चाचा को बेटे जैसा पाला था न, इसलिए। बैंड वालों और शहनाई के ग़रीब कारीगरों की जुगलबंदी जमी नहीं। उदास मन से दो पतली काया अपनी अपनी शहनाई लेकर विदा हो गयी। कलाकार सिरचन की तरह, जिसके मन को &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Phanishwar_Nath_'Renu'" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;फणीश्‍वरनाथ रेणु&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की कहानी में ठेस लग गयी। &lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीती सदी में मां गुज़र गयी। इस सदी में &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bismillah_Khan" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;शहनाई के उस्‍ताद&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। पिछले सात सालों में एक बार ही गांव गया। &lt;a href="http://shravanidas.blogspot.com/2007/12/blog-post_08.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;लाल दीदी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के ब्‍याह में, लेकिन शहनाई नहीं बजी। बाद में शादी भी टूट गयी। दर्द के अपने किस्‍से होते हैं- उसको बहुत बांटा जाए, ये तहज़ीब को मंज़ूर नहीं। हमने तो शहरों में ये भी देखा है कि आगे आगे शव के साथ निर्गुण नारे लगाता काफिला चलता है और पीछे-पीछे शहनाई बजती है। एक ऐसा वाद्य और उसकी धुन, जो उदासी के बादल भी समेटती है और उत्‍सव का राग-रंग भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो ज़माना भी आया, जब लाउडस्‍पीकर वाले से हम नयी फिल्‍म के कैसेट के बारे में पूछते थे। वो हमारे मन से शाम तक तो यही सब बजाता था, लेकिन जैसे ही मर्करी की झक उजली रोशनी से मड़बा (मंडप) जगमग करने लगता, वो शहनाई के कैसेट बजा कर कमरे में ताला लगा देता और छत की मुंडेर पर खड़े होकर बाराती के लगने का इंतज़ार करने लगता। हमारी फरमाईश बाद में जाती रही और बहनों की शादी में हमने शहनाई बजवायी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्‍छी धुनों से सजा-संवरा बचपन ऐसे ही फरमाईशों की बाज़ारू ज़‍िद से कन्‍नी काटता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस्‍ताद बिस्मिल्‍ला खान से कभी मिला नहीं, लेकिन उनके बेहतरीन इंटरव्‍यू जहां-तहां पढ़े। पढ़ कर दीवाने हुए और ऑडियो सुन-सुन कर तो और भी। बनारस की मस्‍ती और कबीर का फक्‍कड़ अंदाज़ उनकी अदा रही और साज़ और आवाज़ की बिगड़ी हुई लय वाली नये संगीतकारों की जमात पर वे अक्‍सर उसी अदा में फिकरे कसते रहे। जलतरंग के बाद एक शहनाई ही इस कस्‍बाई शहराती को अपनी ओर खींचती रही, इसलिए जब-तब हम अच्‍छी धुनों की खोज में भटकते भी रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहनाई की एक ऐसी धुन से आज हम आपका तआरुफ़ करवाते हैं, जो विवाह के वक्‍त बजायी जाती है। इसमें चैती की लय है और कलाकार बिस्मिल्‍ला के सिवा और कौन हो सकते हैं। तो करते हैं बिस्मिल्‍ला।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/604155_pfxpuutuvz_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/604155_pfxpuutuvz_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-4006825765969391693?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/4006825765969391693/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=4006825765969391693' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4006825765969391693'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4006825765969391693'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='शहनाई के सुर में वे दिन!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-85257729541538413</id><published>2007-11-27T06:49:00.002-08:00</published><updated>2007-12-10T23:12:52.868-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्‍तों का घर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>चेंबूर, विद्या बालन का घर और सुबह की गुफ्तगू</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R0xB3S3jKDI/AAAAAAAABPY/w7kMj6mzCOk/s1600-h/vidya-balan.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R0xB3S3jKDI/AAAAAAAABPY/w7kMj6mzCOk/s320/vidya-balan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5137553693136332850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p align="right"&gt;इधर मेरा मोबाइल ग़ुम हो गया, तो सारे नंबर भी चले गये। उसमें &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vidya_Balan" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;विद्या बालन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का नंबर भी था। उनका नंबर मैंने कहीं अलग से लिखा भी नहीं था। एक दिन अपने ऑफिस की टेल डायरी से मुझे विद्या बालन का नंबर मिला। पर इस नंबर को लेकर संशय था कि पता नहीं ये उनका सीधा नंबर है या वाया मीडिया वाला नंबर। मैंने एक एसएमएस किया, जिसका जवाब मिला नहीं। परसों अचानक इस नंबर से जवाब मिला - “हाय अविनाश, बुखार था इसलिए रिप्‍लाइ नहीं किया। सब ख़ैरियत? आप कैसे हैं?” और एक बार फिर विद्या से टूटी हुई बातचीत का सिलसिला शुरू हो पाया। मैं उन दिनों &lt;a href="http://rajansurendra.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;सुरेंद्र राजन जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के साथ रहता था। विद्या से मिलने की बात किसी बरिस्‍ता में तय हो रही थी। लेकिन एक शाम विद्या का एसएमएस आया कि सुबह घर पर आ जाइए, इत्‍मीनान से बात हो पाएगी। &lt;a href="http://www.planetbollywood.com/Film/Parineeta/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;परिणीता&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की रिलीज़ के बाद उनका एक-एक मिनट क़ीमती था, इन्‍हीं में से मेरे लिए उन्‍हें वक्‍त निकालना था। एक ऐसी बातचीत के लिए, जिसका प्रस्‍तोता न कोई टीवी था, न कोई अख़बार, न ही कोई बड़ी फिल्‍मी पत्रिका। सुबह-सुबह हम पुराने जूते रास्‍ते में बूट पालिश से चमका कर चेम्‍बूर पहुंचे, विद्या के घर। एक मध्‍यवर्गीय बैठकखाने में सुबह की अलसायी चादरों से ढके गद्दे पर बैठे कुछ मिनट ही हुए कि एकदम से ताज़ा-ताज़ा विद्या सामने खड़ी हो गयीं। फिर हमने एक कोने में बैठ कर खूब बात की। विद्या ने अपनी मां से मुलाक़ात करवायी और घर में काम करने वाले लोगों से भी। वहां से लौटे, तो ये तय था कि फिर शायद ही विद्या हमें वक्‍त दे पाएंगी, क्योंकि परिणीता के बाद बॉलीवुड में उनके छा जाने की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। लेकिन शाम को उनका एसएमएस आया कि सुबह की बातचीत अच्‍छी रही। वो बातचीत अब तक कहीं शाया नहीं हो पायी। अचानक पुरानी सीडीज़ चेक करते हुए मिल गयी, तो लगा कि इसे साझा करना चाहिए। बातचीत वैसी की वैसी रखी जा रही है, जैसी हुई। कोई एडिटिंग नहीं। उम्‍मीद है, विद्या को भी इस बातचीत की याद परिणीता के दिनों में ले जाएगी।&lt;/p&gt;&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;हालांकि ये सवाल आपको पूछना चाहिए, पर मैं पूछ रहा हूं। परिणीता आपको कैसी फिल्म लगी?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;काम करते वक्त बहुत मज़ा आया। दादा (&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pradeep_Sarkar" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रदीप सरकार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;) पर मेरा विश्‍वास बहुत ही स्ट्रांग है। तो मेरे खयाल से मुझे पता था कि अच्छी फिल्म बनेगी, और अच्छी फिल्म बनी है। मैंने प्रीमियर में पहली बार देखी परिणीता। बहुत अच्छी लगी, और मुझे लगा कि शायद मैंने काम किया है, तो मैं ऑब्जेक्‍टेवली नहीं देख पाऊंगी। आइ मीन... इस फिल्म को मुझे जहां रुलाना चाहिए, नहीं रुलाएगी। कुछ-कुछ जगह पर ऐसा हुआ भी, पर कुल मिला कर बहुत अच्छी फिल्म लगी।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;किसी नवजात अभिनेत्री के लिए पहली ही बार में परिणीता की भूमिका किस तरह की चुनौती है?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;दरअसल परिणीता जो है, लॉलिता का कैरेक्टर जो है, बहुत ही लेयर्ड है। बहुत सारे... जिसको कहते हैं हाव-भाव, वो है... दादा जैसे डायरेक्टर इस तरह की भूमिका के लिए आपसे बहुत कुछ चाहते हैं। सिर्फ वो नहीं, जो स्क्रिप्ट में हो। तो हमने तैयारी भी ऐसे की थी। मेरे दिमाग में ये बात नहीं थी कि क्या मै कर पाऊंगी, नहीं कर पाऊंगी, मैं पहली बार कर रही हूं, ऐसा कुछ नहीं था। मैं केवल मेहनत कर रही थी ताकि जो रोल मुझे दिया गया हो, मैं उसे सच्चाई के साथ निभा पाऊं।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;किस-किस तरह की दिक्कतें आयीं परिणीता को अपने भीतर एडॉप्ट करने में? आप परिणीता से पहली बार कैसे परिचित हुईं? नॉवेल पढ़के या...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;नहीं, पहले दादा ने स्टोरी सुनायी थी मुझे परिणीता की, क्योंकि वो लिख रहे थे। फिर उन्होंने कहा कि तुम्हें नॉवेल पढ़ना चाहिए और जो इस नॉवेल पर पहले की फिल्में हैं, वो भी देखनी चाहिए तुम्हें। तो मैंने फिल्म देखी। पढ़ा, पर हिंदी का बहुत ही खराब ट्रांसलेशन पढ़ा। मैं होप कर रही हूं कि कोई उसे अच्छी तरह से अभी ट्रांसलेट करे (हंसते हुए)... क्योंकि इस ट्रांसलेशन को पढ़ने में काफी दिक्कत हुई। यही थी तैयारी, बाकी तो तैयारी... जिस हिसाब से स्क्रिप्ट लिखी गयी है, उसको पढ़के तैयारी की मैंने। मगर सब कुछ धीरे-धीरे हुआ। एक ही दिन में मैं लॉलिता नहीं बन पायी। बहुत बार स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद... दादा के साथ, और दूसरे कैरेक्टर्स के साथ स्क्रिप्ट डिस्कस करने के बाद... और शूट के वक्त... आइ थिंक, दैट प्रॉसेस स्टार्टेड ऑल द मॉन... स्लोली एंड स्ट्रेडली स्टार्टेड थिंकिंग इन टू द कैरेक्टर...&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;आपने &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Bimal_Roy" target="_blank"&gt;बिमल रॉय&lt;/a&gt; की परिणीता कब देखी? यानी प्रदीप सरकार की परिणीता शूट होने के कितने दिन पहले?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;दो-तीन महीने पहले...&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;पहले कभी परिणीता के बारे में सुन रखा था!&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;हां-हां, सुना तो था कि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Meena_Kumari" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मीना जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने इस रोल को मॉडेलाइज किया था... और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Moushumi_Chatterjee" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मौसमी जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने भी ये रोल किया है, बंगाली में... तो सुना तो बहुत था उसके बारे में, पर देखा नहीं था। जब डिसाइड हुआ कि मैं करनेवाली हूं फिल्म, तब देखा मैंने।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;बिमल रॉय की परिणीता क्लासिक है, क्योंकि सिनेमा के चिंतक और व्याख्याकार और क्रिटिक बताते हैं कि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sarat_Chandra_Chattopadhyay" target="_blank"&gt;शरत बाबू&lt;/a&gt; के नॉवेल की पूरी संवेदना बिमल रॉय ने स्क्रीन पर उतारी थी। प्रदीप सरकार की परिणीता और बिमल रॉय की परिणीता में किस तरह का फर्क है?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;बहुत फर्क है, क्योंकि दो डायरेक्टर्स के इंटरप्रीटेशन में बहुत फर्क होता है। हमने क्लासिक बनाने की कोशिश नहीं की, एक अच्छी फिल्म बनाने की कोशिश की है... और... हर डायरेक्टर का जो है वो अलग इंटरप्रेटेशन होता है। और जाहिर है दादा का आग्रह दूसरा था। काफी उन्होंने लिबर्टीज लिये हैं स्टोरी के साथ। पर... दैट इज पार्ट ऑफ हिज विजुअलाइजेशन... लोगों को ये समझना चाहिए कि हर डायरेक्टर का एक अलग नज़रिया होता है। एक ही किताब आप अपनी तरह से पढ़ेंगे, मुझे अपनी तरह से भाएगा। तो जिस तरह से आप उसे स्क्रीन पर दर्शाएंगे... या दिखाएंगे, वह पूरी तरह से अलग होगा, जिस तरह से मैं उसे दिखाऊंगी। तो ये सब्जेक्टिव है बहुत... और बिमल रॉय जी बहुत ही बड़े डायरेक्टर थे। उन्होंने बहुत अच्छी-अच्छी फिल्में बनायी हैं, पर हमारी कोशिश अलग थी। हम ये नहीं चाहते थे कि बिमल रॉय की फिल्म को ही हम नये चेहरों में उतार दें। यह महज इत्तफाक है कि परिणीता एक ऐसी कहानी थी, जिस पर बिमल रॉय ने भी फिल्म बनायी थी... बाकी हमलोगों ने तुलनात्मक अध्ययन के नज़रिये से भी फिल्म नहीं बनायी।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;परिणीता की शूटिंग के वक्त आपको मीना कुमारी की याद आती थी?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;कभी-कभी मैं जिस तरह से वाइस माड्यूलेट करती हूं, दादा कहते हैं कि चलो कभी-कभी लगता है कि तुम मीना कुमारी की री-इनकार्नेशन हो... मज़ाक़ में... (हंसती हैं)... मिस्टर चोपड़ा जी (विधु विनोद चोपड़ा) के ऑफिस में मीना जी की बहुत खूबसूरत एक तसवीर है... (फिर थोड़ा रुक कर हिचकिचाते हुए विद्या ने कहा कि &lt;em&gt;पर यह हमारे-आपके बीच की बात है&lt;/em&gt;, मगर चूंकि यह बात रिकार्ड हुई है, इसलिए यहां दी जा रही है)... अगर कभी मिस्टर चोपड़ा ने मुझसे पूछा कि तुम्हें एक वो चीज क्या चाहिए, जो मेरे पास है, तो मैं उनसे कहूंगी कि वो फोटो... बहुत ही खूबसूरत फोटो है... उसमें एक दर्द है, एक स्लाइट्स स्माइल भी है, एक सेंस्वसनेस है... सब कुछ है उस तसवीर में... तो मैं चाहूंगी कि वो मुझे दें।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;अभी तक वो मीना कुमारी आपको मिली नहीं है...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;नहीं, अभी तक मैंने पूछा भी नहीं है, मैंने उनको बताया तक नहीं है। क्योंकि काफी एक्टरों की तसवीरें उनकी दीवार पे लगी हुई है... बहुत क्लासिक फोटोज़। अगर उनमें से ये मुझे मिल जाए, तो मैं बहुत खुश हो जाऊंगी... मीना जी के बारे में ऑफकोर्स डिस्कशन होती थी... आइ हैव सीन &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Sahib_Bibi_Aur_Ghulam" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;साहिब बीबी और गुलाम&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;... मैंने कभी सोचा नहीं था... मेरी इतनी हिम्मत भी नहीं कि मैं सोचूं कि मेरी तुलना उनसे हो। वो सबसे ऊंची संवेदना की अभिनेत्री थीं, मेरी तो अभी शुरुआत ही है।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;मीना कुमारी की खासियत यह थी विद्या कि वह एक शायरा भी थीं। शाइरी करती भी थीं और शाइरी जीती भी थीं। उनके अभिनय में एक शाइरी थी... वह एक आम आदमी की संवेदना के स्तर पर अपने अभिनय को संवारती थीं। इस लिहाज से आप अपने जीवन और अपने अभिनय को कैसे देखती हैं?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;देखिए मैं सुसॉलजी की स्टूडेंट रही हूं, तो मुझमें एक हद तक सामाजिक आग्रह तो है, सेंसेविटी है, अवेयरनेस है... पहले तो यही सारी चीजें होनी चाहिए... लेकिन मैं (संकोच से) लिख नहीं सकती।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;लिखने की इच्छा है विद्या?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;इच्छा भी नहीं है, क्योंकि मुझमें वो कौशल है भी नहीं। सिर्फ इसलिए कि लोगों को मेरी ऐसी ख्वाहिश के बारे में सुनना अच्छा लगे, मैं नहीं कहूंगी कि मैं लिखना चाहती हूं... मुझे लगता है कि मैं लिख नहीं सकती। पर, आजकल ऐसे लोग भी लिख रहे हैं कि पढ़ कर बहुत दुख होता है। कुछ दिन पहले मेरा एक इंटरव्यू छपा था, जो मैंने दिया ही नहीं था। किसी ने ऐसे ही छाप दिया था। और लैंग्वेज उसमें ऐसी थी कि मैं सेकेंड क्लास में भी वैसी इंगलिश नहीं लिखती थी। इट्स नॉट अबाउट... बड़े लफ्जों से अच्छी राइटिंग नहीं होती। एक लैंग्वेज का &lt;strong&gt;वो&lt;/strong&gt; फील होता है न, वो भी आज की राइटिंग में नहीं आता... तो इट्स वेरी डिस्अपॉइंटिंग... ऐसे में मुझे लगता है कि अगर मैं लिखने लगूं तो सेम थिंग हो जाएगा, तो मैं कोशिश भी नहीं करना चाहती।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;कभी-कभी ऐसा भी तो होता है कि हम अपने अभिनय में कविताई संवेदना उतारते हैं...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;जैसा कि आपने मीना जी के बारे में कहा, तो मैं पोइट्री ही नहीं, स्टोरीज़ व नॉवेल्ज़ भी पढ़ती हूं। क्लासिक लिटरेचर बहुत कम पढ़ा है मैंने, पर पढ़ने का शौक है... और एक्सपीरिएंसेज बटोरने का मेरा शौक ही नहीं बल्कि मेरे जीवन का हिस्सा है, ऐसी ही हूं मैं। तो मुझे लगता है कि किसी भी एक्टर को हर तरह के अनुभव में अपने आपको इनवॉल्व करना बहुत ज़रूरी है। यू हैव टू हैवेन ओपन माइंड ऑर नॉट ओनली इन पोएट्री... आइ जेनरली ट्राइ टू कीप माइ सेल्फ ओपन टू ऑल ऑफ एक्सपीरिएंसेज... सो दैट... कहीं न कहीं जाके वो मुझे... नॉट ओनली एज एन एक्टर... जब मैं एक्टिंग करती भी नहीं थी... मेरा हमेशा से यही नज़रिया रहा है। आइ थिंक इट हेल्प्स यू डेवलप इन टू अ बेटर परसन...&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;अपनी ज़‍िंदगी में पहली बार आपने अभिनय के बारे में कब सोचा?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;मैं सेवेंथ स्टैंडर्ड में थी, जब मैंने &lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=guZRg5oPU5E&amp;feature=related" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;एक-दो-तीन&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; देखा &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Madhuri_Dixit" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;माधुरी दीक्षित&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का... और मुझे लगा कि काश मैं ऐसे नाच पाती... (हंसती हैं)...! उनमें ऐसी चीज़ थी, जो सबको अपनी तरफ रिझाती थी। और ज़ाहिर है, मैं भी उनकी बहुत बड़ी फैन हो गयी थी। मेरे में कहीं न कहीं हमेशा एक्ट्रेस होने की चाहत थी, और धीरे-धीरे मेरी चाहत बढ़ी... &lt;em&gt;एक-दो-तीन&lt;/em&gt; से मामला शुरू हुआ और बाद में जैसे-जैसे मैं और फिल्में देखती रही, मेरी चाह बढ़ती गयी। और शायद माधुरी दीक्षित का ही असर था कि &lt;em&gt;एक दो तीन&lt;/em&gt; देखने के बाद से मैंने किसी और प्रोफेशन के बारे में सोचा भी नहीं।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;एक फिल्म आयी थी &lt;a href="http://www.indiafm.com/movies/cast/7031/index.html" target="_blank"&gt;मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं&lt;/a&gt;... क्या आप माधुरी दीक्षित बनना चाहती हैं?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;जब छोटी थी, तो हां, माधुरी दीक्षित बनना चाहती थी... इन द सेवेन स्टैंडर्ड... बट आइ... स्टार्टेड ग्रोइंग एंड रीयलाइजिंग कि बहुत सारी एक्ट्रेसेज़ ऐसी हैं, जिनके परफारमेंस देख कर मुझे वैसी चाहत होती थी... जब छोटी थी... जब बड़ी होती गयी, तो लगता गया कि मुझे खुद में एक एनटेटिव बनना है। जब मैं छोटी थी तो मज़ेदार बात ये है कि तब मुझे पता नहीं था कि तानपुरा जो होता है, वह सिर्फ... अकंपनिंग... सुर के लिए होता है। मैं मम्मी से कहती थी कि मैं तानपुरा टीचर बन जाऊंगी... (हंसते हुए)... हालांकि तानपुरा टीचर जैसी कोई चीज होती नहीं है।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;आपकी जिंदगी में परिणीता के पहले और बाद का फर्क क्या है?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;फर्क तो कोई मुझे ज्यादा नहीं लगता। एक्सेप्ट द फैक्ट कि आप यहां बैठे हैं और मैं इंटरव्यू देने में व्यस्त हो गयी हूं। फोन कॉल्स बढ़ गये हैं। मैं दस की रात एम्सटर्डम (आइफा अवार्ड फंक्‍शन) से आयी। आज चौदह तारीख की सुबह है। तब से लेकर अब तक तकरीबन एक सौ फोन कॉल्स आये हैं। मुझे अच्छा लग रहा है। रिव्यूज़ बहुत अच्छे रहे हैं। इन सब बातों से इनकरेजमेंट बहुत मिलती है... इन द फिल्म हैज बिन डीक्लेयर्ड अ &lt;strong&gt;हिट&lt;/strong&gt;... तो ज़ाहिर है मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। फर्क यह है कि मुझे ब्रीदिंग टाइम नहीं मिल रहा... क्योंकि इतने सारे इंटरव्यूज़ हो रहे हैं। क्योंकि परिणीता की रीलीज तक मैं प्रेस से नहीं मिल रही थी, तो अभी मुझे लगता है कि मेरी एक रेस्पांसिबिलिटी है... और मेरे प्रोड्यूसर ने भी कहा है कि अगर लोग तुममें दिलचस्पी दिखा रहे हैं, तो तुम्हें उनसे बात ज़रूर करनी चाहिए। तो अब मैं इंटरव्यू देने में व्यस्त हो गयी हूं... और कुछ नहीं... और कोई फर्क मुझे नज़र नहीं आता।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;मैं लोगों के एटीट्यूड की भी बात कर रहा हूं विद्या। एक नोन फेस और एक अननोन फेस को दुनिया अलग-अलग देखती है...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;अभी तक तो मौका ही नहीं मिला है यह सब महसूस करने का। एम्सटर्डम से आने के बाद बहुत ही बिज़ी रही हूं। लेकिन मेरे एक्सटेंडेड फैमिली से जो है, बहुत अच्छे-अच्छे रेस्पांसेज मिले हैं। उन लोगों ने कभी ये मुझे महसूस नहीं होने दिया कि मैं कुछ अलग कर रही हूं... बाकी नाइन टू फाइव प्रोफेशन में हैं... मैं मे बी नाइन टू सिक्स में हूं... क्योंकि शिफ्ट इतने टाइम का होता है... बस इतना ही फर्क है।&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;आपकी ज़‍िंदगी का सफर कहां से शुरू होता है?&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;blockquote&gt;मुंबई में पली-बढ़ी हूं। पैदा हुई हूं यहां। इस घर के ठीक सामनेवाले घर में। सामनेवाला घर भी हमारा ही है। उस घर में पैदा हुई, इस घर में पली-बढ़ी। टू मच फॉर अ मुंबईकर... स्कूलिंग मेरी चेंबूर सेनैंटिनी स्कूल में हुई। कॉलेज सेंजेवियर्स गयी थी मैं और बहुत पहले काम करना शुरू कर दिया था.. मोर एज अ... शौक... आइ डीडंट नो कि किसी दिन ये मेरा प्रोफेशन बन सकता है। लेकिन कॉलेज में थी और पोस्टर लगा था कि कालेज स्टूडेंट्स अप्लाइ करें। कालेज पर आधारित एक सीरियल बन रहा है। मैंने लोकल फोटो स्टूडियो से कुछ तसवीरें खिंचवायी और बायोडाटा के साथ भेज दिया। बायोडाटा को पढ़ के उन लोगों ने टेस्ट किया मुझे। मैं सेलेक्ट हो गयी। हमने शूटिंग भी की। बाद में सीरियल बंद पड़ गया। बीआइ टीवी के लिए वह बन रहा था।&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-85257729541538413?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/85257729541538413/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=85257729541538413' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/85257729541538413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/85257729541538413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_27.html' title='चेंबूर, विद्या बालन का घर और सुबह की गुफ्तगू'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/R0xB3S3jKDI/AAAAAAAABPY/w7kMj6mzCOk/s72-c/vidya-balan.jpg' height='72' 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बांचेंगे। राज कैंपस में ही &lt;a href="http://lnmu.bih.nic.in/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मिथिला विश्‍वविद्यालय&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का संगीत एवं नाटक विभाग था, जहां से लोग एमए की डिग्री लिया करते थे। तब उसके विभागाध्‍यक्ष &lt;strong&gt;अविनाश चंद्र मिश्र&lt;/strong&gt; थे, जिनके कुछ नाटकों को पटना इप्‍टा ने पूरे देश में मंचन करके लोकप्रिय बना दिया था, जिनमें दो नाम अभी याद आ रहे हैं - &lt;strong&gt;उचक्‍कों का कोरस&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;बड़ा नटकिया कौन&lt;/strong&gt;।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो कोठली ऐसी थी, जिसमें बेगूसराय-पटना के जो भी इप्‍टा एक्टिविस्‍ट आते, ठहरा करते। रिहर्सल का कमरा जिसमें एक लकड़ी की आलमारी थी और एक चौकी - शाम के वक्‍त चौकी खड़ी कर दी जाती थी और खाली फर्श पर रिहर्सल होता था। पटना इप्‍टा से जुड़े &lt;strong&gt;पंकज&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;राजेश सिन्‍हा&lt;/strong&gt; नाम के भी रंगकर्मी एमए की डिग्री लेने दरभंगा आये, तो इसी कोठली में टिके। टिकने के बहाने एक नाटक की तैयारी भी शुरू हुई लोकल रंगकर्मियों के साथ। नाटक था भिखारी ठाकुर रचित &lt;a href="http://www4.jagran.com/main.aspx?edate=10/12/2007&amp;editioncode=42&amp;pageno=7#" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;गबरघिचोर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। मिथिला में भोजपुर का ये नाटक जिस अंदाज़ से खेला गया और लोगों ने इसकी प्रस्‍तुति को जितनी मोहब्‍बत दी, वह ज़ेहन में अब भी बसा हुआ है। इसकी प्रस्‍तुति हमने शहर के थिएटर हॉल से लेकर गांव के पंडाल तक में की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इसमें सूत्रधार हुआ करता था, जो &lt;em&gt;सिरी गनेस गुरु सीस नवाऊं रामा हो रामा&lt;/em&gt; की लय में नृत्‍य करते हुए कथा शुरू करता है और बीच-बीच में आकर कथा आगे बढ़ाता है। इसके रिहर्सल के दरम्‍यान एक बार पंकज ने मुझ पर थप्‍पड़ चला दिया था और मैं रिहर्सल के बीच से रोते हुए घर लौट आया था। बाद में मनाने के बाद ही रिहर्सल के लिए तैयार हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भिखारी ठाकुर की स्पिरिट और उनके बारे में वक्‍त के साथ और पता चला। &lt;a href="http://www.tribuneindia.com/2004/20040915/c13.jpg" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;संजय उपाध्‍याय&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; निर्देशित &lt;a href="http://www.patnadaily.com/news2007/mar/031707/vasant_mela_extended.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;बिदेसिया&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की प्रस्‍तुतियों को कई बार देखने का मौक़ा मिला - पटना से दिल्‍ली तक। &lt;a href="http://www.iias.nl/iiasn/30/IIASNL30_12.pdf" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;बिदेसिया&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; परदेस गये लोगों के पीछे छूटी दुख कथा का बेमिसाल नाट्य-रूपातंरण है और जिसकी वजह से भिखारी को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर लोकप्रियता मिल चुकी है। पटना के किसी प्रेस से भिखारी रचनावली का एक पतला सा खंड भी हाथ लगा, जिस पर किसी मेहरबान दोस्‍त ने हाथ फेर दिया। बाद में &lt;strong&gt;संजीव&lt;/strong&gt; के उपन्‍यास &lt;strong&gt;सूत्रधार&lt;/strong&gt; के जरिये भी भिखारी की जीवनी हाथ लगी। एक बार रिपोर्टिंग के लिए भिखारी ठाकुर के गांव जाना चाहता था, लेकिन जब छपरा पहुंचा तो उनका गांव बाढ़ में डूबा हुआ था। छपरा के एक चौराहे पर उनकी मंडली का स्‍कल्‍पचर भी खड़ा है। कोई भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का शेक्‍सपीयर मानता है, तो कोई भोजपुरी संस्‍कृति की गांधी धारा के रूप में उन्‍हें व्‍याख्‍यायित करता है। जेएनयू छात्रसंघ के अध्‍यक्ष रहे &lt;a href="http://samkaleenjanmat.blogspot.com/2007/10/blog-post_23.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;चंद्रशेखर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;, जो सीवान में शहाबुद्दीन के गुर्गों के हाथों मारे गये, ने भिखारी पर थीसीस भी लिखी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का कुल मतलब ये कि जो गुज़र जाता है, उसकी स्‍मृतियां अनंत व्‍याख्‍याओं में उनके पास भी पहुंचती हैं, जिन्‍होंने उस शख्‍स को न कभी देखा न सुना। सिने गायकों की आवाज़ें तो फिर भी हमेशा वर्तमान होती हैं, लेकिन भिखारी जैसे लोग और उनकी नौ‍टंकी तो आख्‍यानों में बची रही। अब आधुनिक थिएटर के कलाकार भी उनके नाटक खेलते हैं। हमारे एक दोस्‍त &lt;strong&gt;तैयब हुसेन पीड़‍ित&lt;/strong&gt; ने उन पर पीएचडी भी की है। आख्‍यानों के साथ ही बाद की पीढ़ी के लिए फिराक ने ये शेर छोड़ दिया है -&lt;br /&gt;&lt;em&gt;अब अक्‍सर चुप चुप से रहे हैं, यूं ही कभू लब खोले हैं&lt;br /&gt;पहले फिराक को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कभी कभी तकनीक का संयोग हमारी मुलाक़ात इतिहास से करवा ही देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भिखारी ठाकुर की ओरिजन आवाज़ हमें नेट पर टहल करते हुए मिल गयी। किसी समारोह में भिखारी काव्‍यपाठ कर रहे हैं। मैं रांची में रहनिहार अपने दोस्‍त &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/17021125150681908843" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;निराला&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; से, जो कि &lt;a href="http://bidesia.co.in/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;बिदेसिया डॉट को डॉट इन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; चलाते हैं, गुज़ारिश करूंगा कि इसका टेक्‍स्‍ट सुन कर, समझ कर उसे अपनी वेबसाइट पर तो बांचें ही, इसे थोड़ा भोजपुरी प्रेमियों को भी सर्व करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ये रही भिखारी ठाकुर की आवाज़...&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/587028_fpbzihtunh_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed 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href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1904992621476820701'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_25.html' title='कहत भिखारी भाई'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-6992350841748079446</id><published>2007-11-17T22:26:00.000-08:00</published><updated>2007-12-10T23:15:57.688-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>हरा हरा नेबुआ कसम से गोल गोल</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;तब&lt;/strong&gt; इंदिरा गांधी पर गोली नहीं दागी गयी थी। साठ के दशक में गरज कर बसंत का वज्रनाद सत्तर के दशक में ठंडा पड़ चुका था। इमर्जेंसी की अदाओं ने कांग्रेस को गिरा कर जनता सरकार की हवा चलायी, लेकिन वो भी फुस्‍स हो गयी और फिर से कांग्रेसी राज कायम हो गया। राज-काज-समाज के इस ड्रामे में हम पैदा हुए और समझने लगे कि यही मुल्‍क है- जहां कर्पूरी ठाकुर के बाद जगन्‍नाथ मिश्रा आएंगे, जगन्‍नाथ मिश्रा के बाद लालू प्रसाद आएंगे और लालू प्रसाद के नीतीश कुमार आएंगे। लेकिन इनक़लाब कभी नहीं आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनक़लाब आया, जब कोकशास्‍त्र के पहले सचित्र पन्‍ने हमारी ज़‍िंदगी में आये। गांव के एक भाई छत पर ले गये और श्‍वेत-श्‍याम रेखाओं से बने चित्र दिखाते रहे। पतलून की जिप खोली और गोंद गिरा कर दिखाया, कि ये जादू इस किताब से ही होता है।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार बुआ ब्‍याह कर अपने अपने ससुराल जा चुकी थीं। पांचवीं बुआ की शादी में ज़रा-ज़रा होश वाले हो गये थे। आधी रात तक रस्‍म पूरी हो चुकी, तो फुफाजी के साथ उन्‍हें कमरे में बंद कर दिया गया। हम जिज्ञासा में दरवाज़े पर ही खड़े रह गये और किवाड़ के पल्‍ले अलगा कर अंदर झांकने की कोशिश करने लगे। दूसरों ने हमें वहां से हटाया और दबी हुई इनक़लाबी हंसी की भीड़ में हमें छुपा लिया। वो उन दोनों की सुहागरात का कमरा था। ये कभी हमारी ज़‍िंदगी में भी आयी। लेकिन सुहागरात की पारंपरिक स्क्रिप्‍ट में हमारे लिए शादी से पहले और शादी के बाद की कहानी घुल-मिल गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला-पहला प्‍यार दरअसल कुछ होता नहीं है। ढेर सारी जुगुप्‍साएं होती हैं, जो हमारे आसपास स्त्रियों की दुनिया के वृत्त बनने के साथ-साथ उगना शुरू होती हैं। बलभद्रपुर में हमारी दूसरी मकान मालकिन की पोती अपूर्व सुंदरी थी और हमने दूसरी कक्षा में ही उसे दिल दे दिया था। उसने अपने खुले हुए बाल छूने के लिए दिये थे। उसका नाम &lt;strong&gt;क&lt;/strong&gt; था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;87 के भूकंप में हम पांचवीं कक्षा में थे। कई सारे मकान गिर गये और बेघर हुए लोग बचे हुए मकान वाले रिश्‍तेदारों के यहां सर छिपा रहे थे। &lt;strong&gt;क&lt;/strong&gt; की एक रिश्‍तेदार भी उसके यहां आ गयी, जिनकी दो नीली आंखों वाली बेटियां थीं। हमारी ही उम्र की। बड़ी को ठीक से पता था कि अठखेल क्‍या होता है। हमने एक बार कहा कि हमें अपनी गोद में लो, तो उसने मना कर दिया। लाख मनुहार के बाद वादा किया कि अपनी एक सहेली को मेरे लिए तैयार करेगी। ये वादा अगले दिन के साथ ही भूकंप के मुआवज़े में ग़ुम हो गया। अपने नये बने घर में वो रहने चली गयी। बाद में कभी रास्‍ते पर मिली, तो छोटे शहरों की झिझक और बंदिश एक दूसरे की ओर जी भर के देखने के आड़े आती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन से जिस क़दर हमारा माहौल इनक़लाबी होता है, उसमें हमारी मासूमियत भी शिकार होती है और धीरे-धीरे हम भी शिकारी मन के हो जाते हैं। पूरा कैशोर्य चिपचिपाहट की गलियों में भटकता रहता है और सिगरेट के शुरुआती धुएं होंठों के रंग स्‍याह करने में मशगूल रहते हैं। बाद में जब भी दरभंगा-रांची और फिर पटना-रांची के रास्‍ते में झुमरीतिलैया के आसपास किसी लाइन होटल में बस रुकती - ज़‍िंदगी की ये जुगुप्‍साएं झक पीली रोशनियों वाली पान दुकान से सस्‍ते (गंदे) गानों में ढल कर सुनाई देती रही। हम सुनना चाह कर भी कान मूंद लेते रहे। अच्‍छा बच्‍चा बनने की फिराक में इनक़लाब हाथ से फिसलता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल रात एक गाना &lt;a href="http://www.youtube.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;यू ट्यूब&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; पर मिल गया। &lt;em&gt;हरा-हरा नेबुआ क़सम से गोल गोल।&lt;/em&gt; &lt;a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&amp;q=bhojpuri+faizabadi&amp;meta=" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;भोजपुरी फ़ैज़ाबादी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; सर्च से हाथ लगा ये गाना हमें उन्‍हीं इनक़लाबी दिनों में ले गया, जब लड़कियां हमारे लिए सात समंदर पार एक गुफा में मौजूद पिंजड़े में बंद होती थीं और गुफा के दरवाज़े पर कुछ विशालकाय राक्षस उसकी पहरेदारी करते थे। हमारे बुज़ुर्ग ऐसे ही तो होते हैं। बहरहाल...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्‍लॉग की दुनिया के पवित्र-पावन दोस्‍तों से माफ़ी के साथ मैं ये वीडियो यहां पेश कर रहा हूं।&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/lVjHRxvsn6g&amp;rel=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/lVjHRxvsn6g&amp;rel=1" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-6992350841748079446?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/6992350841748079446/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=6992350841748079446' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6992350841748079446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6992350841748079446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_17.html' title='हरा हरा नेबुआ कसम से गोल गोल'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-425785856472638617</id><published>2007-11-16T21:36:00.001-08:00</published><updated>2007-12-10T23:16:38.424-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>मानिनी आब उचित नहि मान</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;सौ&lt;/strong&gt; आदमियों को ढोने वाली नाव पर खड़े होकर जाने किस लगन में खोये पुजारी जी बागमती में कूद गये थे। गांव में सनसनी फैल गयी। हर आंगन में यही कोरस था कि पुजारी जी ने जलसमाधि ले ली। हमारा परिवार तब तक गांव से निकला नहीं था। अपनी आवाज़ और हारमोनियम के सुर के लिए जाने जानेवाले पुजारी जी को सब लोग पुजारी जी ही पुकारते थे। जबकि छोटे और बहुत थोड़ी जगह छोड़ कर बने मकानों वाले गांव में, जहां सबका सबसे रिश्‍ता था, वे भी चाचा थे, बाबा थे, भाई थे। उनकी जलसमाधि के क़रीब पचीस बरस बाद, इस दिल्‍ली में सुरों की खाक छानते हुए उनकी याद आयी, तो बाबूजी ने बताया - पुजारी जी का असल नाम सत्‍यनारायण दास था, जो बाद में आचार्य की डिग्री के चलते सत्‍यनारायण आचार्य में बदल गया।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुजारी जी सीता स्‍वयंवर के गीत गाते थे। होरी, फाग, चैती के मास्‍टर थे और लोग चकित-मगन उनकी आवाज़ में खो जाया करते थे। हमारे और हमारी उम्र के दोस्‍तों के ज़ेहन से उनका चेहरा और उनकी आवाज़ मिट चुकी है। कुछ जो धुंधले स्‍मृति चिह्न बनते हैं, उसमें गांव के मुहाने पर खड़े मंदिर की फर्श पर पुजारी जी पालथी मार कर बैठे हैं। अब वहां ताश का जमघट लगता है। मीटिंग-सीटिंग होती है। होली में झाल और झांझर की झनकार के बीच मतवाले लोगों के बिखरे हुए केश के ऊपर अबीर-गुलाल उड़ते हैं। वहां लल्‍ला अस्‍सी बरस में अभी भी विद्यापति की तान छेड़ते हैं- &lt;em&gt;सामरि हे झामरि तोर देह/ कह कह का सए लाओल नेह (सुंदरी, तुम्‍हारी सूरत फीकी पड़ गयी है। बोलो किससे प्‍यार हो गया है)।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात यह होती है कि पुजारी जी के बाद अब लल्‍ला के पास ही वो टेक और उठान बचा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लल्‍ला बूढ़े हो चले हैं। सारे दांत झड़ चुके हैं। पान खाते हैं, तो पीक होंठों को तलछट बना कर धार की तरह नीचे उतरने लगती है। छोटा-सा हारमोनियम कभी उनके गले में लटके-लटके कई रेलों में सफ़र करता रहा, अब तो अपनी ही देह मुश्किल से संभलती है। लेकिन होली के आसपास चैती गाने मंदिर या पुस्‍तकालय पर आ जाते हैं। नयी नौजवानी के लिए थोड़ी मुश्किल होती है। सब अब फिल्‍मी गानों की धुन के पीछे भाग रहे हैं। दस साल पहले गांव की होली में हमने दलेर मेंहदी के गाने की पैरोडी मैथिली में सुनी थी। लल्‍ला के पास पुरानी, बिसूरी और उनके ही कंठ में बची हुई धुनें हैं- जो हम सुनना नहीं चाहते। ऊपर से बुढ़ापा गले में अटकता है। खांसी होती है, पर लोग तो बस झूमते रहना चाहते हैं। इसलिए वे लिहाज़ छोड़ कर हूट करना सीख गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी बहन ने एक बार लल्‍ला से कहा था, लल्‍ला गीत सिखा दीजिए न। लल्‍ला ने कहा था, बेटा तुमको गाना ज़रूर सिखाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हमारी दिलचस्‍पी सीखने और सुनने में नहीं है। आवाज़ की असलियत से ज़्यादा हमारी इलाक़ाई/कबीलाई संवेदना किसी को इंडियन आइडल बना देती है। हम सब जिस तरह की दिल्लियों में रहते हैं, वहां कोई रस नहीं, बस जीने की नियति और आदत की वजह से रहते हैं। कभी बस पर कोई ग़रीब बच्‍चा ठुमरी गाते हुए मिल जाता है, तो भी जेब से अठन्‍नी नहीं निकलती है - क्‍योंकि वो भी एक फ्लैश है - जो हफ्ते में कई बार चमकता है और बुझ जाता है। लेकिन इस रूखे-सूखे रेगिस्‍तान में भी कभी-कभी असली चश्‍मा मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसी ओरिजनल आवाज़ मिल गयी, जिसकी उम्‍मीद हमारी नौजवान ज़‍िंदगियों से तो लगभग टूट ही रही है। मैं आपको सुनाता हूं, लेकिन ये पता नहीं चल पाया कि आवाज़ किनकी है। हमारे इतिहास के पन्‍नों पर न जाने कितने नामालूम लोगों ने सोने-चांदी की कलम से हीरा-पन्‍ना लिख डाला है! गीत विद्यापति का है - &lt;em&gt;मानिनी आब उचित नहि मान।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" 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करए मधुर मधु पान।&lt;br /&gt;अपन-अपन पहु सबहु जेमाओल भूखल तुअ जजमान।।&lt;br /&gt;त्रिबलि तरंग सितासित संगम उरज सम्‍भु निरमान।&lt;br /&gt;आरति पति मंगइछ परतिग्रह करु धनि सरबस दान।।&lt;br /&gt;दीप-बाति सम थिर न रहय मन दिढ़ करु अपन गेआन।&lt;br /&gt;संचित मदन बेदन अति दारुन विद्यापति कबि भान।।&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;strong&gt;गद्यानुवाद&lt;/strong&gt;: मानिनी, अब मान छोड़ो, इस समय अपने पांचों शरों के संधान कर कामदेव आ डटा है। कैसी सुंदर रात है, चांदनी जगमगा रही है। एक-एक पत्र से अमृत बरस रहा है। ऐसा समय अब और नहीं मिलेगा। मिलन-सुख के लिए यही अवसर ठीक रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रमर मंडरा-मंडरा कर, झूम-झूम कर कली को छेड़ रहा है; मकरंद पान कर रहा है, सब अपने-अपने प्रीतम को जिमा चुकी है, तुम्‍हारा प्रीतम भूखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्‍हारी नाभि के ऊपर की लहरियां तरंगित हैं। गंगा-यमुना के संगम पर दोनों स्‍तन शिव-शंभु जैसे प्रतीत होते हैं। प्रियतम बहुत ही आतुर हो रहा है, वह याचक बन कर खड़ा है। सुंदरी, इस सुअवसर पर तुम अपना सर्वस्‍व दान कर दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन का क्‍या ठिकाना है! वह तो दीपशिखा की भांति कांपता ही रहेगा। अपने विवेक को दृढ़ करो। मदन-वेदना बहुत अधिक मात्रा में संचित हो चुकी है। वह बड़ी भयानक यातना देगी तुझको - विद्यापति कवि तुम्‍हें समझा रहे हैं।&lt;/blockquote&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/11/blog-post_17.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मोहल्‍ला&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; पर भी&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-425785856472638617?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/425785856472638617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=425785856472638617' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/425785856472638617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/425785856472638617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_16.html' title='मानिनी आब उचित नहि मान'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8382451570071654461</id><published>2007-11-13T23:02:00.000-08:00</published><updated>2007-12-10T23:17:32.218-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्‍तों का घर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यहां वहां जहां तहां'/><title type='text'>बागडोगरा में सुबह</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;दरभंगा महाराज&lt;/strong&gt; के महलों-क़‍िलों के बीच बड़े भाई &lt;a href="http://mithila-mihir.blogspot.com/2007/05/blog-post.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;तारानंद वियोगी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के साथ झमकते हुए चलते थे। सारंग जी और स्‍नेही जी भी साथ रहते थे। उनके पास उल्‍लास और यात्रा के दर्जनों क़‍िस्‍से थे। मुंगेर से लेकर बागडोगरा तक। उनकी एक मैथिली कविता है, जिसका क़रीब दशक भर पहले मैंने हिंदी में अनुवाद किया था। &lt;strong&gt;बागडोगरा में ब्रह्ममुहूर्त&lt;/strong&gt;। यानी बागडोगरा में सुबह। नंदीग्राम में सीपीएम की गुंडागर्दी का शिकार होते आम नागरिक, आंदोलनकारी इतिहास चक्र के उस ग्रामवृत्त की कहानी दोहरा रहे हैं, जिसे नक्‍सलबाड़ी कहते हैं। बागडोगरा नक्‍सलबाड़ी के पास है। मैथिली के नावेलिस्ट-कहानीकार, हमउम्र &lt;strong&gt;प्रदीप बिहारी&lt;/strong&gt; के साथ सफ़र में वियोगी जी ने बागडोगरा में सुबह की चाय पी। कविता उन्‍हीं दिनों की है।&lt;em&gt;&lt;blockquote&gt;तुम्‍हारी बनायी चाय अतिशय तीखी लगती है &lt;br /&gt;ऐ बच्‍चा, होरीपोदो राय!&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;टूटा नहीं अब तक नशा। झम्‍प अब भी बाक़ी है।&lt;br /&gt;लगता है&lt;br /&gt;या तो वातावरण में ही कुछ ज़्यादा नमी है&lt;br /&gt;या हमीं में कुछ पात्रता की कमी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और तुम भी तो लल्‍लू के लल्‍लू रहे प्रदीप!&lt;br /&gt;जाने कितनी बार आये-गये इस इलाक़े में,&lt;br /&gt;लेकिन अनचीन्‍हा ही रहा मौसम का मिज़ाज।&lt;br /&gt;अंधेरे से जो बनते हैं बिंब घनेरो भाई!&lt;br /&gt;वे सब क्‍या सिर्फ मृत्‍यु के प्रतीक हुआ करते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमलतास के नवीन सुपुष्‍ट किसलयों पर झूला झूलने लगे हैं बतास।&lt;br /&gt;नीम के गाछ पर चुनमुनियों का बसेरा अकुलाने लगा है।&lt;br /&gt;उस फुदकी चिड़ैया को देखो - किस तरह अचरज किये जा रही है!&lt;br /&gt;दौड़ यहां, भाग वहां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो लगता है एकबारगी&lt;br /&gt;आह्लाद से जान न निकल जाए इस पगली की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, कौआ नहीं बोला अब तक -&lt;br /&gt;यही कहोगे न?&lt;br /&gt;कौआ करे घोषणा - तभी मानूं भोर&lt;br /&gt;इसी कुबोध से जनमता है&lt;br /&gt;क्रांति में चिल्‍होर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो-देखो प्रदीप!&lt;br /&gt;पौ फटने का संकेत दे रहा है क्षितिज सीमांत।&lt;br /&gt;अब लाइन होटल की इस खाट से उठो प्रदीप&lt;br /&gt;सुबह होने को आयी, देखो&lt;br /&gt;चलो अब हम चलें&lt;br /&gt;नक्‍सलबाड़ी कुछ ही दूर है यहां से!&lt;/blockquote&gt;&lt;/em&gt;बिहार में रहते हुए बंगाल से दोस्‍ती नहीं हुई। यह संयोग ही था। लेकिन बंगालियों से दोस्‍ती रही। बंगाली नाटक से थिएटर का सफ़र शुरू हुआ- &lt;a href="http://www.enadonline.org/ballavruupkatha/ballabhrupkatha.htm" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;बोल्‍लभपुरेर रूपकोथा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। फिलहाल एक रवींद्र संगीत आपके लिए, जो मुझे बहुत-बहुत-बहुत प्रिय है... &lt;em&gt;मेघ बोले छे जाबो जाबो...&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" 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href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8382451570071654461' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8382451570071654461'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8382451570071654461'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_6452.html' title='बागडोगरा में सुबह'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-6412498331646484188</id><published>2007-11-13T17:28:00.000-08:00</published><updated>2007-12-10T23:18:37.087-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>बीड़ी जलाय ले जिगर से पिया!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;बंगाल&lt;/strong&gt; की सरहद में पहुंचे तो धूप खिल चुकी थी। जाड़ा था। नौ बजते-बजते रेल हावड़ा जंक्‍शन पर रेंगते हुए रुक गयी। प्‍लेटफार्म पर ही कई सारी गा‍ड़‍ियां लगी थीं। पीली टैक्सियों वाले कोलकाता में हमारी दिलचस्‍पी चौरंगी देखने की थी। शंकर का ये नॉविल हमें &lt;a href="http://mithila-mihir.blogspot.com/2007/01/blog-post_10.html" target="_blank"&gt;जीवकांत जी&lt;/a&gt; ने पढ़ाया था। जीवकांत मैथिली के बड़े राइटर हैं। मधुबनी ज़‍िले में झंझारपुर के आगे घोघरडीहा जंक्‍शन से सटा उनका गांव है- डेओढ़। हम अक्‍सर वहां जाकर उनके साथ वक्‍त बिताते थे। झोले में भर-भर कर किताबें ले आते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आख़‍िरी कुछ दिन मां मेरे साथ थी। पटना में। हमने उसे चौरंगी पढ़ायी थी। हार्डबॉन्‍ड संस्‍करण पर जीवकांत जी का स्‍टांप लगा हुआ था। अब वो प्रति पता नहीं किसके पास है। मां नशे की तरह पढ़ती थी नॉविल। दूसरी कक्षा तक पढ़ी थी और जासूसी उपन्‍यासों की दीवानी थी। मुझे ख़त लिखती थी। मेरे मन में लेखकों के चित्र की तरह मां का चित्र है। उंगलियों में फंसी हुई बीड़ी होंठों के बीच टिकी हुई। दूसरे हाथ में नॉविल। इस वक्‍त आसपास कितना भी शोर हो, उसे फर्क नहीं पड़ता था। हम किताब के पीछे, मां के कानों के पास हाथ-हाथ हिला-हिला कर उसकी एकाग्रता की परीक्षा लिया करते थे। चौरंगी पढ़ कर उसे अच्‍छा लगा था।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौरंगी से गुज़रते हुए हम टेलीग्राफ के दफ्तर पहुंचे। &lt;a href="http://www.exchange4media.net/peoplemovement/movement_fullStory.asp?section_id=23&amp;news_id=28269&amp;tag=23176" target="_blank"&gt;उत्तम दा&lt;/a&gt; तब इस अंग्रेज़ी अख़बार के झारखंड संस्‍करण के एडिटर थे। उनसे पुराना राब्‍ता था। पटना के गर्दिश भरे दिनों में उन्‍होंने सहारा दिया था। ऊंची चमकती हुई बिल्डिंग में घुसने से पहले हमने दो महिलाओं को बाहर सिगरेट के छल्‍ले उड़ाते हुए देखा। एक आधी उम्र की थी, दूसरी नवयौवना। मैं दो मिनट ठहर कर इन्‍हें सिगरेट के संग-साथ में देखना चाहता था, लेकिन तहजीब में बने रहने की आदत ने फ़रमाया- ये ग़लत बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 98 की जनवरी या फ़रवरी में दिल्‍ली में एक आधी रात &lt;a href="http://www.lib.virginia.edu/area-studies/SouthAsia/SAserials/Biblio/bss10.html" target="_blank"&gt;प्रथमा बनर्जी&lt;/a&gt; के साथ थे। स्‍त्री संदर्भ के किसी लेख पर वो काम कर रही थीं और मैं अपनी बुद्धि भर उन्‍हें मदद कर रहा था। उस वक्‍त &lt;a href="http://deshkalindia.com/" target="_blank"&gt;देशकाल&lt;/a&gt; के स्‍वर्ण जयंती विशेषांक के संपादक समूह में होने की हैसियत से उनका संग-साथ मिला था। उस आधी रात में उन्‍होंने दर्जनों सिगरेट जलायी-बुझायी होंगी। मैं थोड़ा चकित-विस्मित, जबकि मां को मैंने बरसों बीड़ी पीते हुए देखा था। आधुनिक स्त्रियों की ज़‍िंदगी में धुएं के इस दिलक़श नज़ारे से पहली बार परिचय हो रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, बीच में मोहब्‍बत की वजह से एक चक्‍कर मुंबई का लगा, तो &lt;a href="http://movies.nytimes.com/person/470243/Anish-Verma/filmography" target="_blank"&gt;अनीश भाई&lt;/a&gt; के जन्‍म दिन की पार्टी में ढेर सारी सिने-बालाओं को सिगरेट और शराब के साथ अंतरंगता बरतते देख कर नज़र चकरा गया। अब तो एनडीटीवी के स्‍मोकिंग ज़ोन में हर वक्‍त सिगरेट और दोस्‍तों से चिपकी हुई स्‍त्री सहकर्मियों को देख कर भी आंख निर्भाव ही बनी रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मां बीड़ी पीती है - पहली बार ये ज़‍िक्र मैंने &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Darbhanga" target="_blank"&gt;अपने शहर&lt;/a&gt; के एक बुद्धिजीवी के सामने छेड़ा, (जो अच्‍छी-दुरुस्‍त हिंदी के हिमायती थे) तो वे बिफर पड़े। मुझे शराफत सिखायी। कहा कि अपने पूर्वजों के लिए सम्‍मानजनक भाषा होनी चाहिए। उनकी आदतों के ऐसे ज़‍िक्र से हमें बचना चाहिए। उसके बाद बरसों मैं सचमुच इस ज़‍िक्र से बचता रहा। अब जबकि स्त्रियां और धूम्रपान हमारी ज़‍िंदगी से जुड़े रोज़मर्रा के दृश्‍यों में शामिल है- मुझे ये बताते हुए दिक्‍कत नहीं हो रही है कि मेरी मां बीड़ी पीती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी दादी भी बीड़ी पीती थी, लेकिन वो पत्ते झाड़ कर तंबाकू भरती थी और अपनी बीड़ी खुद तैयार करती थी। हमारे यहां एक लकड़ी का मोटा-सा कठौत उनकी बीड़ी के पत्ते रखने के लिए होता था, जो उनके इंतक़ाल के बहुत दिनों बाद तक गांव के घर में दिखता था। अचानक एक दिन दिखना बंद हो गया। मेरी मां बाज़ार से बीड़ी मंगवाती थी। बाबूजी मां के लिए बीड़ी लाते थे। बड़े होने के बाद ये हमारा काम हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन संस्‍कृति मंच का राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन बनारस में था। दरभंगा से हमारी सांस्‍कृतिक टोली के प्रतिनिधि को भी हिस्‍सा लेना था। मेरी इच्‍छा थी, लेकिन &lt;a href="http://maithil.rediffiland.com/iland/maithil.html" target="_blank"&gt;संजीव स्‍नेही&lt;/a&gt; को भेजने का इंतज़ाम किया गया। वे दोस्‍त थे, लेकिन कसक मेरे दिल में थी। मैं यूं ही चल पड़ा। पटना से मुग़लसराय और फिर वहां से बनारस। पटना में संजीव स्‍नेही मिल गये थे। मुग़लसराय जंक्‍शन पर टीटीई ने धर लिया, तो मेरा जुर्माना भी संजीव स्‍नेही ने ही भरा। वहां कलकत्ता की एक रंग टोली भी आयी थी, जिसने मस्‍त कोरस सुनाया था- &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=35" target="_blank"&gt;&lt;em&gt;समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आयी।&lt;/em&gt;&lt;/a&gt; उनमें से एक बीड़ी पीते थे और उनके पास कई बंडल था। हमने रिक्‍वेस्‍ट करके एक बंडल मांग लिया कि मेरी मां बीड़ी पीती है, उसके लिए। उन्‍होंने खुशी-खुशी दे दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बंगाल की बीड़ी ले जाकर मैंने मां के हाथ में रख दी। उसकी आंखों में आंसू थे। खुशी के या अपराधबोध के, कह नहीं सकता - लेकिन बाद में बीड़ी की वजह से उसके दोनों फेफड़े गल गये। डॉक्‍टरों ने जवाब दे दिया। तीन भाइयों में सबसे छोटी बहन थी मेरी मां। उनका बड़ा भतीजा, मेरे ममेरे भाई अमेरिका में डॉक्‍टर हैं। उनके पास पूरी रिपोर्ट भेजी गयी और जिस सुबह उनका फोन आया - मां गुज़र चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीड़ी की आदत का किस्‍सा कुछ यूं सुनाया था मां ने कि उनकी बुआ बीड़ी की तलबगार थी। उनके लिए अक्‍सर चूल्‍हे से जला कर बीड़ी मां ही ले जाती थी। जब सात साल की रही होगी, तभी बीड़ी जलाने और बुआ के हाथ में थमाने के बीच रास्‍ते में एकाध कश ले लिया और फिर कई बार बीड़ी जला कर बुआ को थमाने के बीच रास्‍ते में कई-कई क़श। धीरे-धीरे चेन स्‍मोकर हो गयी। घर में सबको पता चल गया। शादी ठीक हुई, तो छुड़वाने की कोशिश की गयी। लेकिन इस कोशिश में मां बीमार पड़ गयी, तो नाना ने मां को बीड़ी से दूर नहीं रहने देने का सख्‍त एलान कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी के बाद विदाई हुई, तो साथ आने वाली &lt;strong&gt;कमनाहरि&lt;/strong&gt; (टहल-टिकोला करने वाली) केले के थंब में छिपा कर बीड़ी लेती आयी। इस तरह नइहर से ससुराल तक मां की बीड़ी आयी, जो उनकी मौत तक साथ रही। 7 जुलाई 1999 को मां का इंतकाल हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आठ साल बाद &lt;a href="http://www.mp3hungama.com/music/index.php?action=album&amp;id=138" target="_blank"&gt;ओमकारा&lt;/a&gt; (2006) में &lt;em&gt;बीड़ी जलाय ले&lt;/em&gt; गीत सुना, तो मां की याद आयी। याद भी बड़ी कमीनी चीज़ होती है। गीत का संदर्भ क्‍या है और याद किसकी आयी! ख़ैर, मन की ऐसी नियतियों का क्‍या किया जाए? मेरी अपनी यादों के बहाने आपकी खिदमत में पेश है ये गीत...&lt;/blockquote&gt;&lt;table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" src="http://res0.esnips.com/escentral/images/widgets/flash/esnips_player.swf" 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&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style="font-size:7px; font-weight:normal;"&gt;|&lt;/td&gt;&lt;td&gt;&lt;a align="center" style="color:#FF6600; text-decoration:none" href="http://www.esnips.com//adserver/?action=visit&amp;cid=player_dna&amp;url=/socialdna"&gt;   eSnips Social DNA    &lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/table&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-6412498331646484188?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/6412498331646484188/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=6412498331646484188' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6412498331646484188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/6412498331646484188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_13.html' title='बीड़ी जलाय ले जिगर से पिया!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-3619371055009729604</id><published>2007-11-08T08:57:00.000-08:00</published><updated>2007-12-10T23:20:15.476-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>झूला पटना में डाला रे, अमरइयां!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;अब&lt;/strong&gt; ऐसा भी नहीं है कि एक शहर हमारी ज़‍िंदगी से बाहर हो गया है। हम कभी भी वहां जाकर रहना शुरू कर सकते हैं और जक्‍कनपुर में गौरिया मठ के सामने आलू पकौड़ी और हरी चटनी के आसपास शाम बिता सकते हैं। जंक्‍शन के बाहर महावीर मंदिर से सटी मस्जिद की दूसरी तरफ पहली मंज़‍िल वाली खोली में लिट्टी और बैंगन की चटनी में मूड़ी गोड़ना किसी को भी अच्‍छा लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार रिपोर्टिंग के सिलसिले में बक्‍सर गये थे, तो वरुणा हॉल्‍ट के पास कोई ट्रेन पटरी से उतर गयी। घंटों आगे-पीछे की ट्रेन बक्‍सर और डुमरांव स्‍टेशन पर खड़ी रही। हम डुमरांव में फंस गये, जिसका अहाता थोड़ी ही देर में सिगरेट में घुले इंतज़ार के घुओं से भर गया। भूख लगी, तो बाहर निकल कर हमने लिट्टी खायी। घी में डूबी हुई लिट्टी, एक मिर्च और घुघनी ने जो तसल्‍ली दी, उसका ज़‍िक्र आज भी देखिए- हुलस कर निकल रहा है।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरा में भी लिट्टी मिलती है। हमारे एक दोस्‍त के ब्‍याह में गये, तो तेल की गंध ने ऐसा घेरा कि बरसों के बीमार जैसे लगने लगे। बाहर निकल कर सूखी लिट्टी की दुकान में बैठ गये। लिट्टी का पूरा कल्‍चर पुराने मध्‍य बिहार में ही रहा है। सासाराम और कैमूर ज़‍िले में हमने लिट्टी खाकर संतोष की रात बितायी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रांची में हमारी एक दोस्‍त &lt;strong&gt;अनुपमा&lt;/strong&gt; है, जो यूपी के गाज़ीपुर की रहने वाली है। गाज़ीपुर में अफीम की खेती बड़े पैमाने पर होती है और कैमूर से एक रास्‍ता गाज़ीपुर की ओर जाता है। लिट्टी वहां के परिवारों में भी आम है। एक शाम अनुपमा के पिताजी ने घर के आंगन में लिट्टी के लिए आग जलायी और अपने हाथों से लिट्टी बना कर हमें खिलाया। शहरों में बसे लोग, जो कहीं अपने गांवों से आये हैं, खान-पान में पुराना बर्ताव ही बरतते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना में विधायक क्‍लब के पास घी में लपेटी गयी सत्तू की रोटी के लिए काफ़ी इंतज़ार करना होता था, लेकिन हम इंतज़ार करते थे। फिर भी ऐसा नहीं है कि पटना में रहने की ख्‍वाहिश में स्‍वाद सबसे ज़रूरी कारक है। वहां रहना आसान है। पैदल चलना आसान है। मुख्‍यमंत्री, नेताओं और नवधनाढ्यों की दुनिया में झांकना आसान है- क्‍योंकि मौर्यालोक कांप्‍लेक्‍स की शाम सबके लिए एक साथ रोशन है और जहां पंद्रह रुपये में हाफ प्‍लेट मस्‍त चाउमीन चिकेन ग्रेवी से साथ मिल जाता है। यहीं एक पत्रिका की दुकान पर कुछ पत्रकार जुट जाते हैं, जो दारू पीने के लिए जुगाड़ खोजते हैं। चालीस रुपये में रम का नीप नौ-दस बजते-बजते उग आता है और पत्रकारिता के पटनिया परिदृश्‍य की परतें भी उघड़ने लगती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी कांप्‍लेक्‍स के सामने से एक रास्‍ता निकलता है, जिसमें पहली बायीं मोड़ में घुसने पर सामने पटना म्‍युज़‍ियम दिखता है। म्‍युज़‍ियम के मैदान में अंग्रेज़ों के ज़माने की बड़ी सी तोप रखी है और कई सारे पेड़ और कई सारे चबूतरे हैं, जो पतझड़ के मौसम में इश्‍क़ का एहसास देते हैं। आर्ट कॉलेज के जोड़े तो चित्र बनाने के नाम पर ऐसे ही घुस आते हैं, दूसरे आम जोड़े भी दो रुपये का टिकट लेकर पूरा दिन यहां बिताते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौर्यालोक कांप्‍लेक्‍स के पास ही डाक बंगला चौराहे से अक्‍सर कोई जुलूस निकलता है और पुलिस की बड़ी गाड़ी जुलूस में शामिल लोगों को उठाती है और दानापुर के किसी स्‍कूल के अहाते में ले जाकर छोड़ देती है। वहां चूड़ा और गुड़ मिलता है और फिर शाम को वही गाड़ी बेलीरोड के किसी स्‍टॉप पर लाकर छोड़ देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी मैदान में आल्‍हा-ऊदल गाने वाला एक कलाकार रोज़ महफिल जमाता है और गुप्‍त रोगों से निज़ात दिलानेवाली दवाइयों का कारीगर ऊंची आवाज़ में चिल्‍लाता है। इसी मैदान में मोना सिनेमा वाले कार्नर पर रंग‍कर्मियों ने सफदर हाशमी रंगभूमि बना रखी है, जिस पर अक्‍सर नुक्‍कड़ नाटक होता है। लोग देखते हैं और डायलॉग की हर ऊंची टेक पर ताली बजाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी पटना में पुनाइचक वाले कमरे में, जो समन्‍वय के नाम से जाना जाने लगा था, &lt;a href="http://hindiacom.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;नवीन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; अक्‍सर एक गीत छेड़ते रहे हैं- &lt;em&gt;झूला किन्‍ने डाला रे, अमरइयां...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो सचमुच गायक नहीं बनना चाहता और कोशिश करके जिसने सुर की क़ाबिलियत भी नहीं हासिल की है, गीत उसकी ज़‍िंदगी का भी हिस्‍सा कैसे होती है- नवीन इसकी मिसाल हैं। मैंने तो थिएटर भी किया है। गाने का रियाज़ भी। हारमोनियम भी सीखने की कोशिश की है- लेकिन मेरा सुर पटरी से उतर जाता है। नवीन के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है, फिर भी वे गाते हैं तो लगता है, लय उनकी शख्‍सीयत का हिस्‍सा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;झूला किन्‍ने डाला रे, अमरइयां&lt;/em&gt; भी मुझे नेट पर मिल गया और इसके साथ ही पटना और नवीन को याद करने का एक बहाना भी। ये पहला गीत थोड़ा कम ड्यूरेशन का है, जो उमराव जान में इस्‍तेमाल हुआ है और सिंगर कोई अननोन आर्टिस्‍ट है।&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572172_gazjngsgdb_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572172_gazjngsgdb_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;blockquote&gt;और ये दूसरा गीत नैय्यरा नूर ने गाया है, जो बड़े ड्यूरेशन का है।&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572171_bvkcmttnbd_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572171_bvkcmttnbd_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-3619371055009729604?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/3619371055009729604/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=3619371055009729604' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3619371055009729604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3619371055009729604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_08.html' title='झूला पटना में डाला रे, अमरइयां!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-461848415870174880</id><published>2007-11-07T08:13:00.000-08:00</published><updated>2007-12-10T23:20:56.342-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>पटना में विरह के वे बरसते हुए दिन!</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;पटना&lt;/strong&gt; की कोई शाम मनहूस नहीं होती। वे दिन भी थे, जब दोस्‍तों ने थाम लिया- वरना हम गंगा के आसपास अकेले भटकते उसके पानी में हमेशा के लिए उतर जाते। प्रेम के एकाध किस्‍सों में अकेले रह जाने के बाद कमरे का अंधेरा फैल भी गया, गिलास में शराब भर भी गयी- लेकिन उदासी का कोई ऐसा सिलसिला नहीं चला, जो विरह का कवि बना दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनाइचक में एक छोटा सा कमरा था। पहले पहलवान लॉज, फिर एक बड़े मकान के ग्राउंड फ्लोर का कमरा। उस कमरे को हमारे एक दोस्‍त ने किराये पर ले रखा था, बाद में मुझे साथ में रखा और मज़े में खाना-वाना भी खिलाता रहा। वो कंपटीशन की तैयारी करता था, अब पटना से सटे मसौढ़ी में डीएसपी है। तबादला होता रहता है। वो कमरा थोड़े दिनों बाद संस्‍कृति-राजनीति की बतकही से गुलज़ार रहने लगा। मेरे पैर पार्टी-पॉलिटिक्‍स में पहले से ही थोड़े फंसे थे।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/08/blog-post_24.html" target="_blank"&gt;नवीन&lt;/a&gt; का आना-जाना उन्‍हीं दिनों शुरू हुआ। वे फिज़‍िक्‍स पढ़ा करते थे। साइंटिस्‍ट बनने के ख़्वाब देखते थे और पीओ की तैयार करते थे। पटना में लड़के आमतौर पर ऐसा करते हैं। लखनऊ, भोपाल और दिल्‍ली के मुखर्जी नगर इलाक़े में भी लड़के यही करते हैं। कोई विकल्‍प नहीं है। ख़्वाब और नियति के बीच उदास सड़कों पर चलना और कभी कभी यूं ही मुस्‍करा देना। क्‍योंकि मैंने कभी कंपटीशन वगैरा में दिलचस्‍पी नहीं ली और अख़बार की सस्‍ती नौकरियों में जी जमने लगा- तो थोड़े मौलिक भी हो गये। दोस्‍ती में वक्‍त बर्बाद करना इसी मौलिकता का सृजनात्‍मक पहलू था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार पूरी दोपहर पटना की सड़कों पर पैदल चलते हुए शाम को उस कमरे में लौट आते थे। वो कमरा अब किसी एक का रह नहीं गया था। सबके दावे हो गये थे और कई बार तो अपनी प्रेमिकाओं को लेकर कोई आ जाता और कहता- थोड़ा टहल आओ। इसकी मार सबसे अधिक पड़ी &lt;strong&gt;धर्मेंद्र सुशांत&lt;/strong&gt; को, जो अब दैनिक हिंदुस्‍तान के दिल्‍ली संस्‍करण में उपसंपादक हैं। कमरे की चाबी उन्‍हीं के पास रहती थी। मां के इंतक़ाल के बाद बाबूजी और बहनें मेरे साथ रहने आ गयी थीं। हमने किराये का एक अलग घर ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी कमरे में पहली बार मैंने अपनी पत्‍नी के हाथ छूए थे, और होंठ भी। तब वो सिर्फ एक ख़ामोश लड़की थी, जो कभी-कभी बोलती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवीन का राजनीतिक रूपांतरण होने लगा था। वे &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Communist_Party_of_India_(Marxist-Leninist)_Liberation" target="_blank"&gt;सीपीआई एमएल लिबरेशन&lt;/a&gt; की तरफ भी झुक रहे थे और &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Communist_Party_of_India_(Maoist)" target="_blank"&gt;सीपीआई एमएल पीपुल्‍स वार&lt;/a&gt; (अब माओइस्‍ट) की तरफ भी। उस कमरे में &lt;a href="http://hindiacom.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html" target="_blank"&gt;रामजी राय&lt;/a&gt; भी आते थे और &lt;a href="http://hindiacom.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html" target="_blank"&gt;अमिताभ&lt;/a&gt; भी। दोनों अपनी अपनी तरह से हमसे संवाद करते थे। रामजी राय के विचार जैसे भी लगें, अमिताभ के जनवादी गीत हमें पसंद आते थे। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Communist_Party_of_India_(Marxist)" target="_blank"&gt;सीपीएम&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Communist_Party_of_India" target="_blank"&gt;सीपीआई&lt;/a&gt; सीन में कहीं नहीं था, जबकि इन पार्टियों के कॉमरेड भी उस कमरे में आते-जाते थे। आख़‍िरकार हम सब लिबरेशन के पाले में चले गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवीन तो अब पार्टी वर्कर हो गये हैं। उसी मसौढ़ी में, जहां &lt;strong&gt;सुशील&lt;/strong&gt; फिलहाल डीएसपी है। ये उन दोनों का संयोग है। हम तो बस इतना ही याद करते हैं कि दोनों पटना में पुनाईचक के उस कमरे में हमसे अपना मन साझा करते थे। नवीन की आदत थी, वे कहीं से भी आते, एक कोने में पसर जाते। उनकी पतली काया एहसास भी नहीं होने देती थी कि वे कमरे में हैं। अंधेरी रात में जब बहस फुसफुसाहटों और भनभनाहटों में तब्‍दील होने लगती, वे मच्‍छड़ मारते हुए उठते। कहते, सोने नहीं दोगे तुमलोग। कई बार बीच बहस में वे कोई सवाल करते और फिर सो जाते। लेकिन बहसबाज़ उनका जवाब दूसरों को देते रहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवीन की शख्‍सीयत में अतीत ज़्यादा घुला हुआ है। वे उस मीठापुर को याद करते हैं, जहां उनका बचपन बीता। मीठापुर पटना जंक्‍शन के पीछे का पुराना, पिछड़ा हुआ इलाक़ा है- जिसने कुछ नामी गुंडे पैदा किये हैं। कुछ शास्‍त्रीय गीतों को भी वे ज़बान पर चढ़ाये रखते थे, जो कभी किसी सिलसिले में सुन लिया था। उनके पास गायकों जैसी आवाज़ नहीं थी और रियाज़ वाली सफ़ाई तो बिल्‍कुल नहीं थी। लेकिन सुर था। प्रेम में पलटी खाने के पहले वे अक्‍सर सुनाया करते थे- &lt;em&gt;बरसन लागी सावन बुंदिया, राजा तोरे बिन लागे न मोरा जिया।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये गीत मेरे चाचा भी गाते थे, जो अब बेतिया में रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना जैसे शहरों में नौजवानी जिन हालातों में बीतती है, उन्‍हें &lt;em&gt;बरसन लागी&lt;/em&gt; जैसा गाना बेहतर अभिव्‍य‍क्‍त करता है। हम मूलत: पटना जैसे शहरों के लोग अब भी वहीं के हैं। यही वो बात है कि तमाम लोगों के बिना जी लगने के बावजूद &lt;em&gt;बरसन लागी&lt;/em&gt; सुनना अच्‍छा लगता है। आप भी सुनें और थोड़ी देर के लिए पटना जैसे शहरों के हो जाएं।&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572017_mrojsnkwwu_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/572017_mrojsnkwwu_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-461848415870174880?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/461848415870174880/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=461848415870174880' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/461848415870174880'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/461848415870174880'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post_07.html' title='पटना में विरह के वे बरसते हुए दिन!'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-5000047821472006736</id><published>2007-11-05T07:56:00.001-08:00</published><updated>2007-12-10T23:21:41.605-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>मोरे पिछवरवा चंदन गाछे हो...</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;2001 की जनवरी।&lt;/strong&gt; महाकुंभ के मेले की दोपहर। क़दमतालों से उड़ते ग़र्दो-गुबार में झोला लटकाये हम घूमते थे। शाम हो जाती थी और रात में कल्‍पवासियों के छोटे-छोटे तंबू के आगे लकड़‍ियां जलने लगती थीं। उनके ताप को घेरे हुए लोगों के साथ थोड़ी देर बैठ कर हम गौरिया मठ में लौट आते थे, जहां एक दिन रात गुज़ारने के लिए मिली थोड़ी सी फ़र्श के एवज़ में डेढ़ सौ रुपये अदा करना होता था। ये सिलसिला हफ्ता भर चला। प्रयाग से थोड़ी ऊब होने लगी, तो हम इलाहाबाद में ठौर खोजने लगे। टेलीफोन डायरेक्‍टरी में &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/04/070406_kavita_yashmalviya.shtml" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;यश मालवीय&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का नंबर खोजा, जिनसे एकाध इधर-उधर की मुलाक़ात थी। बेगूसराय में बरौनी रिफाइनरी के कवि सम्‍मेलन में हमने साथ-साथ गीत पढ़े थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यश मालवीय का घर एक मंदिर था। यश भाई हमें शाम को &lt;a href="http://hindipoetry.blogspot.com/2005/02/blog-post_110884585696500124.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;महादेवी जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के घर ले गये। जिस कमरे में वो रहती थीं, वहां अभी भी उनका बिस्‍तर, उनकी मेज़ मौजूद है। दूसरी सुबह यश भाई की पत्‍नी, जिनका रिश्‍ता महादेवी जी के परिवार से है- उन्‍होंने हमें सोहर सुनाया- &lt;em&gt;छापक पेड़ छिहुलिया...&lt;/em&gt; रामकथा में धोखा और पीड़ा का राग इस सोहर में इस क़दर बसा है कि आपकी आंखों में पानी आ जाए।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले पटना में &lt;a href="http://hindilekhak.blogspot.com/2007/10/ravindra-bharti.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;रवींद्र भारती&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के नाटक &lt;a href="http://hindi.india-today.com/datedir/20001213/kitab2.shtml" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;फूकन का सुथन्ना&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; में ये सोहर सुना। &lt;a href="http://www.prabhatkhabar.com/kitspress/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रभात ख़बर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; में हमारे सीनियर &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/01/blog-post_5794.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;मिथिलेश जी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; अक्‍सर ये सोहर गाकर सुनाते थे, जब हम अख़बार की व्‍यवस्‍थापकीय दुरावस्‍था पर ग़मज़दा होकर थोड़ी-थोड़ी पी लेते थे। अभी &lt;a href="http://thumri.blogspot.com/2007/10/blog-post_11.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;ठुमरी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; में एक दिन देखा- बिमल भाई ने इस सोहर का ज़‍िक्र किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;छापक पेड़ छिहुलिया&lt;/strong&gt; में दर्द की कहानी है। हिरनी का मनुहार है। मेरे हिरन का मृगछाला लौटा दो। लेकिन दशरथ राम के लिए उसकी डफली बनवा रहे हैं, और हिरनी तड़प कर कह रही है- नहीं, ऐसा न करो। उस पर पड़ने वाली थाप की आवाज़ मेरे कानों में पड़ेगी, तो सह न पाऊंगी, हृदय कट जाएगा। मैंने बिमल भाई से अनुरोध किया है कि वे इस गीत को कहीं से उपलब्‍ध करें और &lt;a href="http://thumri.blogspot.com" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;ठुमरी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; पर इसे सुनाएं। उन्‍होंने वादा भी किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर अंतर्जाल के एक बेचैन से सफ़र में हमें &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/11/blog-post_05.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;छन्‍नूलाल मिश्रा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का गाया एक &lt;strong&gt;सोहर&lt;/strong&gt; मिल गया। ऐसा क्‍यों है कि सोहर के सुर में वेदना का राग है? बधैया के बीच में ही तो सोहर गाया जाता रहा है- या फिर मेरी समझ का फेर है! &lt;em&gt;अयोध्‍या में बाजत बधैया हो रामा, रामजी जनम लेल&lt;/em&gt; में एक उल्‍लास है, लेकिन सोहर के किसी भी टेक्‍स्‍ट में वेदना ही वेदना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको सुनाता हूं, &lt;strong&gt;छन्‍नूलाल मिश्रा&lt;/strong&gt; का गाया वो सोहर - &lt;em&gt;मोरे पिछवरवा चंदन गाछे हो sss&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;table bgcolor="#000000" cellpadding="0" cellspacing="0"&gt;&lt;tr&gt;&lt;td&gt;&lt;embed quality="high" pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer" type="application/x-shockwave-flash" bgcolor="#000" width="328" height="94" 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href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=5000047821472006736' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5000047821472006736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/5000047821472006736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='मोरे पिछवरवा चंदन गाछे हो...'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4449547273226315869</id><published>2007-10-28T22:24:00.000-07:00</published><updated>2007-12-10T23:22:21.204-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>वो जो हमसे कह न सके दिल ने कह दिया</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;उसका&lt;/strong&gt; नाम कुछ भी नहीं था। बस एक एहसास ही था उसके आसपास से गुज़रना, बोलने-बतियाने का ज़रा-ज़रा सा बहाना ढूंढ़ना। वो पहली दीवानगी थी, जो अपमान और शर्म की थोड़ी-थोड़ी रेत मुट्ठी में थमाती रही। कभी कहती- आओ, कभी कहती- मत आना कभी। हम थे कि वक्‍त से पहले पहुंच जाते और ख़ाली क्‍लास रूम के बीचोबीच बेंच पर बैठ कर बाट जोहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो हमेशा आती। सहेलियों को समेटे। चप्‍पल और जूतों की टकराहटों में चुप आंखों के साथ। हमने कई बार सादे काग़ज़ पर रंगीन क़लम से मोहब्‍बत का इज़हारनामा लिख कर भेजा। उसने हर बार तोड़ मोड़ कर हमारे बस्‍ते में वापिस कर दिया। ये लंबा सिलसिला था, जो सब जान गये। छोटी कक्षा के बच्‍चे तक। आख़‍िरी इम्‍तहान तक वो चुप रही और मैं इकतरफा शोर मचाता रहा।&lt;span class="fullpost"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बाद में एकाध बार मिले। मिले नहीं, बस आमने सामने हुए। उसकी कालोनी के चक्‍कर काटते हुए कई दोपहरें ख़त्‍म हुईं, उसने कुछ नहीं कहा। औरतों के दिल होते होंगे, उसके नहीं थे। होता, तो पसीजता और अपनी कालोनी के उस टीले पर उसे ले आता, जो दोपहर में गर्म हो जाता था और वहीं बैठ कर हम उसके पीले मकान की तरफ देखते रहते थे। वो जानती थी, पर कभी नहीं झांकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वो दिल्‍ली के किसी हिस्‍से में रहती है। स्‍वामी-बच्‍चों का सुखी परिवार है। स्‍कूल में साथ पढ़ने वाली एक दोस्‍त ने बताया था। कोई पांच-छह साल पहले। अचानक हुई एक मुलाक़ात में। ये कहा कि बीच-बीच में फोन आता है। एक बार तुम्‍हारा भी ज़‍िक्र आया था। पर वो ज़‍िक्र ऐसा ही था- &lt;em&gt;कितना पागल था रे।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचमुच पागल था। दसवीं के एक साल में एक भी दिन नागा नहीं। हर दिन नहा कर जाना। बस्‍ते में किताबों के बीच कंघी रखना। बीच क्‍लास में सबकी नज़र बचाकर बाल संवार लेना। दोस्‍तों के तानों को दिल पे लेना और भिड़ जाना। सब पागलपन ही तो था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब भी रांची जाता हूं, तो उस मोड़ पर चेहरा घूम जाता है, जहां उसकी कालोनी थी। स्‍कूल की गली से यूं ही गुज़रता हूं, तो दीवारों पर नज़र जाती है। बाद के बच्‍चों ने खुरच डाला है- ए+एस। बदमाश कहीं के। जो जोड़ी बनी नहीं, उसे यहां दीवार पर उकेर दिया। स्‍कूल भी दलिद्दर। दीवार वैसी की वैसी है। शर्मा सर की भी नजर पड़ती होगी और दास मैडम, तोमर मैडम भी देखती होंगी। जाने क्‍या सोचते होंगे सब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तो अब सोच भी नहीं पाता। नाम पहले भी नहीं था। अब चेहरा भी धुंधला पड़ता जा रहा है। बरसों बाद एक गीत ने आंखों के सामने वे दिन लाकर खड़े कर दिये... &lt;em&gt;गुंचा कोई मेरे नाम कर दिया, साक़ी ने फिर से मेरा जाम भर दिया... वो जो हमसे कह न सके दिल ने कह दिया...&lt;/em&gt; आइए सुनें...&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/564004_jopnvkcyfc_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/564004_jopnvkcyfc_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-4449547273226315869?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/4449547273226315869/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=4449547273226315869' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4449547273226315869'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4449547273226315869'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/10/blog-post_28.html' title='वो जो हमसे कह न सके दिल ने कह दिया'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8686912678316116049</id><published>2007-10-06T09:46:00.000-07:00</published><updated>2007-10-06T10:14:14.919-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>पानी</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;अब पीया नहीं जाता पानी&lt;br /&gt;मन बेमन रह जाता है&lt;br /&gt;प्‍यास बाक़ी&lt;br /&gt;आत्‍मा अतृप्‍त&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन चौरासी में पहली बार देखा था फ्रिज&lt;br /&gt;सन चौरानबे में पीया था पहली बार उसका पानी&lt;br /&gt;दो हज़ार चार में अपना फ्रिज था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मी में घर लौटना अच्‍छा लगता था&lt;br /&gt;बीच-बीच में उठ कर फ्रिज से बोतल निकालना&lt;br /&gt;दो घूंट गले में डाल कर फिर बिस्‍तर पर लेटना&lt;br /&gt;किताब पढ़ना छत की ओर देखना कुछ सोचना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने पानी की यात्रा एक गिलास, एक लोटे से शुरू की थी&lt;br /&gt;आज अपना फ्रिज है फ्रिज में ठंडा होता पानी अपनी मिल्कियत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम बदल रहा है&lt;br /&gt;ठंडा पानी पीया नहीं जाता&lt;br /&gt;कम ठंडा भी गले से उतरता नहीं&lt;br /&gt;ज़रूरत भर ठंडा पानी जब तक कहीं से आये&lt;br /&gt;प्‍यास धक्‍का देकर कहीं भाग जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे लोग होते हैं वे&lt;br /&gt;जिनकी प्‍यास जैसे ही लगती है बुझ जाती है!&lt;br /&gt;सचिवालय का किरानी पीने भर ठंडा पानी कहां से मंगवाता है!&lt;br /&gt;क्‍या दिल्‍ली में मिलता है पानी!&lt;br /&gt;यमुना किनारे बसे लोग तो पानी के नाम से ही कांपते होंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है प्रधानमंत्री के लिए परदेस से आता है पानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थक कर प्‍यास से बेकल घर पहुंच कर भी&lt;br /&gt;पानी भरा हुआ गिलास मेरी ह‍थेलियों के बीच फंसा है&lt;br /&gt;बहुत ठंडा है बहुत गर्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम साधारण आदमी का सफ़र फिर से शुरू करना चाहते हैं&lt;br /&gt;नगरपालिका के टैंकर के आगे कतार में खड़े होना चाहते हैं&lt;br /&gt;बस से उतर कर पारचून की दुकानों में सजी बंद बोतलों से मुंह चुराना चाहते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क पर ठेले का पानी मिलता है सिर्फ पचास पैसे में&lt;br /&gt;एक के सिक्‍के में दो गिलास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर इसमें मिट्टी की बास आती है&lt;br /&gt;गले में खुश्‍की जम जाती है&lt;br /&gt;मुझे रुलाई आती है&lt;br /&gt;मुझे ज़ोर की प्‍यास सताती है!&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8686912678316116049?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8686912678316116049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8686912678316116049' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8686912678316116049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8686912678316116049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='पानी'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-1879628209845922224</id><published>2007-09-30T22:09:00.000-07:00</published><updated>2007-10-01T08:08:51.741-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>हमने कुमार गंधर्व को देखा है</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;हम&lt;/strong&gt; दरभंगा के आवारा छोरे देवास और मालवा की आवोहवा समेटे कुमार गंधर्व की आवाज़ के दीवाने क्‍यों हुए? वो जो वक्‍त था, जब हम बड़े होना नहीं चाहते थे, उस वक्‍त का डिस्‍को सांग - &lt;em&gt;आइ एम अ डिस्‍को डांसर&lt;/em&gt; - गाते थे और ख्‍वाहिश करते थे कि जैसे फिल्‍म में मिथुन चक्रवर्ती जादूगर की तरह पैर को थिरकाता है, हम भी थिरकाएं। हमारे मकान मालकिन की खूबसूरत हमउम्र बेटी को तबला मास्‍टर कुछ सिखाने आते थे। शायद संगीत के सुर। हमने उन्‍हें लकड़ी की चौकी पर हाथ से ठुमका बजा कर दिखाया। कहा- मैं भी बजा सकता हूं। मुझे तबला सिखाइए। हमेशा खामोश रहने वाले और गुनगुनाहट से आगे संगीत को त्‍यौरियां चढ़ा कर देखने वाले बाबूजी से तबला मास्‍टर ने कह दिया। कहा होगा यही कि आपके बेटे में हुनर है, लेकिन बाबूजी को लगा कि तबला मास्‍टर उनके बेटे को नचनिया-गवैया बनाने के फेर में है। मैंने सुना नहीं, बाबूजी उनसे क्‍या कह रहे हैं। लेकिन उसके बाद से तबला मास्‍टर जब भी मुझसे टकराते, निरीह नज़रों से देख कर गुज़र जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तबला नहीं सीख सका। मेरे छोटे चाचा, जिनका बेतिया में अपना कारोबार है, गाने के बेहद शौकीन। वे ग़ुलाम अली को गाते थे, रफी के क्‍लासिकल को हूबहू मिला देते थे, अभाव में भी अच्‍छी कमीज़ पहनते थे, घुंघराले बालों को मज़े की कारीगरी के साथ धूल-गर्दों से बचा कर रखते थे, मेरे आदर्श थे। &lt;a href="http://www.musicindiaonline.com/s?i=9&amp;q=ghulam%20ali" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;ग़ुलाम अली&lt;/a&gt; का गाया, &lt;em&gt;बरसन लागी सावन बुंदिया राजा, तोरे बिना लागे ना मोरा जिया&lt;/em&gt; हमारी बहनें उन्‍हें बैठा कर, घेर कर सुनती थीं। इंटर के दौरान मेरी छोटी-छोटी इश्‍कबाज़‍ियों से आजिज आकर बाबूजी ने एक बार मु‍झे बेतिया भेज दिया, तो वहां से मैं चाचा का हारमोनियम उठा लाया। दरभंगा रेडियो स्‍टेशन के नेत्रहीन कलाकार - जिनकी शाम शराबनोशी में बुरी तरह बीतती थी - उन्‍होंने मुझसे वादा किया था कि वे मुझे हारमोनियम पर उंगली घुमाना सिखाएंगे। लेकिन हर शाम की उनकी अदाएं देख कर मेरा उत्‍साह जवाब दे गया। एक ही स्‍वर लहरी मैंने सीखी और अकेले में अक्‍सर वही रियाज़ आज तक करने की कोशिश करता हूं - &lt;em&gt;सा सा सा सा निधा निधा पमप ग ग पमप गारे गारे निधस।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सबके बीच कुमार साहब कहीं नहीं थे। वे कब हमारी ज़‍िंदगी में आकर हमें संगीत का गहरा अर्थ समझा गये, मालूम नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद एक वक्‍त कबीर की धुन सवार हुई थी। जिन जिन ने कबीर को गाया, हमने सुना। खोज-खोज कर। दरभंगा से पटना तक, जितना मिला। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/B._V._Karanth" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;ब व कारंत साहब&lt;/a&gt; सन 2000 के आसपास पटना आये थे। खुदा बख्‍श लाइब्रेरी में उन्‍होंने खुद कुछ नाट्य गीतों की प्रस्‍तुति की थी। एक गीत था- &lt;em&gt;सजना अमरपुरी ले चलो। अमरपुरी की सांकर गलियां अटपट है चलना। सजना अमरपुरी ले चलो।&lt;/em&gt; कुछ ऐसा वीतरागी भाव, जिसमें खनक भी थी, हमारी स्‍मृतियों का सबसे जीवंत हिस्‍सा बन गया। लेकिन कुमार साहब की कबीरवाणी तो रोएं खड़े कर देती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्‍यवर्गीय और उससे भी कम आय वाले संगीतपसंद लोगों के लिए कम उपलब्‍ध कुमार गंधर्व का हम जैसों की ज़‍िंदगी में होना ही ख़ास मायने रखता है। लेकिन इन मायनों के बीच अक्‍सर ये गुम हो जाता है कि अच्‍छी और शास्‍त्रीय आवाज़ों का जुगाड़ कैसे लगा, कब लगा। दो अदद कैसेटों और कलावार्ता के कुछ पुराने अंकों की खाकछानी में कुमार साहब को लेकर पैदा हुई दीवानगी को कितना उत्‍साह मिला होगा, जब यू ट्यूब पर उनके एक वर्षागीत का वीडियो मिल गया होगा, ज़रा सोचिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिराक साहब की गज़ल का एक टुकड़ा आप भी जानते होंगे- &lt;em&gt;अब अक्‍सर चुप चुप से रहे हैं, यूं ही कभू लब खोले हैं/ पहले फिराक को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं।&lt;/em&gt; लेकिन तकनीक के इस तेज़रफ्तार वक्‍त में हम अतीत के बोलते हुए दृश्‍यों को भी आज समेट सकते हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...जैसे हमने कुमार साहब की इस छवि को यहां समेटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="400" height="350"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/6GLQStiHPek"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/6GLQStiHPek" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="400" height="350"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-1879628209845922224?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/1879628209845922224/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=1879628209845922224' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1879628209845922224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1879628209845922224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/09/blog-post_30.html' title='हमने कुमार गंधर्व को देखा है'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-3200079910572325718</id><published>2007-09-29T11:32:00.000-07:00</published><updated>2007-09-29T11:36:07.408-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>हिंदी मेरी भाषा</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;हमारे दोस्त कुछ ऐसे हैं&lt;br /&gt;जो दरिया कहने पर समझते हैं कि हम किसी कहानी की बात कर रहे हैं&lt;br /&gt;उन्हें यक़ीन नहीं होता कि समंदर को&lt;br /&gt;समंदर के अलावा भी कुछ कहा जा सकता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब्‍जी को शोरबा कहने पर समझते हैं&lt;br /&gt;ये मैं क्या कह रहा हूँ&lt;br /&gt;ऐसा तो मुसलमान कहते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ तक कि गोश्‍त कहने पर उन्हें आती है उबकाई&lt;br /&gt;जबकि हजारों-हजार बकरों-भैंसों को&lt;br /&gt;कटते हुए देखकर भी&lt;br /&gt;वे गश नहीं खाते&lt;br /&gt;शायद इंसानों के मरने का समाचार भी उन्हें वक्त पर खाने से मना नहीं करता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे गाँव में भी अब बोली जाने लगी है हिंदी&lt;br /&gt;पर उस हिंदी में कुछ दिल्ली है, कुछ कलकत्ता&lt;br /&gt;लखनऊ अभी दूर है&lt;br /&gt;शहरों में होती हैं भाषाएँ तो भाषा में भी होते हैं शहर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त कहते हैं&lt;br /&gt;तुम्हारी हिंदी में सरहद की लकीरें मिट रही हैं&lt;br /&gt;ये ठीक नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता खाने की थाली फेंक देते हैं&lt;br /&gt;बहनें आना छोड़ देती हैं&lt;br /&gt;पड़ोसी देखकर बचने की कोशिश करते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अपनी हिंदी में खोजना चाहता हूं गाँव&lt;br /&gt;एक शहर जहाँ दर्जनों तहजीबें हैं&lt;br /&gt;वे सारे मुल्क़ जहाँ हमारे अपने बसे हुए हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्तों की किनाराक़शी मंजूर है&lt;br /&gt;मंजूर है हमारे अपने छोड़ जाएँ हमें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो अब गुजराती भी हिंदी-सी लगने लगी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;‘वैष्‍णव जन तो तेणे कहिए जे&lt;br /&gt;पीड़ परायी जाणी रे’&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जितना मुलायम रखेंगे अपनी जबान&lt;br /&gt;हमारे पास उतने मुल्क़ बिना किसी सरहद के होंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना मर्मांतक है दुनिया भर के युद्धों का इतिहास!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="320" height="240"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/llplayer/llplayer.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/videos0/533307_vockrjucpq_conv.flv&amp;noAuto=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/llplayer/llplayer.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/videos0/533307_vockrjucpq_conv.flv&amp;noAuto=1" type="application/x-shockwave-flash" width="320" height="240"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-3200079910572325718?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/3200079910572325718/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=3200079910572325718' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3200079910572325718'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3200079910572325718'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/09/blog-post_29.html' title='हिंदी मेरी भाषा'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-878494622024373994</id><published>2007-09-28T11:54:00.000-07:00</published><updated>2007-09-28T12:14:59.361-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृतियों की अनुगूंजें'/><title type='text'>नैन घट घट तन एक घड़ी</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;एक&lt;/strong&gt; ही कमरा था। बाबूजी थे। तीन बहनें थीं। मां का आंचल था, पतली सूती साड़ी का कोर। हम सब उस जगह को लॉज का एक कमरा कहते थे। एक कतार में ढेर सारे कमरों में जो परिवार बसे हुए थे, उनके घर से अक्सर सब्‍ज़ी की कटोरी आती थी। हमारे घर से भी कभी कभी जाती थी। सबमें इतना घरापा होने के बावजूद हम अपने ही कमरे के लोग थे। हमारी अपनी ही दुनिया थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां ने बरामदे की जगह को मिट्टी से ज़रा सा ऊंचा करके किचन बनाया हुआ था। कोयले के चूल्हे पर खाना बनता था। धुआंई शाम में हम कमरे में खीझ रहे होते थे। सुबह तो पता ही नहीं चलता था कि चूल्हे की आंच कब सुलगायी गयी, कब रोटी बनी और प्याज को भून कर कब बाबूजी के सामने परोस दिया गया। उसकी गंध से नींद खुलती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी अहले सुबह उठते थे। उन्हें ट्यूशन पढ़ाने जाना होता था। चार बजे उनके मुंह में ब्रश होता था और एक खास तरह की गुनगुनाहट भी। आज भी उनकी सुबह चार बजे होती है और मुंह धोते वक्त आज भी वे गुनगुनाते हैं। लेकिन अब सबके अपने अपने कमरे हैं और सबकी आवाज़ अपने अपने कमरों में क़ैद है। लेकिन उन दिनों हमारी नींद को बाबूजी की गुनगुनाहट थपथपाती रहती थी। हम अलसाये से उलटते-पुलटते रहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद खुलती थी आकाशवाणी की आवाज़ से। ये आकाशवाणी का दरभंगा केंद्र है। इस उद्-घोषणा के साथ ही भजन का सिलसिला शुरू होता था। तब उसमें मन रमता नहीं था। लेकिन क्या पता था कि उन भजनों के सुर ज़ेहन में ऐसे बसेंगे कि बहुत बाद में भी हूक की तरह बार-बार सीने में उठते रहेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना के हमारे दोस्त हैं &lt;a href="http://hindiacom.blogspot.com/2007/08/blog-post_13.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;नवीन कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;। उन्होंने मुश्किल वक्तों में मेरा साथ दिया है। सीपीआई एमएल के होलटाइमर हैं और मसौढ़ी में किसान-मज़दूरों के बीच काम करते हैं। उनके एक साथी के यहां से हमने अपनी पसंद का एक कैसेट उड़ाया। सुना तो एक आवाज़ वही बचपन में आकाशवाणी की जानी-पहचानी आवाज़ के अतीत में छोड़ गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;नैन घट घट तन एक घड़ी।&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rv1PubZzx0I/AAAAAAAABFQ/3YJSZSkA2nw/s1600-h/kumar+gandharva.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rv1PubZzx0I/AAAAAAAABFQ/3YJSZSkA2nw/s320/kumar+gandharva.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5115332410811336514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kumar_Gandharva" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कुमार गंधर्व&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; का ये भजन आकाशवाणी से अक्‍सर प्रसारित होता था। कुमार गंधर्व हमारे बोध में उन्‍हीं दिनों जम गये थे, जब नाटक और कविता हमारी दिलचस्‍पी बन रही थी। पता नहीं कैसे। शायद भोपाल से निकलने वाली कलावार्ता के अंकों में देख कर या बाबा नागार्जुन के यहां से लाये गये एक कैसेट को सुन-सुन कर। एक ऐसी आवाज़, जो लहरों की तरह उठती थी और ऊपर ही कहीं खो जाती थी। सुर का दोहराव फिर नीचे से शुरू होता था। बाद में हमने ढूंढ़ ढूंढ़ कर कुमार साहब को खूब सुना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज इंटरनेट पर आवारागर्दी के दौरान वही भजन मिल गया। आप सबकी नज़र कर रहा हूं... &lt;em&gt;नैन घट घट तन एक घड़ी...&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;object width="400" height="20"&gt;&lt;param name="movie" value="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/537033_rwwurnciot_conv.flv&amp;autoStart=false"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://lifelogger.com/common/flash/flvplayer/flvplayer_basic.swf?file=http://avinashonly.lifelogger.com/media/audio0/537033_rwwurnciot_conv.flv&amp;autoStart=false" type="application/x-shockwave-flash" width="400" height="20"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-878494622024373994?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/878494622024373994/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=878494622024373994' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/878494622024373994'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/878494622024373994'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/09/blog-post_28.html' title='नैन घट घट तन एक घड़ी'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rv1PubZzx0I/AAAAAAAABFQ/3YJSZSkA2nw/s72-c/kumar+gandharva.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-2625160070477477199</id><published>2007-09-04T23:24:00.000-07:00</published><updated>2007-09-05T02:28:20.266-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यहां वहां जहां तहां'/><title type='text'>दिल्‍ली हाट और मंच पर मोरनी</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;उस दिन&lt;/strong&gt; दिल्‍ली हाट में टहलते हुए हमने बेहतरीन शाम बितायी। मन में आया घर पहुंच कर कुछ लिखेंगे। लेकिन घर आकर वे सारे चित्र एक बहुत बुरी और उलझी हुई पेंटिंग में बदल गये। अक्‍सर ये होता है। एक सफ़र और एक शाम में आप दर्जनों ऐसे वाक्‍य सोचते हैं, जो आपको खुद की प्रतिभा के मुकाबले बेमिसाल लगते हैं। आप उन्‍हें कभी लिख नहीं पाते, और इस बात का अफ़सोस आपकी ज़‍िंदगी को बोझिल करता चलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन लोगों से कितनी ईर्ष्‍या होती है, जिनका लिखना सोचने की रफ्तार से ज़्यादा तेज़ होता है। यहां तो हम कुछ सोचकर कंप्‍यूटर पर बैठते हैं, और शुरुआती वाक्‍य को ही बीसियों बार काटते हैं। यानी शुरुआत मेरे लिए हमेशा एक कठिन काम होता है। अब जैसे दिल्‍ली हाट का मैं कोई संस्‍मरण नहीं लिखना चाहता हूं। लिखना चाहता हूं कि देश की राजधानी में इस जगह के सुकून के पीछे का अर्थशास्‍त्र कितना कामयाब है। देसी धुन, देसी कला और देसी स्‍वाद यहां किस वर्ग के लोगों को अपना उपभोक्‍ता बनाये हुए है। लेकिन चूंकि अर्थशास्‍त्र अपना इलाक़ा नहीं है, इसलिए ऐसी कल्‍पना शब्‍दों की पगडंडी में नहीं ढल पाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्‍सर हमारे मित्र &lt;strong&gt;कृष्‍णदेव&lt;/strong&gt; और उनकी मित्र &lt;strong&gt;आकांक्षा&lt;/strong&gt; हमें दिल्‍ली हाट बुलाया करते थे। अक्‍सर हम टालते रहते थे कि बेगानों के ऐश्‍वर्य में अपनी कुंठा को रसद-पानी देने क्‍यों जाएं। वे हमें समझाते कि आपके मिज़ाज की हवा यहां बहती है। देश के कोने-कोने से चलकर आवाज़ें और वाद्य यहां पहुंचते हैं। हम अपने मन को समझाते कि गणतंत्र दिवस में नुमाइश लगने वाली देशज संस्‍कृति की परेड से अलग वहां क्‍या मिलेगा। बाक़ी तो आईटीओ पर बीस-पच्‍चीस रुपये में असली देसी माल वाला कैसेट मिल ही जाता है। बिजली रानी से लेकर देसिल बयना का संगीत एक महीना चल कर ख़राब भले हो जाता है- लेकिन इतना तो लगता है कि बौर के मौसम में कान में रेडियो लगा कर आमगाछी की दोपहरी काट रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उस दिन साथ-संगत छूटने के लंबे वक्‍त के बाद जब मैं अपने विवादों का पुलिंदा साथ लेकर चलने वाले हमारे दोस्‍त &lt;strong&gt;राकेश मंजुल&lt;/strong&gt; के पास गया, तो तय हुआ, शाम में साथ खाएंगे। मंजुल जी ने कहा, जगह तुम तय करो। मेरे मुंह से निकल गया- दिल्‍ली हाट चलते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ की कढ़ाई, मिट्टी-लकड़ी की कारीगरी और हमारे गांव की मधुबनी पेंटिंग का मोल जानते हुए हम विंडो शॉपिंग की मनहूसियत से मुख़ातिब थे। राजस्‍थान की प्‍याज कचौड़ी और गुलाब जामुन खाने के बाद यूं टहलते हुए अपनी सेहत के साथ इंसाफ़ होता हुआ लगता है- लेकिन राकेश मंजुल आनंद में डूबे हुए थ्‍ो। वे सरस्‍वती की प्रतिमा से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों की लकड़ी से बनी एब्‍सर्ड कलाकृति के दाम टटोल रहे थे। सब दस हज़ार से ऊपर का था। हमारे तो हाथ-पांव फूल रहे थे। महीने के आख़‍िर में आने वाली तंगी याद आ रही थी। लेकिन राकेश मंजुल सब ख़रीद लेना चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक लोक संगीत की एक लड़ी मेरे कानों में पड़ी। हमने पीछे पलट कर देखा- छोटा सा स्‍टेज। राजस्‍थानी वेशभूषा में कलाकारों की एक पांत साज़ लेकर बैठी है। एक अधेड़ राजस्‍थानी आदमी और एक ऑस्‍ट्रेलियाई युवक लंबी माइक के सामने खड़ा दो अलग-अलग ज़बान की सांगीतिक जुगलबंदी में उलझा हुआ है। एक छोटा बच्‍चा हथेली भर का ढोल लिये स्‍टेज के वृत्त पर नाच रहा है। हम उधर चले गये। कई दर्जन लोगों की तादाद वहां उनकी महफिल में डूबी हुई बैठी थी।&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;(अच्‍छा, तो &lt;strong&gt;कृष्‍णदेव&lt;/strong&gt; और &lt;strong&gt;आकांक्षा&lt;/strong&gt; की बतायी यही वो जगह है, जहां अक्‍सर वे अपनी शामें हसीन करते रहे हैं।)&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;राजस्‍थानी कलाकारों ने एक गीत छेड़ा- मोरया, बागा मा डोले आधी रात मा। मोरनी के विरह या मोरनी के आगे-पीछे मंडराने की कथा कहता ये गीत राजस्‍थान में मशहूर है और हिंदी फिल्‍म लम्‍हे में भी इसको एक्‍सप्‍लोर किया गया है...&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;मोरनी बागा मा डोले आधी रात मा...&lt;br /&gt;छनन छन चूड़‍ियां छनक गयी साहिबां...&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;ख़ास बात ये थी कि राजस्‍थानी कलाकार अपनी बलंद आवाज़ में जब इस गीत की कड़‍ियां जोड़ते तो लगता कि मन की वीरानी में दर्द ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहा है। हमारे हृदय कट कर गिर रहे हैं। ठीक यही एहसास होता था, जब वो ऑस्‍ट्रेलियाई युवक अपनी ज़बान में मोरया का दर्द उतारता था...&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;मोरया, बागा मा डोले आधी रात मा...&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;दिल्‍ली देश भर के लोगों और कॉरपोरेट बैंकों के कर्ज़ पर ख़रीदी हुई कारों से भरा हुआ महानगर है। यहां ऊंची इमारतें और धुआं बढ़ रहे हैं। ऐसे में दिल्‍ली हाट रेगिस्‍तान के उस चश्‍मे सा नज़र आती है, जो नज़र भर का सुकून आपके ज़ेहन में चमका जाती है। क्‍योंकि ऐसी जगहों पर उम्र बिता देने की ख्‍वाहिशों के साथ आपको अपनी भीड़-भाड़ में लौटना पड़ता है। हम दिल्‍ली हाट से लौट आये हैं। अब कब जाएंगे, पता नहीं। क्‍योंकि हम सबने अपनी-अपनी ख्‍वाहिशों के साथ पांव-पैदल चलना बहुत पहले ही छोड़ दिया है।&lt;em&gt;&lt;blockquote&gt;आइए देखते हैं, लम्‍हे का वो मशहूर गीत, &lt;strong&gt;मोरनी बागा मा डोले आधी रात मा&lt;/strong&gt;...&lt;/blockquote&gt;&lt;/em&gt;&lt;object width="425" height="350"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/vWG1VY3S7Eo"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/vWG1VY3S7Eo" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="350"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-2625160070477477199?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/2625160070477477199/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=2625160070477477199' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2625160070477477199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2625160070477477199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='दिल्‍ली हाट और मंच पर मोरनी'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-7871305093854759842</id><published>2007-08-21T23:06:00.000-07:00</published><updated>2007-09-02T05:38:57.090-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>ये दरअसल हमारे मुल्‍क की वीरानी है</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a onclick="window.open(this.href,this.target,'status=no,scrollbars=no,resizable=yes,width=409,height=269'); return false;" href="http://www.bbc.co.uk/mediaselector/check/hindi/meta/dps/2007/08/070821_qurratul_ain_haider?size=au&amp;amp;bgc=003399&amp;lang=hi&amp;amp;nbram=1&amp;nbwm=1" target="avaccesswin"&gt;&lt;img class="buttonpadding" src="http://www.bbc.co.uk/hindi/images/furniture/button_audio.gif" title="" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s1600-h/kurrtul-en-haider.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s200/kurrtul-en-haider.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5102139109744470594" /&gt;&lt;/a&gt;जिस वीरानी में &lt;strong&gt;कुर्तुल आपा&lt;/strong&gt; ने पूरी ज़‍िंदगी गुज़ारी, वही वीरानी अस्‍पताल में उनके साथ अब भी मौजूद थी, जब उनकी सांस थम गयी थी। शव उनके वार्ड से निकाल कर उस कमरे में रख दिया गया था, जहां दरअसल शव ही रखे जाते हैं। रिसेप्‍शनिस्‍ट के पास कोई ज़्यादा जानकारी नहीं थी। टीवी वाला कहने पर अस्‍पताल के प्रशासनिक रूम का रास्‍ता ज़रूर बता दिया। वहां से पता चला, सुबह तीन बजे ही इंतक़ाल हुआ। साथ के लोग शव छोड़ कर घर चले गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ्तर में काम के बोझ से थोड़ा हल्‍का होने के लिए हम स्‍मोकिंग ज़ोन में खड़े थे कि &lt;a href="http://naisadak.blogspot.com" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;रवीश कुमार&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने फोन किया- &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/08/070821_hyder_contribution.shtml" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;कुर्तुल एन हैदर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; नहीं रहीं। हम दौड़ते हुए न्‍यूज़ रूम पहुंचे। ब्रेकिंग न्‍यूज़ की पट्टी टीवी स्‍क्रीन पर चल रही थी। खेल बुलेटिन के बीच में रवीश के हल्‍ला करने पर हमने चार लाइन की इनफॉर्मेशन एंकर के लिए लिखी- उर्दू की मशहूर लेखिका कुर्तुल एन हैदर का आज सुबह नोएडा के कैलाश अस्‍पताल में निधन हो गया है। उनकी मशहूर किताब आग का दरिया की अब तक लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं। उन्‍हें ज्ञानपीठ पुरस्‍कार भी मिल चुका है। आज शाम साढ़े चार बजे उन्‍हें जामिया के क़ब्रिस्‍तान में सुपुर्दे ख़ाक किया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... और वीटी लाइब्रेरी से टेप लेकर सीढ़‍ियों पर लगभग दौड़ते हुए स्‍टोर की तरफ भागे। ओबी वैन पहले ही रवाना हो चुकी थी। जिस अफरातफरी के आलम में ये क़यास लगाते हुए पहुंचे कि अस्‍पताल में भारी भीड़ होगी, वहां वे तमाम लोग मौजूद थे, जिन्‍हें शायद नहीं पता होगा कि यहीं एक इतिहास शव कक्ष में खामोश लेटा हुआ है। जानने वालों को शायद आपा के इंतक़ाल की ख़बर नहीं थी या हम इस समझ से भागना चाहते थे कि हमारे मुल्‍क में कुर्तुल जैसी शख्‍सीयत के नहीं रहने के कोई मायने नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भी कहां जानते हैं कुर्तुल एन हैदर को! दफ्तर से अस्‍पताल तक, जितनी देर गाड़ी ने वक्‍त तय किया, इधर उधर फोन मारते रहे। लगभग आधा दर्जन दोस्‍तों से कुर्तुल के नहीं होने का मतलब टटोलते रहे।&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;(मुंबई में &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/11952815871710931417" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रमोद सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ने कहा था- आग का दरिया कहीं से लहा लो। लहा नहीं पाये। नये नये एनडीटीवी में आये तो एक दिन &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Vinod_Dua" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;विनोद दुआ&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के हाथ में दिख गया। हमने कहा- दे दीजिए, पढ़कर लौटा देंगे। उन्‍होंने कहा- किस पब्लिकेशन का चाहिए? ये एक टीवी पत्रकार का सवाल था। हम लाजवाब थे। उन्‍होंने समझाया कि दो पब्लिकेशन से ये किताब शाया हुई है। किताबघर वाला अनुवाद ज़्यादा अच्‍छा है, लेकिन वे उन दिनों उसे पढ़ रहे थे। पढ़कर देने का वादा अब भी वादा ही है, जिसे शायद वे भूल चुके होंगे।)&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;अस्‍पताल से ही घर का पता मिला। सेक्‍टर 21 ई 55, हम वहां गये। वहां भी अस्‍पताल जैसी वीरानी ही तैर रही थी। बाहर कुछ किताबें रखी थीं, जिसके पन्ने टीवी के कुछ कैमरामैन पलट रहे थे। अंदर आम-फहम से दिखने वाले तीन-चार पड़ोसी जैसे लोग हाथों में उर्दू की पतली सी कोई पाक किताब लेकर प्रार्थना जैसा कुछ बुदबुदा रहे थे। अगरबत्ती की गंध घर से बाहर बरामदे में आकर पसर चुकी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपा की किताबों से कुछ बेहद ही ख़ूबसूरत तस्‍वीरें हमारे कैमरामैन ने उतारी। उन दिनों की तस्‍वीरें, जब कुर्तुल जवान थीं और जब अपनी जवानी को उन्‍होंने वीरानी का हमक़दम बनाने का फ़ैसला लिया होगा। प्रमोद &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2007/08/blog-post_21.html" target="_blank"&gt;सही कहते हैं&lt;/a&gt; कि जबकि एक हिंदुस्‍तानी औरत के लिए इस तरह का जीवन मुश्किल है- अपने वक़्त में अविवाहित, अकेली रहीं। उनकी तीस बरस पुरानी दोस्‍त &lt;strong&gt;शुग़रा मेहदी&lt;/strong&gt;, जो हमें वहीं मिल गयी, कैमरे के सामने की गुफ्तगू में हमें बताया कि वे इस मस'ले पर कुछ भी पूछो ख़फ़ा हो जाती थीं। कहती थीं, पूरी दुनिया संग-साथ शादी-ब्‍याह में रची-बसी है, एक मैं ही अकेली हूं तो क़हर क्‍यों बरपा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकेले रहना दरअसल अपने साथ होना होता है। अपने साथ होकर आप तबीयत से दुनिया के रहस्‍य सुलझा सकते हैं। उन्‍होंने सुलझाया। आग का दरिया का नीलांबर रामायण-महाभारत के वक्‍त से लेकर आधुनिक वक्‍त तक से संवाद करता है। महफिलों वाला आदमी तो कायदे से अपने वक्‍त से भी संवाद नहीं कर पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर दोपहर बाद से लोगबाग आने शुरू हुए। डेड बॉडी भी आयी। टेलीविज़न की ढेरों गाड़‍ियों से निकल कर पत्रकार ई 55 के आगे चहलक़दमी करने लगे। लेकिन तब तक कुर्तुल के नहीं होने की ख़बर का कोई मतलब नहीं रह गया था। देश में दूसरे बड़े डेवलपमेंट टेलीविज़न से पूरा-पूरा वक्‍त की मांग कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाइट शिफ्ट के बाद की जगी दुपहरी में आंख का गर्दा परेशान करने लगा। सुपुर्दे-खाक से पहले हमने घर का रुख कर लिया।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-7871305093854759842?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/7871305093854759842/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=7871305093854759842' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7871305093854759842'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7871305093854759842'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/08/blog-post_9789.html' title='ये दरअसल हमारे मुल्‍क की वीरानी है'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/Rs5wfO7yakI/AAAAAAAAA84/RczjW1pCMcA/s72-c/kurrtul-en-haider.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-2064271582740909596</id><published>2007-08-12T22:19:00.000-07:00</published><updated>2007-08-12T22:27:36.646-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>हंसी के ख़‍िलाफ एक गद्य</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;वे प्रणय के क्षण हों चाहे न हों, गर्दन पर होंठ जाते ही उनकी हंसी फूट पड़ती है। आप एहसास की पतली चादर को उनकी गर्दन पर लपेटना चाहेंगे और हंस हंस कर वो उसके धागे उधेड़ देगी। खामोश पानी में कंकड़ पड़ने से वृत्त जिस तरह छोटे से बड़ा होता जाता है, ये हंसी भी पहले गुनगुनाहट में और आख़‍िरकार ख‍िलखिला खिलखिला कर निकल पड़ती है। ऐसी हंसी जो प्रणय के आपके काम को अधूरा कर देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंसी कई बार आपकी पटरी पर चल रही ज़‍िंदगी से क़दमताल करके आपको पीछे छोड़ देती है और मुड़-मुड़ कर देखते हुए आपका मज़ाक़ उड़ाती है। बरसों पहले लंबे समय तक रांची मेडिकल अस्‍पताल में भर्ती रहने के बाद हमारे नानाजी का इंतकाल हो गया। सुबह-सुबह डॉक्‍टरों ने इत्तला की थी। अस्‍पताल में सबने अपने को ज़ब्‍त करके रखा हुआ था, क्‍योंकि सबको मालूम था कि नाना जी नहीं बचेंगे। मैंने अपनी मां के अलावा उस मौक़े पर रोते हुए किसी को नहीं देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक्‍त हम नवीं कक्षा में थे। अस्‍पताल से घर लौट रहे थे। पैदल ही। महज़ डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी, घर और अस्‍पताल के बीच। या शायद उतनी भी नहीं होगी। हमें तो उन दिनों चलना आता था और खूब चल कर हम खुश होते थे। घर में मामाओं की ग़ैररचनात्‍मक निगहबानियों के बीच घर से बाहर किसी भी डगर पर चलना हमें अच्‍छा लगता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर के पास पहुंचे, तो पड़ोस में रहने वाले एक बुज़ुर्ग शख्‍स ने नाना जी का हाल पूछा। मेरा पूरा चेहरा हंसने लगा और पूरी तरह उस हंसी को दबाने की कोशिश करते हुए बताया- नानाजी गुज़र गये। मैं दुखी था, लेकिन मैं हंस रहा था। क्‍यों हंस रहा था, नहीं मालूम। लेकिन जैसे ही उन पड़ोसी का घर गुज़रा, मैं खुद से ही शर्मसार हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो वाक़या अब भी याद आता है, तो शर्म की एक हिलोर से मन दुखी हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरभंगा में उन दिनों सुबह से शाम-रात तक घर से ग़ायब रहने के दिन थे। शामें अक्‍सर नाटकों के रिहर्सल में बीतती। इप्‍टा के लिए &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2006/07/060719_column_kamleshwar.shtml" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;जगदीश चंद्र माथुर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; के एक नाटक कोणार्क का रिहर्सल हमने बहुत दिनों तक किया। उसका मंचन कभी हो नहीं पाया। और उसकी वजह सिर्फ मैं था। आधे नाटक के बीच नाटक के दो अहम पात्रों का सघन संवाद चलता है। विशु और किशोर कारीगर। विशु शहर के मंजे हुए अभिनेता थे, जिनकी हार्डवेयर की दुकान थी और किशोर कारीगर मैं बना था। संवाद के लंबे-तीखे सिलसिले में एक वक्‍त ऐसा आता है, जब दोनों की आंखें मिलती है। और जैसे ही विशु अपनी गहरी नज़रें किशोर कारीगर की मासूम आंखों में गड़ाता, मेरी हंसी निकल जाती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी मुझे महीनों तक मौक़ा दिया गया। और महीनों उस एक सीन के रिहर्सल के दौरान मैं हंस पड़ता था। एक वक्‍त तो ऐसा भी आया कि वो सीन आने से पहले निर्देशक ब्रेक करके बोलते कि अबकी हंसा तो थप्‍पड़ लगेगा। लेकिन तब क्‍या होता कि इधर विशु और कारीगर की आंखें मिली, उधर निर्देशक खुद भी हंसने लगते। विशु भी हंसते। वे सब हंसते, जो रिहर्सल देखते। एक संजीदा दृश्‍य का हश्र हास्‍यास्‍पद हो गया था। आख़‍िरकार वो नाटक हमने कभी नहीं किया। और, ये बात अब तक समझ में नहीं आती है कि उस हंसी के स्रोत क्‍या थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी रास्‍ते चलते हंसने की इच्‍छा होती है और हम हंसते हैं और इधर-उधर देखते हैं कि कोई देख तो नहीं रहा है। उस साल पटना के हमारे पांच दोस्‍तों का एनएसडी में दाखिला हुआ था। संयोग से मैं दिल्‍ली में था और अक्‍सर शाम को मंडी हाउस चला जाता था। एक दिन अंधेरा उतरने पर जब मैं लौट रहा था, तो दूर से देखा कि &lt;a href="http://hashiya.blogspot.com/2007/07/blog-post_16.html" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;क्रांति&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; आ रही हैं। अपने आप से कुछ बातें करते, निकल पड़ने को बेताब हंसी को दबाने की कोशिश करते। उस वक्‍त वो आलोकधन्‍वा की बीवी थीं और क़ानूनी तौर पर तो आज भी हैं। अब उनका नाम असीमा भट्ट है। तो जैसे ही एनएसडी के दरवाज़े पर हमारी आंखें मिलीं, वो असहज हो गयीं। संक्षेप में हाल-चाल लेने के बाद वो ऐसे भागी कि बाद की कई मुलाक़ातों में असहज होती रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंसना आपके हिस्‍से का हक़ है। आप अकेले भी हंसते हैं और सबके साथ भी। हितैषी कहते हैं, हंसो हंसो खूब हंसो। स्‍वस्‍थ प्रसन्‍न रहोगे। कवि कहते हैं, हंसना एक निश्‍छल हंसी, ताकि मानवता निस्‍संकोच राज कर सके। मैं दुविधा में हूं। मैं जब भी हंसता हूं या हंसते हुए किसी को देख लेता हूं- मुझे शर्मसार होना पड़ता है।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-2064271582740909596?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/2064271582740909596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=2064271582740909596' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2064271582740909596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/2064271582740909596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/08/blog-post_12.html' title='हंसी के ख़‍िलाफ एक गद्य'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-8446124181472298855</id><published>2007-08-11T23:11:00.000-07:00</published><updated>2007-08-12T02:55:34.924-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार ही जगह है'/><title type='text'>हम क्‍या लिखे जा रहे हैं...</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;a href="http://azdak.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रमोद सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; की लिखावट में एक खास की किस्‍म की सजावट और तरावट नज़र आती है। वे रोज़ लिखते हैं और खूब लिखते हैं। रोज़ लिखते हुए लगातार अच्‍छा लिखना एक मुश्किल काम है। आपके पास विषयों की इतनी बहुतायतता के स्रोत कहां होते हैं? वही आस-पड़ोस, छुट्टियों में दो-चार मित्रों के घर की दौड़, टीवी-सिनेमा-अख़बार के अलावा अगर आपके अतीत का सफ़र गहन पेचीदगियों से भरा हो, तो संभव है आपके पास कहने को इतनी बातें हों कि लगे इस जनम में संभव नहीं। लेकिन लिखने की मेज़ पर पूरी तरतीब से लगातार लिखना आपको वैसा ही अभिव्‍यक्‍त करे, जैसे आप हैं- ये ज़रूरी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार प्रमोद जी के लिखे हुए का तात्‍पर्य समझ में नहीं आता। वो भाषा की कारीगरी ज़्यादा नज़र आता है। चित्रकला, सिनेमा और कुश्‍ती में कारीगरी जितना काम आती है, लेखन में कुछ ऐसी बूंदा-बांदी करती है, जो सड़क और पार्क के बीचोबीच मौजूद सतरंगी फुहारें भले लगे, बारिश की शीतलता वहां नहीं होती। लेकिन प्रमोद फिर भी उसे भाषा का रियाज़ कहते हुए लिखते चलते हैं और सिर्फ ब्‍लॉगिंग के उनके सात म‍हीनों का हिसाब करें तो अपनी संपूर्ण रचनावली का पहला हिस्‍सा तो उन्‍होंने तैयार कर ही लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गयी सदी के दार्शनिक-लेखक ज्‍यां पाल सार्त्र के लिखने की रफ्तार भी कुछ ऐसी ही थी। उनके शहर के रेस्‍त्रां और बार में, जहां वे लगभग रोज़ जाते थे, उनके लिए एक कोना हमेशा रिज़र्व होता था, जिस पर बैठ कर वे लिखा करते थे। रोज़ कुछ हज़ार शब्‍दों का लिखा जाना वे एक लेखक के लिए ज़रूरी मानते थे। उनके समकालीन भी उनके लिखे के एक बड़े हिस्‍से को बोझिल और अबूझ मानते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए कई बार तात्‍पर्य समझ में नहीं आने के बावजूद किसी लेखन का एक तात्‍पर्य होता है। भाषा के रियाज़ के तर्क से अलग ठोस और कन्विंसिंग तर्क। इसलिए ले‍खक की आज़ादी है कि वह अपने हिसाब से हज़ारों पन्‍ने काला करे, लेकिन कालातीत संदर्भों में जितने पन्‍ने नागरिक अपनी आलमारी में रखना चाहेंगे, वही लेखक की पूरी रचनात्‍मक सक्रियता का सार होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी भाषा की समूची विरासत से पठनीयता का प्रतिशत निकालें, तो अपठनीय और अपठित पन्‍ने उन पर भारी पड़ेंगे। इसका साफ मतलब है कि सार्वजनिक साहित्‍य से अधिक तादाद अभ्‍यास के लेखन की होती है- और ये तादाद जितनी अधिक होती है, सार्वजनिक चिंता-अभिव्‍यक्ति-लेखन-साहित्‍य उतना ही तीखा-पैना-अर्थपूर्ण होता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;अभय‍ तिवारी&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; प्रमोद सिंह के इलाहाबादी मित्र हैं, और प्रमोद सिंह कहते हैं कि अभय अपने जीवन और लेखन में निश्‍छल है, ईमानदार हैं। अभय जी के लिखे हुए पर प्रमोद जी के निष्‍कर्ष से मुझे और कई सारे लोगों को असहमति हो सकती है, लेकिन ये सच है कि अभय कभी-कभी लिखते हैं, कई बार लगातार लिखते हैं, और कई बार लंबी सांसें, लंबा वक्‍त लेते हैं। लेकिन उनके लेखन में कोई सजावट नज़र नहीं आती है। वे अपनी बात तल्‍खी से कहते हैं, जो उन्‍हें कहना होता है- सीधे सीधे बेलाग। इसलिए उनका फुल स्‍टॉप कॉमा कहां पड़ रहा है, इससे उन्‍हें मतलब नहीं है। शब्‍दों की एकरूपता से भी उन्‍हें कोई लेना देना नहीं है। मतलब है तो बस जब जो बात कहनी है, वह कहा जाए। चाहे तैश में, चाहे अतिशय विनम्रता में, चाहे व्‍य‍ंग्‍य की टेढ़ी-तिरछी अदा में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत लिखना और बहुत कुछ लिखना चाहते हुए भी लिखने से दूर भागता रहता हूं। शायद इसलिए क्‍योंकि मैं जैसा लिखना चाहता हूं, वैसा मुझे लिखना आता नहीं और जब लिखना चाहता हूं, तब दस बहाने करके ज़‍िंदगी के झमेले मेज़ पर बैठने ही नहीं देते। अब यही मान लिया है कि शायद कभी लिख नहीं पाऊंगा क्‍योंकि अब तक का अपना लिखा मुझे नैसर्गिक कम और बनावटी ज़्यादा लगता है। हमारे सहकर्मी और लेखक &lt;a href="http://baat-pate-ki.blogspot.com/" target="_blank"&gt;&lt;strong&gt;प्रियदर्शन&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; कहते हैं कि आप जैसा स्‍वाभाविक रूप से लिख सकते हैं, वैसा ही लिखते हैं और इरादा करके आप मुक्तिबोध की तरह या किसी और लेखक की तरह नहीं लिख सकते। यानी आपके भीतर बेचैनियों का अनंत रूप-रंग होगा, लेकिन वो आपकी शख्‍सीयत के हिसाब से ही बाहर आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी सनक ये समझने में है कि हम सब जैसा लिख रहे हैं, क्‍या वो हमारी स्‍वाभाविकता का हिस्‍सा है, या हम अपने को ज़बर्दस्‍ती उंड़ेल रहे हैं? ये भी कि क्‍या हम सब वही लिख रहे हैं, जो हमें लिखना चाहिए, या वक्‍त की मांग और पूर्ति के हिसाब-किताब में हमने अपने लेखन की स्‍वाभाविकता को विराम दिया हुआ है? अगर ये दोनों बातें नहीं हैं, तो कतिपय वाह-वाहियों के अलावा हमारे लिखे से कोई स्‍तब्‍ध क्‍यों नहीं है? किसी का जीना हराम क्‍यों नहीं हुआ है? कोई सवालों के थप्‍पड़ लेकर क्‍यों नहीं आता कि आप चैन से जीने देंगे या नहीं? मुल्‍क मरता है तो मर जाने दीजिए, हमें महीने की पगार तो मिल जाती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने में हमारी मदद कीजिए।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-8446124181472298855?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/8446124181472298855/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=8446124181472298855' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8446124181472298855'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/8446124181472298855'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='हम क्‍या लिखे जा रहे हैं...'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-7893024692614350988</id><published>2007-07-18T03:27:00.000-07:00</published><updated>2007-07-18T04:55:39.758-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी कभी की मुलाक़ात'/><title type='text'>चंद्रशेखर, जिन्‍हें मैं जानता हूं...</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;मुझे नहीं मालूम, मैं &lt;a href="http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/story.aspx?id=NEWEN20070018101"&gt;&lt;strong&gt;चंद्रशेखर&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; को कितना जानता हूं। पर मुझे इतना मालूम है कि एक शख्‍स जितना आपके सामने ज़ाहिर होता है, उससे अलग वो जैसा भी हो, आपके लिए उसका कोई अस्तित्‍व नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 2002 में जब चंद्रशेखर 75 साल के हुए, उनका लिखा-बोला-कहा सब किताबों की शक्‍ल में छपना तय हुआ। संपादक मंडल में हमारे नाम की मुनादी हरिवंश जी ने कर दी थी और चंद्रशेखर से हमारी मुलाक़ात सिताब-दियारा में पहले ही करवा दी थी। दिसंबर 2001 के आख़ि‍री हफ्ते में हम और हमारी पत्‍नी इसी काम के लिए दिल्‍ली आये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईटीओ के पीछे फैले नरेंद्र निकेतन में चंद्रशेखर की पार्टी का दफ्तर था, जहां अब कोई राजनीतिक हलचल नहीं होती थी। वजह जगज़ाहिर है कि तब तक चंद्रशेखर इस मुल्‍क में कोई राजनीतिक ताक़त या केंद्र नहीं रह गये थे। सिवाय इसके कि संसद में उनके विरोधी तेवरों की विश्‍वसनीयता अब भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नरेंद्र निकेतन में चंद्रशेखर से यह दूसरी मुलाक़ात थी। पत्‍नी बुज़ुर्गों को आदर देने के आदतन उनके पांव की ओर बढ़ी। उन्‍होंने जेब में हाथ डालकर कुछ नोट निकाले और उसके हाथ में थमा दिया। मौद्रिक आशीर्वाद की परंपरा उन्‍होंने निबाही। हमने बाहर आकर सबसे पहले मुट्ठी खोली। देखा पांच सौ के कुछ नोट हैं। वहीं हमने ये भी तय किया कि इससे कुछ कपड़े ख़रीदेंगे। दिल्‍ली में पहनने के लिए कुछ ख़ास नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम में हम भोंडसी आश्रम के लिए ओमप्रकाश जी के साथ चले। वे चंद्रशेखर की पार्टी के राष्‍ट्रीय महासचिव थे और इसलिए थे, क्‍योंकि चंद्रशेखर के शुरुआती दिनों के राजनीतिक हमसफर थे। काफी शाम हो गयी थी, लेकिन आश्रम की चौहद्दी समझ में आ गयी। सुबह जल्‍दी उठ गये। पूरे आश्रम का चक्‍कर लगाते लगाते अच्‍छी खासी धूप निकल आयी। पता चला, चंद्रशेखर नाश्‍ते पर हम दोनों का इंतज़ार कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाश्‍ते के दरम्‍यान ही एक जादूगर आया। शायद जादूगर शंकर। उसने कुछ जादू दिखाये। मसलन अचानक हाथ में हरे हरे नोट उगा लिये और हवा के किसी छोर से मिठाइयों का डब्‍बा उड़ा लिया। वहां सब मिल कर इस तमाशे पर हंस रहे थे। अचानक जादूगर ने चंद्रशेखर जी से थोड़ी अलग से गुफ्तगू की गुज़ारिश की। दोनों उठ कर एक किनारे गये और कुछ ही मिनटों बाद लौट कर आ गये। जादूगर के जाने के बाद चंद्रशेखर ने कहा- पद्मश्री की सिफारिश के लिए आया था। ये भी कि इस जादूगर से उनकी पहली मुलाकात ट्रेन के बरसों पुराने किसी सफर में हुई थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;संयोग से हुई मुलाकात को बरसों बाद एक राजनीतिक सिफारिश में बदलते हुए देखना हमारे लिए अनुभव था। चंद्रशेखर जी के लिए एक सामान्‍य सी बात। उन्‍होंने थाली में रखे संदेश का टुकड़ा उठाया। हमसे भी कहा- खाइए, स्‍वादिष्‍ट है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी कुछ और मुलाक़ातें हैं, लेकिन सवाल ये है कि अंतरंग चर्चाओं का आपका संसार आपके अलावा और किनके लिए मानी रखता है ? भारतीय राजनीति में चंद्रशेखर का कद जब संयोगों के हवाले हो चुका हो कि जब भी तीसरे मोर्चे की चर्चा होती हो और प्रधानमंत्री कौन हो- तब चंदशेखर का नाम उछल-उछल कर आता रहा है। इसकी वजह यही है कि सत्ता की राजनीति के लिए जितनी गरिमा और जितनी चालबाज़‍ियां एक शख्‍सीयत में चाहिए होती है, वो चंद्रशेखर में थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर पार्टी में उनके दोस्‍त थे। ऐसा कहते हैं। ये भी कहते हैं कि इसी दोस्‍ती की वजह से वे लगातार बलिया के सांसद रहे। यानी दूसरी पार्टियां उनके ख़‍िलाफ कमज़ोर उम्‍मीदवारों को वहां से उतारती रहीं ताकि चंद्रशेखर का रास्‍ता साफ रहे। वे संसद में हिंदुत्‍ववादी राजनीति के ख़‍िलाफ बोलते रहते थे और अपनी पत्रिका यंग इंडियन में भी कुछ ऐसा ही लिखते रहते थे। लेकिन निजी रूप से ऐसी पार्टियों के नेताओं से खुलकर दोस्तियां निभाते थे। यानी एक ओर जहां वे अपनी राजनीतिक समझ के लिए सीमारेखाएं तय करते थे, वहीं राजनीतिक संबंध के लिए कोई सीमारेखा नहीं थी। इससे ये भी साफ होता है कि समझदारी की उनकी मुखर अभिव्‍यक्ति भी उनको ये भरोसा नहीं दे पाती थी कि लोग उनकी शर्तों पर उनके साथ रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़‍िरी दिनों में वे राजनीतिक रूप से अकेले थे। हालांकि लोग उनके पास आते-जाते रहते थे। ये आना-जाना पुरानी रवायतों का सिलसिला था, और इसके सबसे बड़े हिमायती चंद्रशेखर थे। यह हिमायत तब सबसे अधिक दिखती थी, जब दूसरी पार्टियों में शामिल उनके दोस्‍त घपलों-घोटालों जैसी मुश्किलों में पड़ते थे। जॉर्ज फर्नांडीस जब तहलका कांड में फंसे, तो सबसे पहले चंद्रशेखर ने जाकर ढाढ़स बंधाया था। जब प्रधानमंत्री थे, तब किसी जलसे में धनबाद के कोल माफिया सूरजदेव सिंह के घर गये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नामवर सिंह ऐसी राजनीतिक मित्रताओं को थोड़ा धीरज धर के समझने की गुज़ारिश करते हैं। चंद्रशेखर की मशहूर जेल डायरी की प्रस्‍तावना (आधुनिक मित्रलाभ) में नामवर सिंह लिखते हैं-&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;अभी कुछ समय पहले जॉक देरिदा की मित्रता की राजनीति (पॉलिटिक्‍स ऑफ फ्रेंडशिप – 1997) नामक पुस्‍तक मेरे हाथ लगी और पढ़ने पर लगा कि मित्रता को एक सामंती मूल्‍य मान कर खार‍िज़ करना जल्‍दबाज़ी होगी।&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;लेकिन मेरा सिर्फ एक सवाल है कि अगर आप मुल्‍क के नियंता की कुर्सी पर बैठे हैं, तो आपको जनहित में कई तरह की निजताओं को कुर्बान करना होता है। परिवार, जाति और निजी मित्रता के दायरे में आने वाले नागरिकों को व्‍यक्तिगत लाभ पहुंचने पर आम नागरिक सवाल तो उठाएगा ही। ऐसे ही सवाल चंद्रशेखर को जीवन भर परेशान करते रहे। इसके बावजूद उन्‍होंने इन सबसे कभी ऊपर उठने की कोशिश नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्‍तक संपादन के दरम्‍यान तस्‍वीरों के चयन के वक्‍त उनके बेटे-बहू मुस्‍तैद थे। साउथ एवेन्‍यू वाले सरकारी मकान पर भाइयों का कब्‍ज़ा था। हम जहां टिके थे, वो प्रीत विहार के सामने न्‍यू राजधानी एनक्‍लेव का एक बड़ा सा अपार्टमेंट था। वहां अपोलो की सहायता से चंद्रशेखर के भतीजे क्‍लीनिक चला रहे थे। वह सब घर की संपत्ति थी और है। अभी हम देखते हैं कि कई कद्दावर राजनेता जब चुनाव के लिए परचा भरते वक्‍त अपनी जायदाद का एलान करते हैं, तो अपने नाम की पासबुक में गिनने लायक पैसा निकलता है- लेकिन रिश्‍तेदारों के पास पर्याप्‍त मात्रा में संपत्ति निकलती है। साफ है कि राजनीतिक सत्ता के लाभ से ये संपत्ति बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रशेखर इसके अपवाद नहीं थे। आम इंसान थे। विद्वान थे। राजनीतिक समझ के मामले में अपने समकालीनों से ज्‍यादा तीक्ष्‍ण थे, लेकिन इसका इस्‍तेमाल कभी उन्‍होंने देश की राजनीति को दिशा देने के लिए नहीं किया। वे कर सकते थे। करते, तो शायद उनका कद मुल्‍क के मानस में एक ख़ास जगह पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किताबों के लिए एक बैठक हुई थी। साउथ एवेन्‍यू के उनके मकान में। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्‍हा राव और पूर्व राष्‍ट्रपति आर वेंकट रमण आये थे। इनके अलावा पत्रकार प्रभाष जोशी, रामबहादुर राय, सुरेश शर्मा और हरिवंश थे। नामवर सिंह भी आये थे। और भी बहुतेरे चंद्रशेखर के प्रिय, राजनीति और कारोबार की अपनी अपनी दुनिया में महत्‍वपूर्ण जगहों पर थे। योजना क्‍या बननी थी, सबने चंद्रशेखर के महत्‍व को रेखांकित किया और किताबों की शृंखला कैसे चंद्रशेखर की महानता को साबित कर सके, इस पर ज़्यादा से ज़्यादा ज़ोर दिया। चंद्रशेखर इस पूरी बैठक में खामोश ही रहे। एकाध वाक्‍य बोला होगा, जो मेरी स्‍मृतियों में अब सिर्फ चंद फुसफुसाहटों के रूप में ही बचे हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चंद्रशेखर की दुनिया में उनसे असहमत लोगों के लिए जगह नहीं थी। यही एक वजह थी, जिसकी वजह से वे अकेले थे। आख़‍िरी समय में भी उनका अकेलापन उनके साथ था। जिस दिन अंत्‍येष्टि थी, हमारे संवाददाता रेलवे स्‍टेशन पर सुबह-सुबह मौजूद थे। बलिया और बनारस से आने वाली गाड़‍ियों से लद कर उनकी अंत्‍येष्टि में शामिल होने के लिए लोगों के आने की सूचना थी। न्‍यूज़ बुलेटिन के रनडाउन में उस दृश्‍य का इंतज़ार हो रहा था। गाड़‍ियां आयीं, लेकिन आम सवारियों से अलग कोई भीड़ नहीं थी। हमें इंतज़ार छोड़ कर आगे की ख़बर पर जाना पड़ा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...और इस तरह चंद्रशेखर की ख़त्‍म हो चुकी कहानी पर अफ़सोस की एक सफ़ेद चादर चढ़ा देनी पड़ी।&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-7893024692614350988?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/7893024692614350988/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=7893024692614350988' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7893024692614350988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/7893024692614350988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/07/blog-post_18.html' title='चंद्रशेखर, जिन्‍हें मैं जानता हूं...'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-1513377280083186116</id><published>2007-07-12T20:46:00.000-07:00</published><updated>2007-07-12T21:01:45.143-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता की कोशिश'/><title type='text'>युवा कवि सम्‍मान समारोह</title><content type='html'>वे कुछ लोग जो इस बात से गदगद थे&lt;br /&gt;कि उनकी भाषा में अब चि‍ड़ि‍यों का चहचहाना बंद हो गया है&lt;br /&gt;और नयी राजनीतिक बयार&lt;br /&gt;और बाज़ार का विध्‍वंस दिखने लगा है&lt;br /&gt;वे कुछ लोग जो गिनती में पांच थे मंच पर बैठे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक युवा कवि पुरस्‍कृत हो रहा था&lt;br /&gt;ये वो दौर था जब पुरस्‍कृत होने के लिए&lt;br /&gt;अधेड़ और उम्रदराज़ होने की ज़रूरत नहीं होती थी&lt;br /&gt;शब्‍द को साधने के शुरुआती दिनों में ही&lt;br /&gt;साधकों की जमात में जगह मिल जाती थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शक दीर्घा में भी थे पचास-साठ&lt;br /&gt;अपनी भाषा की नयी आहट सुनते हुए उनमें से कइयों को&lt;br /&gt;इस बात का एहसास था&lt;br /&gt;कि वे सब एक ऐतिहासिक घड़ी के साक्षी हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी घड़‍ियां आमतौर पर दिल्‍ली में ही आती-जाती हैं&lt;br /&gt;हमारे दरभंगा में तो तब भी ये नहीं आयी&lt;br /&gt;जब बाबा नागार्जुन&lt;br /&gt;पंडासराय के सीलन भरे दो कमरोंवाले किराये के घर में&lt;br /&gt;साल में दो-तीन बार आकर महीनों-महीनों ठहरते थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐतिहासिक सभा में सब बोले&lt;br /&gt;सबने कहा- &lt;em&gt;हिंदी की जय&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;कइयों की आंखें भींगी कुछ के हाथों ने उंगलियां चटकायीं&lt;br /&gt;सबसे आख़‍िर में अध्‍यक्ष की बारी आयी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम किताबें ज़्यादा शोहरत वाले अध्‍यक्ष को&lt;br /&gt;काफी तारीफ़ों के साथ बुलाया गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परसाई कहते थे-&lt;br /&gt;&lt;em&gt;ज़‍िंदगी में दो मौक़ों पर आदमी सबसे अधिक कातर होता है&lt;br /&gt;पहली बार प्रणय निवेदन करते वक्‍त&lt;br /&gt;और दूसरी बार अगर आदमी शरीफ़ हुआ&lt;br /&gt;तो अपनी तारीफ सुनते वक्‍़त&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक उद्धरण था, जिसे सुना कर&lt;br /&gt;शराफ़त दिखाते हुए अध्‍यक्ष ने अपनी तारीफ़ किनारे रखने की कोशिश की&lt;br /&gt;और युवा कविता पर न छोटा न बड़ा लेकिन असरदार बयान दिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर उमस से भरी दिल्‍ली को बारिश भिंगो रही थी&lt;br /&gt;मंडी हाउस में इंतज़ार की चाय ठंडी हो रही थी&lt;br /&gt;मुल्‍क इधर से उधर हो रहा था&lt;br /&gt;हम गदगद हो रहे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गो कि गदगद वे लोग ही नहीं हो र‍हे थे&lt;br /&gt;जो अपनी भाषा के नये-तीखे वाक़ये को मंच से बयान कर रहे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसवीं सदी के पहले दशक के सातवें साल में&lt;br /&gt;जो इतिहास इस सम्‍मान समारोह में बन रहा था&lt;br /&gt;सुना है कि कुछ ऐसा ही इतिहास पिछले साल भी बना था&lt;br /&gt;और उसके पिछले साल भी&lt;br /&gt;और पिछले के पिछले साल भी&lt;br /&gt;इस तरह भाषा में अनोखे और अनोखे भाष्‍य का ये ऐतिहासिक सिलसिला&lt;br /&gt;पिछली सदी के सन अस्‍सी के दशक से जारी है&lt;br /&gt;जब पहली बार किसी युवा कवि को पुरस्‍कृत किया गया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पहुंच कर इतिहास के इस कर्ज़ को&lt;br /&gt;हमने पड़ोस में जाकर उतारना चाहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;- क्‍या आप अरुण कमल को जानते हैं?&lt;br /&gt;- आप भी कमाल करते हैं भाई&lt;br /&gt;आप तो जानते ही हैं&lt;br /&gt;पार्टी-पॉलटिक्‍स से हमको मतलब नईं&lt;br /&gt;सिन्‍हा साहब से पूछिए&lt;br /&gt;उन्‍हें ज़रूर पता होगा&lt;br /&gt;कोई काम होगा, वे थोड़ा ले-देकर ज्‍यादा करवा देंगे&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई सिन्‍हा साहब किसी अरुण कमल को नहीं जानते!&lt;br /&gt;कोई खन्‍ना साहब किसी हिंदी को नहीं जानते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जानते हैं इन दिनों इस मुल्‍क में एक दर्जन हड़तालें चल रही हैं&lt;br /&gt;राष्‍ट्रपति चुनाव होने वाला है&lt;br /&gt;यूपी में मायावती सरकार अच्‍छा काम कर रही है&lt;br /&gt;और दो हज़ार दस तक दिल्‍ली की सभी रूटों में&lt;br /&gt;मेट्रो रेल दौड़ने लगेगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्‍मान समारोह धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ ख़त्‍म हुआ&lt;br /&gt;और हमारी भाषा का जादू भी सभागार की सीढ़‍ियों से&lt;br /&gt;ससरते हुए दीन दयाल उपाध्‍याय मार्ग की सड़क पर जमे&lt;br /&gt;बरसाती पानी में घुल गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं किनारे खड़े होकर एक युवा कवि&lt;br /&gt;इस हॉल को हसरत से देख रहा था!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-1513377280083186116?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/1513377280083186116/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=1513377280083186116' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1513377280083186116'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/1513377280083186116'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='युवा कवि सम्‍मान समारोह'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-3863058223213336618</id><published>2007-06-04T22:51:00.000-07:00</published><updated>2007-06-04T22:53:31.993-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्‍यास की तर्ज पर'/><title type='text'>जब हम पहली बार शहर आये</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;शहर था शहर नहीं था : 5&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हम सब&lt;/strong&gt; अस्‍सी के शुरुआती दशक में अपने गांव से शहर आये थे। वैसे गांव शहर से दूर नहीं है। कलक्‍टेरिएट से पांव-पैदल गांव पहुंचने में घंटा भर भी नहीं लगता है। पहले, बीच में एक बड़ा बरगद था- जिस पर धूपदार दिनों में लोग सुस्‍ताया करते थे। उन दिनों बीच में जंगल होने की वजह से दो दुनिया लगती थी, लेकिन आज तो मकानों की सघन कतार गांव तक खड़ी है। शहर और गांव में फर्क ही नहीं लगता। बाबूजी शहर आये, क्‍योंकि वे बच्‍चों को एक तहज़ीब देना चाहते थे। गांव में ये संभव नहीं था। नवयुवकों का ताड़ीखाने में बैठने का सिलसिला बढ़ गया था। गुंडागर्दी भी बढ़ रही थी। हमारे गांव में आकर बस गये फुफा के एक लड़के को बड़े बरगद के पास कुछ लोगों ने पकड़ लिया और चाकू से चौदह बार गोदा और मरा हुआ समझ कर झाड़ी में फेंक दिया। सुबह जब हल्‍ला हुआ, तो हमें समझ में आया कि कुछ कांड हो गया है। लेकिन अपने फुफेरे भाई को हमने तभी देखा, जब वे अस्‍पताल से लौटे। आंगन-आंगन घूम कर सीना और पीठ दिखाते थे। जहां-जहां चाकू लगा था। बात क्‍या हुई थी दरअसल, ये बताते हुए हकलाने लगते थे- लेकिन बच गये, यह कहते हुए उनके चेहरे पर मायूसी नहीं, बल्कि बहादुरी चमक उठती थी। बाबूजी ने यही सब देख-देख कर शहर का रुख किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और भी कारण थे। बहने शहर के एक माध्‍यमिक विद्यालय में पढ़ती थी। रोज़ पैदल जाती थीं। बड़े बरगद से थोड़ा आगे एक छोटी सी कम गहरी नहर पार करके रास्‍ता थोड़ा पड़ता था। जब आंगन में दस‍बजिया फूल खिल उठता था, तो गांव से दर्जनों लड़के लड़कियां स्‍कूल की तरफ भागते थे। बड़े बरगद से आगे नहर पार करके जाते थे। लेकिन बरसात के दिनों में खासी तक़लीफ होती थी। अक्‍सर बहनें मुझे गोद में लेकर स्‍कूल जाती थीं। घर में ये कह कर कि आज मुन्‍ना मेरे साथ रहेगा। स्‍कूल में ज्‍यादातर पढ़ानेवालियां थीं और इस एक काम के अलावा नयी लड़कियों से कढ़ाई-बिनाई सीखने में उनकी दिलचस्‍पी अधिक थी। इसलिए बहनें हमें ले जातीं, तो वे भी हमें पुचकारती थीं। कभी-कभी तो हवामिठाई भी ख़रीद कर देती थीं। ऐसे ही एक दिन बरसात हो रही थी। टिपिर-टिपिर। वो भी रास्‍ते में शुरु हुई, जब बहनें स्‍कूल और गांव के बीच में थीं। मैं बीच वाली बहन की गोद में था। वो मुझे लेकर नहर में उतरी। उसके बायें पैर के नीचे की मिट्टी पांव पड़ते ही भसक गयी। ठेहुना मुड़ गया और गर्दन तक पानी में जा पहुंची। लेकिन मैं हाथ से नहीं छूटा। दूसरे तमाम लड़के-लड़कियां अवाक थे। मेरी बहन रोते हुए मुझे दोनों हाथों से ऊपर उठाये हुए थी। किसी तरह टो-टा कर किनारे तक पहुंची। कीचड़ और पानी में कपड़े लिथड़े हुए थे। घर लौट आये। बहन मेरी लगातार रो रही थी। रात दस बजे बाबूजी गांव लौटे, तब तक। एक वो वजह भी थी, हमारे शहर में आने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बात ये थी कि बाबूजी संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय की लाइब्रेरी में बैठ कर पुरानी पांडुलिपियों को सफेद काग़ज़ पर नीली स्‍याही से उतारने का काम करते थे। उनकी लिखावट मोतियों जैसी होती थी। कुलपति उसी लिखावट में छापेखाने भेजना चाहते थे और बाबूजी को साठ रुपये महीने की तनख्‍वाह मिल रही थी। कुछ ट्यूशन भी कर लेते थे। फिर भी कुल डेढ़ सौ रुपये से ज्‍यादा की कमाई नहीं हो पाती थी। गांव में बाबूजी के भाइयों और बहनों को मिला कर परिवार बड़ा हो जाता था और ये पैसे कब ख़त्‍म हो जाते थे, पता भी नहीं चलता था। महीने के आखिरी दस दिन जैसे-तैसे कटते थे। इधर-उधर से मांग कर, जिन्‍हें नहीं लौटाते-लौटाते बड़ा कर्ज़ बाबूजी को डराने लगा था। इसीलिए भी हम शहर आ गये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी बाबूजी शहर को चाहते थे। आप वहां रहना ज्‍यादा पसंद करते हैं, जहां लोगों की दिलचस्‍पी आपमें हो और आपकी दिलचस्‍पी उन लोगों में। वे ज्‍यादातर अमीर घरों के बच्‍चों को पढ़ाते थे। उन्‍हें विद्वान समझा जाता था। वे विद्वान थे भी, क्‍योंकि जब भी हमने उन्‍हें अपने शहर की सड़कों पर देखा- लोग उन्‍हें प्रणाम करते थे। कोई हेठी नहीं दिखाता था। ज़्यादातर रिज़र्व रहते थे। पर्व-त्‍योहारों में एक अजीब किस्‍म की तटस्‍थता के साथ वे घर में बंद रहते थे। उनके दोस्‍तों का संसार भी बड़ा नहीं था। जो दो-तीन लोग थे, वे बड़े कायदे से बात करने वाले थे। सरकारी नौकरियों में थे और बाबूजी से जब भी मिलने आते थे, शरीफ की तरह पेश आते थे। लगता नहीं था कि वे दोस्‍त हैं। हमारे वक्‍त में तो दोस्‍तों की बातचीत उलाहने और गाली-गलौज से शुरू होती है। यही सब देख कर लगता था कि शहरी आचरण और सभ्‍यता बाबूजी में भरी हुई होने की वजह से वे शहर आये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबूजी रमानंद बाबू को जानते थे। किसी की दुआ का सीधा जवाब न देने वाले रमानंद बाबू को राह चलते जब भी बाबूजी प्रणाम करते थे, वे न केवल मन से उसे स्‍वीकार करते थे, बाबूजी और उनके बच्‍चों यानी कि हमारा हालचाल भी पूछते थे। रमानंद बाबू के व्‍यक्तित्‍व के खिंचाव में पूरी तरह जकड़े हुए बाबूजी अक्‍सर हमें बताते थे- दोनों एक ही स्‍कूल में पढ़े। रमानंद बाबू उनसे तीन कक्षा वरिष्‍ठ थे। गज़ब के मेधावी थे। उनके सामने शिक्षकों की मेधा कहीं नहीं ठहरती थी। उन दिनों की बात और अब रमानंद बाबू का क़द- दोनों में ज्‍यादा फर्क नहीं है। तब भी रमानंद बाबू इज़्ज़त से देखे-सुने, बोले-बताये जाते थे और आज भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये आकर्षण आखिरी तक बना रहा। बाबूजी और रमानंद बाबू, दोनों ही आज नहीं हैं। बाबूजी होते, तो शायद मैं रमानंद बाबू की ज़‍िन्‍दगी के विवरण इतना खुल कर नहीं जुटा पाता। यक़ीनन वे बुरा मान जाते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-3863058223213336618?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/3863058223213336618/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=3863058223213336618' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3863058223213336618'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/3863058223213336618'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/06/blog-post_04.html' title='जब हम पहली बार शहर आये'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4553891877729880838</id><published>2007-06-04T03:38:00.000-07:00</published><updated>2007-06-04T04:31:00.708-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्‍यास की तर्ज पर'/><title type='text'>एक थे रमानंद बाबू</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;शहर था शहर नहीं था : 4&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रमानंद बाबू&lt;/strong&gt; हमारे ही शहर के थे। कड़क मिज़ाज टीचर। विद्वान थे। अंग्रेज़ी ऐसे बोलते थे- जैसे टेलीविज़न और रेडियो पर समाचार वाचक। कुल मिलाकर एक ऐसी शख्‍सीयत, जो आमतौर पर अब नहीं पायी जाती है। उनसे पहले एक झींगुर कुंवर थे, जिनका नाम उनके होने से ज्‍यादा मानी रखता था। अब भी लोग कहते हैं- झींगुर बाबू के वक्‍त में महाराजा लक्ष्‍मेश्‍वर सिंह एकेडमी का फाटक दस बज कर तीस मिनट पर बंद हो जाता था। फिर मजाल था कि कोई लड़का या टीचयर स्‍कूल में घुस पाये! ये सख्‍ती उनके आख़‍िरी दिनों तक बनी रही। तब भी, जब वे लकवे का शिकार होकर दो कहारों के सहारे पालकी में स्‍कूल आते थे। तभी पता चला कि वज़न शख्‍सीयत से भले तय होता हो, लेकिन एक वक्‍त के बाद वज़न शख्‍सीयत से कहीं ज़्यादा नाम का हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झींगुर कुंवर नास्तिक आदमी थे, लेकिन रमानंद बाबू तो पूरे आस्तिक थे। पूरे माथे पर चंदन का टीका सोते-जागते पुता रहता था। शहर की सड़कों पर या स्‍कूल के कैंपस में, तेल से चमकते केस, सर के बीच मोटी सी चुटिया में बंधे रहते थे। वे मंत्रपाठ करते थे, मगर पसीजते ज़रा भी नहीं थे। किसी लड़के की कमीज़ का ऊपरी बटन खुला दिख जाता, तो हाथ में हमेशा रहने वाली मोटी बेंत इस तरह बरसानी शुरू करते, जैसे हमारे ही शहर का रामदीन तांगावाला सवारी लेकर चलते हुए अपने घोड़े पर चाबुक चलाता था। बाबूजी अब भी कहते हैं, वैसा मास्‍टर हो, तो लड़के की ज़‍िन्‍दगी सुधर जाती। अब तो हिंदी सिनेमा के असर वाले लड़के ज़्यादा हैं। सिगरेट भी ऐन सामने पीते हैं कि धुआं मुट्ठी में आ जाता है। इधर ही एक तमाकू वाला नन्‍हा हाथ, किशोर के स्‍कूल में किसी मास्‍टर ने पकड़ लिया- फिर तो मास्‍टर के न बाल बचे, न कपड़ा। रमानंद बाबू के ज़माने में लड़का ज़‍िन्‍दगी भर के लिए रोता। ऐसे कई लड़के आज अधेड़ होकर लहेरियासराय कचहरी में काग़ज़ इधर-उधर करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किशोर हमारे एक दूर के रिश्‍तेदार का बेटा है। मैडोना कॉन्‍वेंट में पढ़ता है। उसके दादा हमारे फुफा लगते थे। खूब बुढ़ापे में मरे। जब तक जीये, पूरे घर को अनुशासन में बांध कर रखा। किशोर जब सात साल का था, एक दिन उसने घर आये मेहमान को एक पूरे गाने पर डांस करके दिखाया। यह बात मर्यादा के उलट थी। खानदान में आज तक ऐसा नहीं हुआ था। नाचना-गाना छोटे आवारा लोगों का काम है। तब तो कुछ नहीं हुआ। लेकिन जब घर खाली हुआ, फुफाजी ने अपने बेटे यानी किशोर के पिता से कह कर उसे एक घंटे तक उल्‍टा लटकवा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज फुफाजी नहीं हैं। किशोर दसवीं में पढ़ता है। चौराहे पर सिगरेट के साथ थम्‍सअप पीता है। मैटनी शो अकेले देखता है। कभी-कभार ऑर्केस्‍टा में डांस करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन किशोर रमानंद बाबू को नहीं जानता है- झींगुर कुंवर को वो क्‍या जानेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह हमारे शहर में बहुत सारे लोग रमानंद बाबू को नहीं जानते। शहर, जिसमें हज़ारों लोग बसते हैं, वहां लाखों गुज़र चुके लोगों का कोई इतिहास नहीं होता। मुझे मालूम नहीं, मेरे परदादा का नाम क्‍या था। मेरी ज़‍िन्‍दगी में उनके नाम के लिए कोई जगह नहीं है। बहन की शादी के किसी अनुष्‍ठान में पंजीकार ने मुझसे मेरे परदादा का नाम पूछा था। मैंने बाबूजी से पूछ कर बताया- फिर ऐसे भूल गया- जैसे बचपन की किताबों के कई पाठ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इस तरह हमारे शहर में कोई रमानंद बाबू थे भी, तो उनका कोई किस्‍सा लोग सच मान कर सुनें, यह ज़रूरी नहीं है। इस तरह हमारे शहर में कोई रमानंद बाबू थे भी, तो आप ये मत मानिए कि कोई रमानंद बाबू थे ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन थे, और उनमें मेरी दिलचस्‍पी इसलिए भी है, क्‍योंकि आदमी और मास्‍ट की वैसी नस्‍ल मैंने फिर कभी नहीं देखी। इसलिए इस बार शहर गया, तो उनके घर के आसपास दसियों बार मंडराया। पक्‍के का दोमंज़‍िला घर। ऊंची चाहरदीवारी। दोपहर के वक्‍त बरामदे में सूप का चावल ऊपर नीचे उठाती गिरातीं दो-चार औरतें। शाम में सफेद कुर्ता लादे एक भीमकाय आदमी चार-पांच लोगों के साथ देश-समाज की राजनीति बतियाता हुआ। रमानंद बाबू का एकमात्र दामाद, उनकी एकमात्र बेटी का पति।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रमानंद बाबू अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी कहानी भी अब हमारे शहर की दुनिया में नहीं है। शहर, जहां अब भी बिजली पूरे पूरे दिन तक कटती है। लेकिन मेरी अपनी दुनिया में- कहानियों के लिए पूरी जगह होने के चलते- यहां रमानंद बाबू की कहानी में अब भी पूरी दिलचस्‍पी बची हुई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4361803836401417947-4553891877729880838?l=dilli-darbhanga.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/feeds/4553891877729880838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4361803836401417947&amp;postID=4553891877729880838' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4553891877729880838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4361803836401417947/posts/default/4553891877729880838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/06/blog-post.html' title='एक थे रमानंद बाबू'/><author><name>avinash</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4361803836401417947.post-4174338728033777748</id><published>2007-05-29T03:51:00.000-07:00</published><updated>2007-05-29T08:12:23.557-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उपन्‍यास की तर्ज पर'/><title type='text'>वो एक अलग ही घर था</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;शहर था शहर नहीं था : 3&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक दोस्त‍&lt;/strong&gt; भी था। जैसा कि दोस्‍तों के नाम अपने शहर में होते थे- चिंटू, पिंटू, सोनू, मोनू- उसका नाम चिंटू था। पिता ठेकेदार थे। मोटे थे और अक्‍सर हम उन्‍हें चुप ही देखते थे। मां की एक तस्‍वीर उसके घर में लगी रहती थी, जिसकी आंखों पर 'गूगल्‍स' चढ़ा था। ये तब बड़ी बात थी। कोई लड़का 'गूगल्‍स' पहने तो उसका आवारा होना मान लिया जाता था। कोई लड़की 'गूगल्‍स' पहनेगी, ऐसी कल्‍पना तो हम कर भी नहीं सकते थे। लेकिन चिंटू की मां ने अपने कुंवारे दिनों में आंख पर खूब 'गूगल्‍स' चढ़ाये। ये चित्र उन्‍हीं में से किसी एक दिन का था। हालांकि इस चित्र से उनका चरित्र चित्रण नहीं किया जा सकता। आखिर वो दोस्‍त की मां थी। दोस्‍त की एक बहन भी थी, जिनकी उम्र बढ़ रही थी। चेहरे पर दाने निकल रहे थे... और अक्‍सर वो घर की अंधेरी सीढ़‍ियों से धूपदार वीरान छत पर जाती और आती दिखती थीं। सहेलियों का उसका संसार उतना ही था, जितना टोले में वे हमारी बहनों के साथ दिखती थीं। कभी नये बने मंदिर तक। शाम के वक्‍त। जब लड़कों का झुंड मंदिर के आजू-बाजू मंडराता था। बाद में उनकी दुनिया एक कमरे में सिमट
