Sunday, May 22, 2016

बुलाकी साव की दसवीं कविता

रोमांच और दहशत से भरी एक घटना ने बरसों मेरा पीछा नहीं छोड़ा था। आज समझ में आता है कि वह कोई घटना नहीं, एक कहानी भर थी, जो हमारे बचपन में पैदा हुई थी। कई सारी कहानियां एक उम्र तक सच जैसी लगती हैं। गांव में तब एक भी घर में सेप्टिक लैट्रिन नहीं था। लगभग घरों में तीन तरफ से टाट का घेरा और सामने से घरेलू कपड़े के पर्दे वाला दुर्गंधित शौचालय होता था। अंदर गहरा गड्ढा खोदा जाता था, जिसमें पाखाना भरा होता था। उसमें चमकदार कीड़े रेंगते रहते थे। अब शायद देखते ही उल्‍टी आ जाए, लेकिन बचपन में उन कीड़ों को देखना आम बात थी। तो ज़्यादातर लोग बागमती नदी के किनारे दिशा-मैदान के लिए जाते थे। औरतें उजाला होने से पहले जाती थीं। मुंह-अंधेरे। एक बार दो बजे रात में ढेर सारी आवाज़ सुन कर मेरी नींद खुली। उस वक्‍त मेरी उम्र पांच साल के अासपास थी। यानी '80-'81 का साल रहा होगा। मैंने देखा कि मेरी पांच में से सबसे छोटी बुआ आंगन में बेहोश पड़ी है। घर की बाकी औरतें और मर्द उसके आसपास जमा हैं। मैं जाकर मां की गोद में छुप गया। वह मड़बा की सीढ़ि‍यों पर बैठ कर बीड़ी पी रही थी। मुझे नींद आ गयी। सुबह सब कुछ सामान्‍य था। सब अपने अपने काम में लगे थे, जैसे रात में कुछ हुआ ही न हो। कुछ सालों के बाद बुलाकी साव से जब मैंने उस रात की बात बतायी, तो उसने कहा कि उसे पता है उस रात क्‍या हुआ था। और तभी मुझे उस घटना उर्फ कहानी का पता चला।

चांदनी रात थी और आधी रात को भोर हुआ समझ कर बुआ नदी की तरफ निकल पड़ी। जैसे ही बांध पर पहुंची, सामने आम के बगीचे में उसने देखा कि गांव के उन लोगों का भोज चल रहा है, जो मर चुके थे। वहीं शमशान है, जहां हमारे पूर्वजों का सारा (क़ब्र) है। सिर्फ 1999 में मरी मेरी मां को हमने अपने आम के बगीचे में जलाया था, जो बांध के इस पार है। तो बुआ ने देखा कि दर्जनों लोग हंसी ठट्ठा करते हुए पंगत में बैठे हैं। उनके सामने केले के पत्ते रखे हैं और उन पर तरह तरह की मिठाइयां रखी हुई हैं। तमाम मिठाइयों में महुआ की मह-मह करती हुई खुशबू आ रही है। बुआ डर से काठ हो गयी। वह सखुए के एक पेड़ के पीछे छिपी हुई थी। तभी किसी ने कहा कि मानुस की गंध आ रही है। बुआ ने सुना और पूरी ताकत लगा कर दौड़ी। रास्‍ते में कई बार गिरी और उठ कर फिर दौड़ी। आंगन तक पहुंचते पहुंचते उसके कपड़े फट गये और कई जगह पर छिल जाने से खून भी बहने लगा। आंगन में आते ही चीख़ कर बेहोश हो गयी।

बुलाकी साव ने बताया कि सुबह मेरे जागने से पहले लोग वहां गये थे, जहां बुआ ने बताया था कि उसने क्‍या क्‍या देखा। लेकिन सुबह वहां रात्रिभोज की कोई निशानी नहीं थी। सिर्फ मल और मूत्र की दुर्गंध फैली थी। हां, उस दुर्गंध में महुआ की खुशबू अब भी मिली थी। आम के उस बगीचे में महुआ का एक पेड़ भी था। यह सब सुनते हुए मेरे चेहरे पर डर की झुर्रियां उग आयी, लेकिन बुलाकी ने मेेरे गाल अपने हाथ में लिये और मेरे माथे को चूम लिया। झुर्रियां कुछ सिकुड़ ज़रूरी गयीं, पर पूरी तरह ख़त्‍म नहीं हुई। तब बुलाकी साव ने मुझे एक कविता सुनायी, जिससे मेरा चेहरा सपाट, सीधा और मुलायम हो पाया। इतने बरसों बाद भी कहानी की चादर में लिपटी इस पूरी घटना को भूल नहीं पाया हूं। न ही बुलाकी साव की ये कविता भूल पाया, जिसने डर के गहरे गड्ढे से मुझे सुरक्षित निकाल लिया था। कविता में छंद का अभाव था, लेकिन राग में कोई कमी नहीं थी।

तुम हो

और कोई नहीं है

बरसों से आंखें ये सोयी नहीं हैंं

दुख के राग दो दिन की बारिश ही थी

दिल में थी चुभन दिल की साजिश ही थी

वह जो आकर गया आग भड़का गया

कुछ नहीं कुछ नहीं भ्रम की माचिस ही थी

आस थोड़ी सी भी हमने खोयी नहीं है

तुम हो

और कोई नहीं है

बरसों से आंखें ये सोयी नहीं हैंं

हम चले हैं पहुंच जाएंगे एक दिन

तुम जहां हो तुम्‍हें पाएंगे एक दिन

तुमको देखेंगे और खूब रोएंगे हम

गीत खुशियों के बस गाएंगे एक दिन

हसरतें आज तक हमने धोयी नहीं हैंं

तुम हो

और कोई नहीं है

बरसों से आंखें ये सोयी नहीं हैंं

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बुलाकी साव की नौवीं कविता

खाजासराय (लहेरियासराय, दरभंगा) में एक मिडिल स्‍कूल है, जहां मेरी बहन पढ़ती थी। मेरे गांव से उस स्‍कूल की दूरी लगभग दो किलोमीटर है। गांव से बहन अपनी सहेलियों के साथ स्‍कूल जाती थी। बरसात का महीना था। बागमती अपने उफान पर थी। बहन स्‍कूल के लिए निकली, तो मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उस वक्‍त तक मैं स्‍कूल नहीं जाता था। गांव में ही कुइरा गुरुजी से पहाड़ा सीखता था। मैंने ज़ि‍द पकड़ ली कि बहन के साथ मुझे भी स्‍कूल जाना है। मेरा रोना देख कर बहन पसीज गयी और मुझे अपने साथ ले गयी। बीच में लवटोलिया (नवटोलिया) के पास एक नाला बहता था, जो आम तौर पर सूखा ही रहता। लेकिन बरसात थी तो नाले में पानी था। उसे टपना पड़ता था। बहन ने मुझे गोद में लिया और सहेलियों के साथ पानी में उतर गयी। मिट्टी गीली थी और पांव फिसल रहे थे। बहन की सहेलियां तो टप गयीं, लेकिन बहन एक जगह गिर गयी। उसकी सलवार और कमीज़ पानी और मिट्टी से भीग गयी। उसने मुझे बचा तो लिया, पर मैं भीतर से पूरी तरह डर गया था। उन दिनों बुलाकी साव की झोंपड़ी वहीं नाले के उस पार थी। झोंपड़ी के बाहर एक चापाकल लगा था। बहन ने वहीं अपने कपड़े साफ किये। स्‍कूल जाने का मेरा सारा उत्‍साह मर गया और मैं फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। मुझे स्‍कूल नहीं जाना था। बुलाकी साव ने ही मुझे हमारे आंगन तक पहुंचाने का जिम्‍मा लिया। बहन और उनकी सहेलियां स्‍कूल चली गयीं। बुलाकी साव ने मुझे कंधे पर बिठाया, नाला पार किया और हमारे आंगन की ओर चल पड़ा। पूरे रास्‍ते मैं उसके कंधे पर बैठा रहा। हल्‍की हल्‍की बारिश हो रही थी और वह रस्‍ता भर एक कविता गुनगुना रहा था। चूंकि वह बच्‍चों के लिए कविता नहीं सोच पाता था, उसने लोकधुन की राह पकड़ी। मुझे उस कविता की गुनगुनाहट अब भी याद है।

बोलो एक दो तीन

मेरा सैयां नमकीन

चले चार कोस रोज धरे हीरो का पोज

जैसे एस्‍नो-पाउडर वैसे चम चम चम ओज

धनुकटोली का पंच खाये बाभन का भोज

छिपा ननदों के बीच उसे खोज खोज खोज

हाय हाय रंंगीन

मेरा सैयां नमकीन

मज़ेदार मारवाड़ी का नौकर झक्‍कास

पीये कैंपाकोला लगे उसको जो प्‍यास

भारी बज्‍जर गिरे करे मेम संग रास

धोखेबाज बीए पास चालबाज बीए पास

बड़ा बतिया महीन

मेरा सैयां नमकीन

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बुलाकी साव की आठवीं कविता

जिस साल पूनम सिनेमा में '1942 ए लव स्‍टोरी' लगी थी, उसी साल बुलाकी साव वहां साइकिल स्‍टैंड पर पार्ट टाइम जॉब करने लगा था। इस तरह का कोई भी काम वह तीन महीने से ज्‍यादा नहीं कर पाता था, लेकिन शुरू इतनी प्रतिबद्धता से करता था जैसे वह उसी काम के लिए बना हो। तो पहली बार मैं अपने मित्र संजीव स्‍नेही के साथ वह फिल्‍म देखने गया था। ऐसा जादू चढ़ा कि दूसरे दिन भी अकेले नून शो चला गया। तीसरे दिन अपनी प्रेमिका से मैंने बहुत मिन्‍न्‍त की कि वह मेरे साथ '1942 ए लव स्‍टोरी' देखने चले। प्रेमिकाओं के दिल पत्‍थर जैसे लगते हैं, लेकिन होते मोम जैसे हैं। वह मुस्‍करा उठी और हम मैटिनी शो देख आये। खुमारी उतर नहीं रही थी। चौथे दिन जब मेरे पांव पूनम सिनेमा की तरफ बढ़े, तो टिकट खिड़की के पास बुलाकी साव सामने से खड़ा हो गया। बोला, 'मुन्‍ना अब और नहीं'। मुझे उसके साथ चौंकने की आदत थी, तो मैं चौंका। बुलाकी साव ने बताया, 'तीन दिन से तुमको देख रहे हैं। पहले दिन संजीब्‍बा के साथ देखे। परसों तुमको अकेले देखे और कल भी कंचनिया के साथ देख लिये थे। आज सोच लिये थे कि तुमको ज्‍यादा बहकने नहीं देंगे।' गुस्‍सा तो मुझे बहुत आया, लेकिन एक चांस लेते हुए बुलाकी से कहा, 'छलके तेरी आंखों से शराब और ज्‍यादा, खिलते रहे होंठों के गुलाब और ज्‍यादा... आज भर देख लेने दो न बुलाकी!' निहौरा करने की मेरी अदा का उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने छुट्टी ले ली और मेरा हाथ पकड़ कर राज दरभंगा के गेट तक ले आया। लस्‍सी वाले से दो लस्‍सी मांगी। एक लस्‍सी मेरी तरफ बढ़ाते हुए बुलाकी साव ने पूछा कि ऐसा क्‍या है इस फिल्‍म में, जो तुम तीन दिन से आ-जा रहे हो। लस्‍सी पीते हुए मैंने उसे घूरती आंखों से देखा और मूंछ के नीचे उग आयी उजली लकीर को जीभ से साफ करते हुए कहा, 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख्‍़वाब, जैसे उजली किरन, जैसे बन में हिरन, जैसे चांदनी रात, जैसे नरमी की बात... जैसे मंदिर में हो एक जलता दिया!' बुलाकी साव मेरी तरफ देखने लगा। मैंने कहा, 'बिंब देखो! मुझे यह पूरा गीत कंठस्‍थ हो गया है।' बुलाकी ने कहा कि अच्‍छा है, बहुत अच्‍छा है लेकिन फिर मेरे उत्‍साह पर पानी फेरते हुए उसने कहा कि यह पूरा गीत नक़ल है। 1945 में 'मन की जीत' फिल्‍म के लिए जोश मलीहाबादी ने इस तर्ज को पहली बार सोचा और लिखा था। मैंने कहा, सवाल ही नहीं है। बुलाकी ने सुनाया, 'मोरे जोबना का देखो उभार, पापी जोबना का देखो उभार... जैसे नद्दी की मौज, जैसे तुर्कों की फौज, जैसे सुलगे से बम, जैसे बालक उधम... जैसे कोयल पुकार... मोरे जोबना का देखो उभार!' मैंने कहा, क्‍या बात करते हो - यह तो सेम टू सेम है। पर बुलाकी का दिल बड़ा था। उसने कहा कि अदब में ऐसी रवायत होनी चाहिए कि एक ही ज़मीन पर लोग अपनी अपनी बातें कह सकें। फिर शरमाते हुए उसने कहा कि मैंने भी ऐसी एक कविता सोची है, सुनोगे? मैंने लस्‍सी का खाली गिलास बेंच पर रखते हुए कहा, सुनाओ। और बुलाकी साव ने जो कविता सुनायी, वह आज मैं आप सबकी नज़र कर रहा हूं।

चांदी जैसी़ सोने जैसी

पानी भरे भगोने जैसी

पूजा घर के कोने जैसी

भरी खीर के दोने जैसी

तुम हो

तुम हो

पके धान की बाली जैसी

सुर में बजती ताली जैसी

अस्‍ताचल की लाली जैसी

हां बिल्‍कुल घरवाली जैसी

तुम हो

तुम हो

मीठे मीठे जामन जैसी

कीचड़ में भी पावन जैसी

गरम जेठ में सावन जैसी

हंसी, फूल, मनभावन जैसी

तुम हो

तुम हो

लतरी हुई लताएं जैसी

छायी हुई छटाएं जैसी

सन सन सनन हवाएं जैसी

घन घन घनन घटाएं जैसी

तुम हो

तुम हो

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बुलाकी साव की सातवीं कविता

बुलाकी साव से मेरी दोस्‍ती का दिलचस्‍प किस्‍सा है। पड़ोस के आठ गांवों (अठगामा) में उस जैसा अरिपन बनाने वाला कोई नहीं था। हालांकि यह औरतों के हिस्‍से में आने वाली विशेष चित्रकला है - लेकिन बुलाकी साव ने इसी कला में विशेषज्ञता हासिल की थी। वह अक्‍सर मुझसे कहता था कि मैं दरअसल स्‍त्री हूं। ईश्‍वर की किसी ग़लती से पुरुष जाति में पैदा हो गया। बहरहाल, मेरे आंगन में जब भी कोई शुभ काम होता था, बुलाकी साव को बुलाया जाता था। वह पिठार (पिसे हुए चावल का बारीक घोल) से घर के हर दरवाज़े पर फूल, पत्ती, चिड़ि‍या, मछलियों का ख़ूबसूरत संसार रच देता था। उस वक्‍त मेरी उम्र दस बारह साल की रही होगी। जब बुलाकी साव अपनी कलाकारी में मगन रहता था, मैं उसके पीछे बैठ जाता। मिट्टी पर पिठार की रेखाएं उकेरते हुए वह एक गीत गुनगुनाता था। शब्‍द मेरी पकड़ में नहीं आते थे, लेकिन धुन दिल पर धम धम की तरह बजती थी। अच्‍छा लगता था। थोड़ा बड़े होने और शब्‍दों से दोस्‍ती हो जाने के बाद अक्‍सर मैं उससे वह गीत सुनता था। वह एक फिल्‍मी गीत था और उसके बोल थे - "दिल मेरा एक आस का पंछी, उड़ता है ऊंचे गगन पर; पहुंचेगा एक दिन कभी तो, चांद की उजली ज़मीं पर।" बुलाकी साव चांद की उजली ज़मीन पर पहुंचा या नहीं - नहीं मालूम, पर मैंने अपनी आंखों से देखा कि उसने किसी भी आंगन के कोने-अंतरे में अरिपन बनाना छोड़ दिया। इस काम के बदलेे उसे हर घर से तीन सेर अनाज मिलता था। महंगाई जब बढ़ी, तो उसने तीन सेर की जगह पांच सेर अनाज की मांग की। मेरे एक चाचा ने उसे बुरी तरह लताड़ा और दो तीन थप्‍पड़ भी लगाये। वह दिन और मेरे दरभंगा छोड़ने का आख़ि‍री दिन, मैंने कभी बुलाकी साव को अरिपन बनाते नहीं देखा। उसके पास उदास कविताएं भी थीं।

नदी के पार

वह संसार

जिसमें रास्‍ते हैं फूल-परियों तक पहुंचने के

दिखाई दे रहे हैं पर नहीं है नाव कोई भी

उजाले मर रहे हैं शाम की चट्टान से लड़ कर

परिंदो! काम से लौटो

चलो अब गांव कोई भी

बकरियां

गाय

पारा

बैल

सब खूंटे के आशिक़ हैं

उन्‍हें मालूम है जन्‍नत से दोज़ख़

और फिर दोज़ख़ से जन्‍नत का पता लेकिन

उन्‍हें तो बीच में बस टूंगते रहना है जंगल-झाड़ के सूखे-हरे पत्ते

हमें मालूम है हम तैर सकते हैं

मगर पानी पे परियों ने लगा रखा है कांटों का बड़ा बाड़ा

ये परियां कौन हैं?

सुख के सितारे झिलमिलाते से!

हमें ग़म का लबादा ओढ़ कर जीना है मरना है

कि हम तो आदमी हैं

इश्‍क हमको मार देता है!!!

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बुलाकी साव की छठी कविता

जब मैं अठारह साल का हुआ, उसके बाद के चुनाव में नरसिम्‍हा राव प्रधानमंत्री बने थे। पर मैंने उन्‍हें प्रधानमंत्री नहीं बनाया था। मेरे घर पर तो लोक लहर पत्रिका आती थी। हमारे जिले से विजयकांत ठाकुर सीपीएम के उम्‍मीदवार थे। मैं बहुत उत्‍साह से वोट डालने गया था, लेकिन मेरा वोट पहले ही पड़ चुका था। बिना निशान वाला खाली अंगूठा लेकर बेहद उदास मैं अपने गांव से बाहर पोलो मैदान की तरफ निकल आया। वहीं किशोरी भैया की साइकिल पंचर की दुकान थी, जहां बुलाकी साव अपने गांव के सझुआर टोले के किसी लड़के की साइकिल का पंचर ठीक कराने आया था। पास से गुज़रा तो उसने झकझोरा, "क्‍या मुन्‍ना, तुम्‍हारा भी पंचर निकल गया न!" उसकी बात पर इतना गुस्‍सा आया कि बता नहीं सकता। लेकिन बुलाकी साव ने कहा, "मेरा भी पंचर निकल गया। हम भी भोट नहीं डाल पाये।" उसने अपना खाली अंगूठा दिखाया, तब जाकर तसल्‍ली हुई। उसने बताया कि जिस साल वह पैदा हुआ, उसी साल प्रजातांत्रिक सोशलिस्‍ट पार्टी बनी थी। लेकिन जब वह बड़ा हुआ, तो वह पार्टी थी ही नहीं। एक बार मैथिली के विराट कवि सुरेंद्र झा सुमन से मिला। सुमन जी जनसंघ के संस्‍थापकों में से थे और इसी पार्टी से चुनाव भी लड़ चुके थे। तो जब भारतीय जनता पार्टी की स्‍थापना हुई, तो वह इस पार्टी का अवैतनिक कार्यकर्ता हो गया। एक रात पार्टी दफ्तर में रुका। उसी रात जिला अध्‍यक्ष ने उसकी पैंट उतारने की कोशिश की। वह रातोरात वहां से भागा और तमाम पार्टियां, उनके झंडे और उनका वोटबैंक लांघते हुए बागमती नदी में कूद गया। कई डुबकियां लगाने के बाद पवित्र होकर निकला। फिर हर चुनाव में नेताओं के खिलाफ कविताएं लिखने लगा। यह कविता उसी दिन बुलाकी साव ने मुझे सुनायी थी।

कादो-कीचड़ भचर भचर बातों का नेता

भूत भस्‍म भैरव भभूत लातों का नेता

ऊंचे से ज्‍यादा ऊंची जातों का नेता

बही संभालो, है उधार-खातों का नेता

ले लो

इस चुनाव में

ले लो

आर्य मिले अन-आर्य मुगल अंग्रेज मिले

सोच समझ में जो भी सबसे तेज मिले

ऊबड़ खाबड़ या फूलों की सेज मिले

बर्तन बासन चौकी कुर्सी मेज मिले

ले लो

इस चुनाव में

ले लो

लोकतंत्र का मेला ठेला टके सेर है

उम्‍मीदों-वादों का केला टके सेर है

गुरु जलेबी चमचम चेला टके सेर है

आम आदमी आज अकेला टके सेर है

ले लो

इस चुनाव में

ले लो

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बुलाकी साव की पांचवीं कविता

मैथिली के राइटर रामदेव झा से मिल कर जब मैथिली के दूसरे राइटर रामानंद रेणु से मिलने जा रहा था, तो बीच में रायसाहेब पोखर के पास एक पेड़ के नीचे रुक गया। दूसरी तरफ कुछ लड़के बंसी फंसाये हुए थे। उन्‍हें एक आदमी निहार रहा था। ऐसा लगा कि वह बुलाकी साव है। मैंने आवाज़ लगायी। पोखरे के ठहरे पानी पर तैरती हुई मेरी आवाज़ दूसरी तरफ़ पहुंची। उसके चौंकने से पता चला कि वह बुलाकी साव ही है। दौड़ कर उसके पास पहुंचा। हालांकि मैं उसे लेखक नहीं मानता था, क्‍योंकि उसका लिखा हुआ कभी सामने नहीं आया। पर उससे मिलने में लेखक से मिलने की संतुष्टि मिलती थी। उसने पूछा, इधर किधर? मैंने बताया कि दरअसल यह जानना चाहता हूं कि हमारी मैथिली में बग़ावत के गीत कब लिखे जाएंगे। सो आज सिर्फ मैथिली के साहित्‍यकारों से मिल रहा हूं। बुलाकी साव हंसा और ज़ोर से हंसा। कहने लगा कि बगावत के गीत किसी योजना के तहत नहीं पैदा होते, जिसमें ख़रीदे हुए क्रांतिकारी शब्‍द पकाये जाएं। विद्यापति ने जो भी जितना भी लिखा, वह सब बगावत के गीत हैं। बोलना ही बग़ावत है। उसने फ़ैज़ की नज़्म सुनायी, "बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बां अब तक तेरी है..." लेकिन इस नज़्म के अधिकांश शब्‍द मुझे समझ ही नहीं आये। मुझे उर्दू नहीं आती थी। फिर बुलाकी साव ने उसका जो तर्जुमा (अनुवाद) सुनाया, वह आज आप सबके सामने रख रहा हूं। उम्‍मीद है, वह एक अलग और स्‍वतंत्र कविता जैसी लगेगी।

जीभ के दाने खुरच

कुछ बोल

बोल सब बातें

दफ़न हैं जो कई सालों से सीने में

फुसफुसा कर बोलते थे कौन सुनता था

कौन चेहरे में छुपी चुप्‍पी समझता था

कौन आंखों की ज़बां पढ़ कर पिघलता था

इसलिए अब बोल

क्‍योंकि बोलना हथियार है साथी

और बोलना ही वार है साथी

जीभ के दाने खुरच

कुछ बोल

बोल सब बातें

दफ़न हैं जो कई सालों से सीने में!

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Monday, May 16, 2016

बुलाकी साव की चौथी कविता: अंधेरा

मेरी प्रिय कविता। दरभंगा में मैं नाटक किया करता था। साल में हम तीन चार नाटक कर लेते थे और कुल मिला कर छह महीने तो रिहर्सल चलते ही थे। बुलाकी साव कहता था कि यह सब फरेब है। ज़ि‍ंदगी ही जब नाटक है, फिर अलग से नाटक करने की क्‍या ज़रूरत? वह कभी मेरा नाटक नहीं देखता था। अक्‍सर आधी रात से बहुत पहले जब मैं शहर में नाटक या रिहर्सल से गांव की ओर लौटता था, तो वह हजमा चौराहे के पास दिख जाता था। ज़्यादातर मैं उसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाता था। पर एक दिन उसने मुझे पकड़ लिया। वहीं पास में एक ताड़ी घर था। तब तक मैं सिर्फ चखना खाता था। ताड़ीघर में सिर्फ एक ढिबरी जल रही थी। कोई नहीं था। वह ज़मीन पर बैठ गया और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे भी बैठा लिया। एक औरत आयी। एक बोतल ताड़ी, दो छोटे गिलास और एक प्‍लेट में भुने हुए पीले मटर रख गयी। बुलाकी साव ने प्‍लेट मेरी तरफ बढ़ा दिया। खुद ताड़ी पीने लगा। थोड़ा मटर खाकर जब मैं उठने को हुआ, उसने कस कर मेरा हाथ पकड़ लिया। तब तक उसकी आधी बोतल खाली हो चुकी थी। उसने मेरी आंखों में आंखें डाली और रोने लगा। रोते हुए उसने अपनी ताज़ा कविता सुनिया। कविता में एक लय थी, जो मेरे ज़ेहन में आज तक बसी हुई है। आज भी, आधी रात से बहुत पहले, जब मैं घर लौट रहा होता हूं - मुझे बुलाकी साव की वह कविता बहुत याद आती है।

बिजलियां हैं

रोशनी है ढेर सारी

लाल पीली हरी नीली

और इन रंगीनियों में

साफ दिखता है अंधेरा

आंख की परतों के भीतर

गिलहरी सी दौड़ती है

भागती और हांफती दिखती है दुनिया

ठहर कर जो देखना चाहें किसी को

अजनबी आहट में खो जाता है वह भी

और फिर से

वही अंधेरा

हमारे पास

सिरहाने से लग कर बैठ जाता है

कौन हैं हम

आदमी जैसा ही

और एक आदमी हैं

चीखना होगा हमें

हर आदमी का चीखना होगा ज़रूरी

ढेर सारी चीख़ से एक पौ फटेगी

मां हंसेगी

और एक बच्‍चा हंसेगा

पेड़ की सब टहनियों पर

ढेर सारे शोख़ पंछी हंस पड़ेंगे

और फिर होगा सबेरा

एक दिन तो हारना होगा अंधेरा!

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बुलाकी साव की तीसरी कविता: ये लेनिन वो माओ

दरभंगा में एमएल एकेडमी था, जहां थोड़ी स्‍कूली पढ़ाई मैंने की थी। उसके गेट पर गणेशी अपना ठेला लगाता था और भूंजा बेचता था। सारे बच्‍चों को उसने भूंजा खाने का चस्‍का लगा दिया था। वैसा भूंजा इस ब्रह्मांड में शायद ही कोई बनाता होगा। चार आने में एक ठोंगा। बाद में बड़े होकर भी हम गणेशी का भूंजा खाने जाते थे। तब भी एक रुपये में एक ठोंगा। ऐसे ही, एक दोपहर हम थलवारा-हायाघाट के बीच हुई भीषण रेल दुर्घटना के मरीज़ों का हालचाल लेकर डीएमसीएच से लौट रहे थे, तो गणेशी के पास रुक कर भूंजा बनवाने लगे। तभी पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखा। वह बुलाकी साव था। मैंने दो ठोंगा भूंजा बनवाया और खाते हुए बंगाली टोला की तरफ निकल आये। वीणापाणि क्‍लब के बाहर नन्‍हें से मैदान में बैठ गये। अचानक बुलाकी साव ने भूंजा का बड़ा सा फक्‍का मुंह में ठूंसा और उठ कर नाचने लगा। ज़ोर ज़ोर से भूंजा चबाते हुए गाने लगा। वह गीत अब भी याद है। जो याद रह जाए और जिसे कभी न भूल पाओ, वही श्रेष्‍ठ और प्रिय कविता हो सकती है। इस तरह बुलाकी साव की यह कविता भी मेरी बहुत प्रिय कविता है।

जाओ

फिर आओ

फिर जाओ

फिर आओ

किराने के खाते में चीनी लिखवाओ

नमक मोटा मोटा उधारी मंगवाओ

पुराना है गीत मगर दाल रोटी गाओ

किसी को भी देखो, किसी को भी चाहो

किसी एक लड़की से फिर धोखा खाओ

किसी को भी पकड़ो दुलत्ती लगाओ

था हिंदी में गाना, तो इंग्लिश में वाओ

कहां से चला था कहां तक गया वो

ये लेनिन

वो माओ

ये तोजो

वो ताओ

ज़रा से पसीने में मुक्ति कमाओ

जाओ

फिर आओ

फिर जाओ

फिर आओ

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Sunday, May 15, 2016

बुलाकी साव की दूसरी कविता

मेरी प्रिय कविता। एक दिन बुलाकी साव देर रात गये आया। मैं दालान पर सोया था। गांव में चारों तरफ सन्‍नाटा था। चांदनी रात थी, तो मैं देख पाया कि बुलाकी साव पसीना पसीना है। वह अपने गांव से नंगे पांव दौड़ते हुए आया था। छह दिसंबर 1992 के बाद की कोई रात थी। हम दोनों आधी रात को बागमती नदी के किनारे गये, जहां आम के हजारों पेड़ थे। कहते हैं कि रात को वहां भूत-प्रेत नाचते हैं। मैं डर रहा था, लेकिन बुलाकी साव निर्भय था। उसने कहा कि भूत-प्रेत शहर में उत्‍पात मचा रहे हैं। तुम मेरी नयी कविता सुनो। और वह पागलों की तरह नाचते हुए गाने लगा। मुझे आज भी नृत्‍य की उसकी लय और कविता का उसका छंद अच्‍छी तरह याद है। सुनिए ज़रा...

लोटा था

सोंटा था

बाबा थे धोती थी कुर्ता था चकचक

यादों का मोरपंख दिल में कुछ धक धक

बांस की कलम थी और स्‍याही था नीला

कविता थी कुनबा था मन गीला गीला

शहर में सबेरा है सूरज को खोजो

नीरज भी नहीं दिखा नीरज को खोजो

सात बरस पहले गया था कमाने

पहले बरस उसने भेजे चार आने

डाक घर बंद है और बंद है दुकानें

दंगाई सड़कों पर सत्ता को पाने

तीन बलात्‍कार हुए, आठ गयीं जानें

हम खुद को मानें या दुनिया को मानें

कवि था बुलाकी और बाबा थे साव जी

कविता में क्‍यों खाते रहते हो भाव जी

गलियों में दंगे थे, नाक में पोंटा था

रामधनी की बेटी का लंबा झोंटा था

लोटा था

सोंटा था

कवि था बुलाकी

और बाबा थे साव जी

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Saturday, May 14, 2016

बुलाकी साव की कविता

मेरी प्रिय कविता। फेसबुक पर किसी ने मुझे टैग किया था, मैंने रिमूव कर दिया। आज सुबह उठते ही वो कवि याद आया, जिसके पास कभी कोई डायरी मैंने नहीं देखी थी। मेरे गांव से पांच कोस दूर उसकी कुटिया थी और वह हमेशा नंगे पांव मुझसे मिलने आता था। एक नयी कविता सुनाऊं - हर मुलाकात में पहला वाक्‍य यही होता था। हर बार मैं उसकी नयी कविता सुनता था। अपनी पुरानी कविताएं उसे याद नहीं रहती थीं। वह अपनी हर नयी कविता के साथ पुरानी कविताएं भूलता चला जाता था। बुलाकी साव नाम का वह कवि अब कहां है, मुझे नहीं पता। आज से बीस साल पहले वह उम्र में मुझसे बीस साल बड़ा था। बुलाकी साव की ही एक कविता मेरी सबसे प्रिय कविता है। सुनिए...

कहकहा

अहा

उसने क्‍या क्‍या न सहा हाय हाय

हवा चली सांय सांय

गोली थी ठांय ठांय! निर्ममता!!

मां थी और बेटी थी ममता

सड़कों मोहल्‍लों में कहीं नहीं समता

किस्‍सा क्‍या थमता, सब लूट गये

इज्‍जत के रंग कहीं छूट गये

लाल लाल क्रांति के तहखाने कूट गये

ज़हरीली फसल देख लहलहा

कहकहा

अहा

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Thursday, May 12, 2016

Buddha in A Traffic Jam

13 मई 2016 यानी आज रीलीज़ हुई फिल्‍म Buddha in A Traffic Jam पर मेरी यानी अविनाश दास की टेक

हमारे प्रिय अग्रज पवन कुमार वर्मा ने एक किताब लिखी थी, द ग्रेट इंडियन मिडल क्‍लास। मध्‍य वर्ग की अजीब दास्‍तान दरअसल यही है कि वह अराजनीतिक होने में विश्‍वास करता है। जबकि सच यही है कि जब आप राजनीति के खिलाफ़ खड़े होते हैं, तब भी आप एक तरह की राजनीति कर रहे होते हैं। मुझे तक़लीफ़ नहीं होती, जब विवेक अग्निहोत्री अपनी फिल्‍म बुद्धा इन अ ट्रैफिक जैम में नक्‍सलवाद की राजनीति का विरोध करते हुए अपनी मनपसंद राजनीति की वकालत करते। लेकिन वह राजनीति के बरक्‍स व्‍यापार की बात करते हैं और बड़ी चालाकी से उसमें भ्रष्‍टाचार से मुक्ति का जुमला जोड़ देते हैं। सभ्‍यताओं के संघर्ष में जिस पूंजीवाद की भूमिका उकसावे वाली होती है, उस पूंजीवाद के साथ खड़े होना एक विचारधारा है और विवेक उस विचारधारा के प्रतिनिधि फिल्‍मकार लगते हैं। इस तरह, भारत का एक सहिष्‍णु नागरिक होने के नाते "बुद्धा इन अ ट्रैफिक जैम" से असहमति के बाद भी मैं विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्‍म का स्‍वागत करता हूं और मित्रों से यह फिल्‍म देखने की अपील करता हूं।

संघर्ष में शामिल होना न होना एक अलग स्थिति है, लेकिन मैं खुद को मुक्ति के हर संघर्ष का समर्थक मानता हूं। इसमें उत्‍पादक और ग्राहक के बीच खड़े बिचौलिये से मुक्ति भी शामिल है और विवेक का मानना है कि नक्‍सलवाद का पूरा संघर्ष इसी बिचौलिये की रक्षा का संघर्ष है। सॉरी विवेक, किसी भी राजनीति को इतना सरलीकृत करके देखने की आपकी समझ पर मैं आपसे थोड़ा हंस लेने की इजाज़त चाहता हूं।

मेकिंग शानदार और संगीत उम्‍दा है। लेकिन संगीत पर भी कुछ बात। फिल्‍म में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्में हैं। गुरिल्‍ला सिनेमा, नुक्‍कड़ नाटक सत्ता-व्‍यवस्‍था के विरोध में अभिव्‍यक्ति का औज़ार बन कर पैदा हुआ - लेकिन सत्ता ने इस औज़ार को कोऑप्‍ट कर लिया। इनका पूरी तरह से एनजीओकरण हो गया। इस उदाहरण से और "बुद्धा इन अ ट्रैफिक जैम" में इस्‍तेमाल हुए फ़ैज़ के गीतों से समझें तो अब पूंजीवाद की नज़र मुक्तिकामी रचनाधर्मिता पर भी है। अब वह मुक्ति और संघर्ष के गीतों का अर्थ बदल देने की तैयारी में है। मुझे अफ़सोस है कि फ़ैज़ के गीत उस फिल्‍म के किरदार गा रहे हैं, जो फिल्‍म राजनीति की जगह बाज़ार के साथ खड़ी है।

मेरा मन भरा हुआ है, पर नाराज़ नहीं हूं। मुझमें पर्याप्‍त सहिष्‍णुता है। धन्‍यवाद।

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Tuesday, September 14, 2010

हरा रंग और हरी बांसुरी

मेरी बेटी को हरा रंग बहुत पसंद है। यही वो रंग है, जिसे उसने ठीक ठीक पहचान लिया है। उसकी कोई भी फरमाइश हरे रंग से शुरू होती है। कैसा गुब्‍बारा चाहिए, ग्रीन वाला। वह उजले और लाल रंग को भी पहचान लेती है, लेकिन चाहिए उसे कोई चीज ग्रीन वाली ही।

अभी कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के दिन उसे स्‍कूल से बांसुरी मिली। उसे फूंक कर आवाज निकालती है और कहती है, ये मेरा फ्ल्यूट है।

आज दोपहर का किस्‍सा है। हम सब खाना खा रहे थे। वह खुद से अपना प्रिय घी-भात खा रही थी। अचानक बांसुरी की आवाज आयी। वह चौंकी। बालकनी की तरफ भागी। मैं भी पीछे पीछे गया। बांसुरी वाला दूर निकल गया था। मैंने जोर की हांक लगा कर उसे वापस बुलाया। दस रुपये से सौ रुपये की रेंज तक की बांसुरी उसके पास थी।

हरे धागे से बंधी हुई एक बांसुरी थी। 80 रुपये की। वह जिद ठान बैठी कि उसे वही ग्रीन वाली फ्ल्‍यूट चाहिए। पर उसकी फांक बड़ी थी और उसके लिए उसे फूंकना असंभव था। पर असल बात इस कड़की में उसकी जिद के लिए 80 रुपये खर्च करने से बचने की थी। मैं नीचे गया और दस रुपये की एक बांसुरी ले आया। पर हरे की जिद ने उसके पांव और आंख को पागल कर दिया। वह पांव पटकती रही। चीखती-चिल्‍लाती रही। रोती रही। आंख से आंसू आते रहे।

उसकी मां ने दस रुपये की बांसुरी को हरे स्‍केच से रंगने की कोशिश की, लेकिन उसे सारा फ्रॉड समझ में आ गया। उसने रोना धोना जारी रखा कि उसे तो वही वाला फ्ल्‍यूट चाहिए - जिसमें ग्रीन वाला धागा बंधा था। वह अधीर हो रही थी और हम, उसे कैसे संभालें, इस फिक्र में नये नये तरीके सोच रहे थे।

इसी आपाधापी में मुक्‍ता अपनी थाली बालकनी की दीवार पर छोड़ आयी। थोड़ी ही देर में देखा कि सुर का सुर अचानक बदला और वो हंसने लगी। उसकी नजर बालकनी की दीवार पर रखी मां की थाली पर थी, जिसके पास एक गिलहरी आ गयी थी और भात के दाने चुन चुन कर खा रही थी। वह खुश हो गयी और हरी वाली बांसुरी भूल गयी। हम सब फिर उसी एक दृश्‍य में रम गये।

सुर की जिद, उसे मनाने की कोशिशें और फिर बिना मनाये हुए किसी और मामले में उसकी हंसी इन दिनों हमारे घर में रोजमर्रा का जीवन प्रसंग हो चला है।

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Friday, January 30, 2009

हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं!

वहां जहां जीवित लोग काम करते हैं
मुर्दा चुप्पी सी लगती है जबकि ऐसा नहीं कि लोगों ने बातें करनी बंद कर दी हैं
उनके सामने अब भी रखी जाती हैं चाय की प्यालियां
और वे उसे उठा कर पास पास हो लेते हैं
एक दूसरे की ओर चेहरा करके
देखते हैं ऐसे जैसे अब तक देखे गये चेहरे आज आखिरी बार देख रहे हों

सब जानते हैं पूरा वाक्य लिखना और अधूरे वाक्य के बाद उनका दिमाग सुन्न पड़ जाता है
एक लंबे अभ्यास की छाया में मशीनी रूप से पूरे होते हैं वाक्य
और जिनमें अनुपस्थित रहता है एक सचेत नागरिक और निष्पक्ष पत्रकार
ये अनुपस्थिति तो यूं भी रहती आयी है
लेकिन हालात बताने के लिए
तमाम विरोधाभास के बावजूद इसका ज़िक्र अभी ज्यादा जरूरी है

बचत के लिए कम की गयी रोशनी और बांटे गये अंधेरे में
आशंका की आड़ी तिरछी रेखाएं स्पष्ट आकृति में ढल रही हैं
सबके पास इसका हिसाब नहीं है कि दो महीने बाद मकान का किराया कैसे दिया जाएगा
राशन दुकानदार से क्या कहा जाएगा
और जिनके बच्चे हैं वे उनकी ज़िद को ढाढ़स के किस रूपक से कमज़ोर करेंगे

हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं
और उन्हें काम से निकाला नहीं गया है!

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Sunday, November 30, 2008

नागरिकनामा : न सिहरन, न अपराधबोध!

भोपाल। 26 नवंबर की रात हम घर जल्‍दी आ गये थे। इंग्‍लैंड के साथ पांचवां वन डे मैच था। इंडिया की जीत के साथ ही हमने एनडीटीवी इंडिया लगा कर देखा कि इस पांचवें और तयशुदा जीत पर कैसी ख़बरें आ रही हैं। हम उन नये मुहावरों को जानने के लिए भी मैच ख़त्‍म होने के बाद टीवी चैनलों पर जाते हैं - जो किसी भी मीडिया एथिक्‍स से ऊपर गढ़े जाते हैं। जैसे कि धोनी का धमाल या फिर धोनी की टोली ने किया धराशायी। एनडीटीवी इंडिया पर क्रिकेट था - लेकिन शोर मचाने के लिए मशहूर स्‍टार न्‍यूज और आजतक पर मुंबई में ताबड़तोड़ गोलीबारी के फ्लैश आ रहे थे। मिनटों में बाक़ी के चैनलों ने भी मुंबई का रुख कर लिया। रात गहरा रही थी और मामला संगीन होता जा रहा था। हम वक्‍त पर सोये और सुबह के अखबार ने हमें बताया कि मुंबई में सौ जानें जा चुकी हैं और सुबह के साढ़े तीन बजे तक - जब अखबार का आखिरी पन्‍ना छपने जा रहा था - बेकाबू आतंकवादियों की दहशतगर्दी और एनएसजी कमांडोज़ का ऑपरेशन जारी था। हमने बिना किसी हड़बड़ी के टीवी ऑन किया। हां, अब भी आतंकवादियों पर काबू करने की कोशिशें जारी थीं। लोगों के मारे जाने का सिलसिला भी जारी था। हम सुबह नाश्‍ता नहीं करते (एक कटोरी कॉर्नफ्लेक्स खाने को आप भी नाश्‍ता नहीं ही कहेंगे) - इसलिए नाश्‍ता नहीं करने के रोज़मर्रे के साथ घर से निकले। साथ में लंचबॉक्‍स लेकर।

ऑफिस पहुंचने तक मुंबई में सब कुछ चल रहा था। अब हम एक्‍साइटेड हुए - क्‍योंकि इस एक्‍साइटमेंट की काम को ज़रूरत थी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय में हम कुछ रोज़ से लड़के-लड़कियों के साथ इंट्रैक्‍ट करने के लिए जाते हैं - वही सब बीच-बीच में बताते रहे हैं कि ‘अ वेन्‍सडे’ एक फिल्‍म आयी थी - आप देखते - कमाल की फिल्‍म थी। आम आदमी का गुस्‍सा, आतंकवाद, मीडिया के इस्‍तेमाल पर वैसी फिल्‍म अब तक नहीं बनी - वगैरा-वगैरा। हमारे न्‍यूज एडिटर महेश लिलोरिया ने जब कहा कि हम मुंबई में चल रहे मौजूदा घपले को रील लाइफ के ड्रामा से जोड़ते हैं, तो हमारे एक्‍साइटमेंट को एक आधार मिला। हम इस संतोष के साथ घर लौटे कि आज का अखबार हमने कमाल का निकाला है। कल लोग देखेंगे, तो वाह तो कहेंगे ही।

हमने दोपहर में लंच किया। रात में डिनर। सोने से पहले जब टीवी ऑफ कर रहे थे - मुंबई में आतंकी कार्रवाई पर काबू की कोशिश जारी थी। यानी 24 घंटे बाद भी सीन साफ नहीं था। हम सो गये, क्‍योंकि रोज़ रात को सो जाने का नियम है।

सुबह हमने सबसे पहले अपना अखबार खोला और बार-बार उसे निहारा। अपने कमाल पर निहाल हुए - लेकिन एमएससी ईएम की एक छात्रा के फोन ने हतोत्‍साहित कर दिया। उसने ‘अ वेन्‍सडे’ के साथ मुंबई मामले की तुलना पर एतराज़ जाहिर किया था। हमने उससे कहा कि अपना एतराज़ लिख कर भेज दो - हम उसे भी छापेंगे। आज भी हम कॉर्नफ्लेक्‍स खाकर, लंच लेकर ऑफिस गये और न्‍यूज एडिटर से फीडबैक लिया। उन्‍होंने बताया कि आज का अखबार देख कर सब चकित हैं। मैंने उन्‍हें सुबह के फोन वाला फीडबैक दिया और उस छात्रा को दफ्तर भी बुला लिया। दोनों ने खूब बहस की और कोई एक दूसरे को कन्विंस नहीं कर सका। 28 नवंबर की शाम मा.च.प.सं.विवि की एक नौजवान टोली ने धावा बोला। उनके हाथों में कागज़ थे, जिन पर नीली स्‍याहियों में कुछ-कुछ दर्ज था। वो गुस्‍सा था - जो मुंबई हादसे के बाद उन्‍होंने जाहिर किया था। ज्‍यादातर लोग नेताओं को गोली मार देने के पक्ष में थे। हमने उन्‍हें भरोसा दिया कि अब आज तो नहीं, लेकिन कल जरूर उन सबके विचार अखबार में छापेंगे।

उस दिन सीधे घर लौटने का प्रोग्राम नहीं था। बीवी बेटी को लेकर न्‍यू मार्केट में थी। हम वहीं मिले। खरीदारी की। दुकानों में टीवी चैनल्स मुंबई का समाचार दे रहे थे। लोग गाहे-बगाहे, अपनी-अपनी दिलचस्‍पी के हिसाब से एक-आध बार उधर भी नज़रें दौड़ा लेते थे। इन्‍हीं लोगों में हम भी शामिल थे। हमने 28 नवंबर की शाम का डिनर बाहर ही किया। घर लौटे। सो गये।

तीसरे दिन सुबह नौ बजे के आसपास जवानों के ऑपरेशंस तो ख़त्‍म हो चुके थे, लेकिन ताज में सर्च अभियान चल रहा था, जो अगले कुछ घंटों तक चलने वाला था। हम रोज़मर्रा की तरह ही विचलित थे, सहज थे, शांत थे - वो सब थे, जो लगभग रोज़ ही होते हैं - अलग-अलग वक्‍त पर।

पूरे देश में बहस जारी थी। बीजेपी ने विज्ञापनों से देश के अखबार पाट दिये। आतंकवाद को कुचलना है, तो बीजेपी को वोट दो। बीजेपी की राजनीति देश की आवाज़ नहीं है, फिर भी देश 29 नवंबर को शिवराज पाटिल का इस्‍तीफा चाह रहा था। हमने 29 नवंबर को गुस्‍साये नौजवानों का जो स्‍पीकअप अखबार के पेज पर चस्‍पां किया - उसमें एक प्रमोद दुबे भी थे। उन्‍होंने लिखा, ‘मैं प्रमोद दुबे, भारत का एक साधारण नागरिक हूं, जो कहीं पदासीन, प्रतिष्ठित या मनोनीत नहीं है। साधारण हूं, इसलिए भारत की बढ़ती असाधारण समस्‍याओं के प्रति उदासीन हूं। तो भारत का यह साधारण नागरिक यह स्‍वीकार करता है कि वह व्‍यवस्‍था के साथ म्‍युचुअल कांस्पिरेसी में शरीक रहा है।’ मुझे लगा कि आज भी हम विचारोत्तेजना की स्‍टाइलशीट में अख़बार फिट करके घर लौटे हैं।

30 नवंबर। दोपहर से पहले शिवराज पाटिल इस्‍तीफा दे चुके थे। हमने सुबह टीवी पर खबर नहीं देखी थी - एक फिल्‍म देखते रह गये थे। इस्‍तीफे की ख़बर मुझे श्रीकांत सिंह, एचओडी, एमएससी ईएम, मा.च.प.सं.विवि से मिली। हम दोनों विश्‍वविद्यालय के एमएससी ईएम के फ्रेशर्स डे में मौजूद थे। मेरी बेटी गोद में थी। उन्‍होंने एक लिफाफे में भरा मौद्रिक आशीर्वाद उसके हाथ में थमाया और मुझसे पूछा - आज इसका जन्‍मदिन है न। छात्र-छात्राओं ने मेरी बेटी के जन्‍मदिन पर भव्‍य आयोजन किया था। केक से लेकर बैलून, चमकी, समोसा, मिठाई तक। हम मियां-बीवी अंदर से भर आये थे। ये भरना आयोजन की भव्‍यता से गदगद होकर हुआ था।

पिछले तीन दिनों तक मुंबई में जो हुआ - हम एक बार भी नहीं रोये थे। बल्कि कई बार किसी न किसी बात पर ठठा कर हंसे थे।

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Monday, September 8, 2008

तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़?

अभी दिल्‍ली में हैं। बोरिया-बिस्‍तर समेटने में लगे हैं। पिछले 12 सालों में पटना के अलावा दिल्‍ली दूसरा ठौर रहा, जहां लगातार तीन साल कट गये। सामान सहेजते हुए मुक्‍ता कई सारे काग़ज़ हाथ में थमाती रहती है। पुराने काग़ज़ों का पुलिंदा आपकी कई यात्राओं तक साथ रहता है - जब त‍क उन काग़ज़ों का मर्म आपका पीछा करता रहता है। हर बार सामान समेटते हुए आप ऐसे काग़ज़ों में से खुद चुनते हैं कि अगले मोड़ तक इनमें कौन अब साथ रहेगा, और कौन-से काग़ज़ अब टुकड़ों में बदल देना है। किन यादों की अब आपको ज़रूरत नहीं। इन्‍हीं में से मज़्कूर आलम की एक कविता मिली। मज़्कूर मेरे साथ देवघर में काम करते थे। प्रभात ख़बर का देवघर संस्‍करण पत्रकारिता का उनका शुरुआती सफ़र रहा। इसके बाद वे नवबिहार, हिंदुस्‍तान दैनिक, आईनेक्‍स्‍ट से जुड़ते रहे और अलग होते रहे। फिलहाल लंबे समय से द संडे इंडियन के भोजपुरी संस्‍करण में हैं। उनकी ये कविता मैं भोपाल नहीं ले जा रहा। सादा काग़ज़ पर पूरी कविता टाइप्‍ड है - श्रीलिपि फॉन्‍ट में। हाथ से ऊपर लिखा है, बड़े भाई अविनाश को। काग़ज़ के पीछे भी हाथ की लिखाई है, माफ करेंगे, तुमसे अपनापन का बोध होता है न, लेकिन कह नहीं सकता; इसलिए लिख रहा हूं। कविता का शीर्षक है - कामरेड! तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़...

पुते हुए चेहरों में
बिस्‍तर की सलवटों को
कैमरा से खींचते या दिखाते,
गर्मागर्म ख़बरों को परोसते
व्‍यूवर्स बटोरते
मेरा भारत महान, वंदे मातरम् का नारा लगाते
तुम भी तो डायना की जान के ग्राहक तो नहीं बन जाओगे?
तुम्‍हारी रातें गर्म और उमस भरी तो नहीं हो जाएंगी
जो करवटों में बीतेंगी?
गेट्स व अंबानी की मटकती चालों पर
फिदा तो नहीं हो जाओगे?
सभ्‍यता व संस्‍कृति की संचार क्रांति पर सवार तो नहीं हो जाओगे?
भूख, अकाल और विस्‍थापितों पर
क्‍या तब भी पैन होती रहेंगी तुम्‍हारी निगाहें?
बाढ़ के शब्‍दचित्रों को ढाल सकोगे रूपक में?
कहीं तुम भी बाज़ीगर तो नहीं बन जाओगे
आंखों के इशारे से सत्ता पलटने वाले मर्डोक की तरह?
कहीं ऐसा न हो
व्‍यवस्‍था परिवर्तन को लात मारकर भेज दो परिधि पर
और छोड़ दो उसे अंतरिक्ष में ज़मीन का चक्‍कर लगाने के लिए
कि वह ख़्वाब ज़‍िंदा भी रहे
और उस पर गुरुत्‍वाकर्षण बल भी न लगे
पर सुविधा परिवर्तन होता रहे,
बाज़ार के खनकते व खनखनाते कोलाहल में
जहां बिकने को बहुत कुछ है
और बहुत भारी है ख़रीदारों की जेब
वहां बिकने वाली ख़बरों के बीच
बचा सकोगे अपने आप को?

कामरेड
तुम सुन रहे हो न मेरी आवाज़?
तुम सुन सकोगे न अपनी आवाज़?
ये कविता मज़्कूर ने जब बस्‍ते में रखी होगी, तब मुझे शायद पता नहीं होगा। वो भावुक लड़का है और मैं उसका लिखा नहीं पढ़ता। खास कर व्‍यक्तिगत रूप से लिखी उसकी पातियां। क्‍योंकि संवेदना के किसी पचड़े में पड़ कर मैं खुद को दुखी नहीं करना चाहता। अब सुखी रहना चाहता हूं। लेकिन सफ़र की तैयारी में मिलने वाले पुराने काग़ज़ पुराना दुख दोहरा देते हैं। मज़्कूर ये कविता मैंने आज पहली बार पढ़ी।

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Friday, August 29, 2008

चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

मुशायरे कभी सुना करते थे। साइकिल पर चढ़ कर मोराबादी से हरमू कॉलोनी तक जाने का जुनून अब तक ज़ेहन में है। ये रांची की बात है। बाद में शहीद चौक के पास जिला स्‍कूल में भी एक कवि सम्‍मेलन हुआ था - जिसमें उन दिनों शहर में अच्‍छी खासी चर्चा पाने वाले एक हास्‍य कवि ने पत्‍नी चालीसा का पाठ किया था। एक बार बेगूसराय में केडी झा और प्रदीप बिहारी के सौजन्‍य से हमने भी अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन में शिरकत की थी, जिसमें ज्‍यादातर आस-पड़ोस के कवि थे। अखिल भारतीयता के नाम पर यश मालवीय आये थे, जिन्‍होंने मेरी गुजारिश पर सुनाया था - कहो सदाशिव कैसे हो। ज्‍यादातर कवि सम्‍मेलन बस ऐसे ही हुआ करते थे। कोई दरभंगा का दुष्‍यंत आ जाता था, तो कोई समस्‍तीपुर के साहिर आ जाते थे। असल मुशायरे में जाना एनडीटीवी की नौकरी के पहले साल में हुआ। कुमार संजॉय सिंह ले गये थे, जो एनडीटीवी इंडिया पर अर्ज किया है के प्रस्‍तोता थे। वसीम बरेलवी और खातिर गजनवी को वहां सुना। खातिर गजनवी की मौत हाल ही में हुई। उन्‍होंने सुनाया था, गो जरा सी बात पर बरसों के याराने गये। लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गये। उस मुशायरे का जिक्र एक आर्टिकल में मैंने किया था, जो हंस में छपा। मैंने लिख दिया था कि चवन्‍नी छाप शायरों की सोहबत में रहने वाले संजॉय सिंह मुझे इस शानदार मुशायरे में ले गये थे। चवन्‍नी छाप वाली बात पर संजॉय जी से जो झगड़ा हुआ, वो आज तक जारी है।

गालिब पर एक समारोह था, बल्‍लीमारान में - तब एक मुशायरा हुआ। वो पहला मुशायरा था, जिसमें शुरू से आखिर तक बैठकर हमारी रात गुज़री। मेरा दोस्‍त और मै‍थिली-हिंदी में कविताएं-आलोचना लिखने वाला पंकज पराशर साथ था और जमशेदपुर की मेरी परिचित रश्मि भी थी, जिन्‍हें मैं अपने साथ ले गया था। या ये भी हुआ होगा कि वे मुझे अपने साथ ले गये होंगे - याद नहीं। मुनव्‍वर राना, गोपालदास नीरज, बाल कवि बैरागी, निदा फाजली सब थे। लेकिन जिस एक शख्सियत की वजह से मैं यहां मुशायरों के जिक्र में उलझा हुआ हूं, वे थे अहमद फराज़। अभी अभी अपने चाहने वालों से हमेशा के लिए विदा हो चुके फराज़ साहब की गजल हमने टूटे हुए दिल के दिनों में खूब गाये हैं - रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ। आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ। अहमद फराज साहब ने बल्‍लीमारान में बहुत सारी गजलें सुनायीं। लेकिन एक गजल की याद हमेशा ताजा रहती है। वो मैं आप सबके लिए यहां पब्लिश कर रहा हूं।

सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है रब्‍त है उस को खराब हालों से
सो अपने आप को बर्बाद करके देखते हैं

सुना है दर्द की गाहक है चश्‍मे नाज़ुक उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़रके देखते हैं

सुना है उस को भी है शेरो शायरी से शगफ
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते है

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं

सुना है रात उसे चांद तकता रहता है
सितारे बामे फलक से उतरके देखते हैं

सुना है हश्र हैं उसकी ग़ज़ाल सी आंखें
सुना है उसको हिरन दश्‍त भर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियां सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

सुना है रात से बढ़ कर है काकुलें उसकी
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं

सुना है उसकी सियह चश्‍मगी क़यामत है
सो उसको सुर्माफ़रोश आंख भर के देखते हैं

सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्‍ज़ाम धर के देखते हैं

सुना है आईना तमसाल है जबीं उसका
जो सादा दिल हैं... बन संवर के देखते हैं

सुना है जब से हमाइल हैं उसकी गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल-ओ-गौहर के देखते हैं

सुना है चश्‍मे तसव्‍वुर से दश्‍ते इमकां में
पलंग ज़ावे उस की कमर के देखते हैं

सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
कि फूल अपनी क़बाएं कतर के देखते हैं

वो सर्व-क़द है मगर बे-गुले मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

बस एक निगाह से लुटता है क़ा‍फ़‍िला दिल का
सो रह-रवाने तमन्‍ना भी डर के देखते हैं

सुना है उसके शबिस्‍तां से मुत्तसिल है बहिश्‍त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दरो दीवार घर के देखते हैं

कहानियां ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर करके देखते हैं

अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जाएं
फ़राज़ आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

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Saturday, August 23, 2008

देवता मेरे सपने चुराते हैं और महंथों को बेच आते हैं!

तारानंद वियोगी मैथिली के बड़े कवि हैं। उनकी कविताओं का हिंदी में एक चयन अगले माह नयी किताब प्रकाशन से छपने वाला है। चयन और अनुवाद मेरा है। संकलन की भूमिका यहां प्रस्‍तुत है। साथ ही दो कविताएं भी। नोश फरमाएं।

तारानंद वियोगी की कविताएं मेरे लिए महज पाठ-सामग्री कभी नहीं रहीं, उन तमाम शब्‍दों की तरह जो अनगिनत लेखकों ने इजाद किये और जिन शब्‍दों ने हमारे लिए दुनिया को जानने-समझने वाले दरवाजे की सांकल उतारी। तारानंद की कविताओं ने मेरी निजी दुनिया का निर्माण किया है, जिसमें चलने-बोलने-सोचने और लिखने का तरीका शामिल है। मेरी पैदाइश के ठीक से अठारह बरस भी नहीं हुए थे, जब तारानंद से मेरा परिचय हुआ। मैं उस वक्‍त अभिव्‍यक्ति के खेत में उगा हुआ नवान्‍न था और वे हमारी भाषा को कहन की नयी गली में ले जाने वाले समर्थ साहित्यिक युवा। इस गली में परंपरा की झोपड़पट्टियां नहीं थीं, आधुनिकता के बनते हुए मकान थे। उस वक्‍त उनके पास विधाओं की कोई ऐसी सड़क नहीं थी, जिस पर वे दौड़ नहीं रहे थे। उनके अलावा मेरे पास उस वक्‍त बाबा नागार्जुन थे, जो सांसों की आखिरी तकलीफ से गुजर रहे थे और कभी कभार मेरे कागज पर थरथराती उंगलियों में कलम फंसाकर प्रसाद की तरह कुछ वर्ण खींच देते थे। सा‍हित्‍य की मेरी पाठशाला में वह पहली कक्षा थी, तो तारानंद वियोगी मेरे महाविद्यालय। मेरी अपनी आवारगी ने विश्‍वविद्यालय में दाखिल नहीं होने दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।

तारानंद वियोगी महिषी के रहने वाले हैं। ये गांव बिहार के सहरसा जिले में पड़ता है। इसी गांव में शंकराचार्य से शास्‍त्रार्थ करने वाले मंडन मिश्र हुए और राजकमल चौधरी भी, जिनके हिंदी उपन्‍यासों और जिनकी मैथिली कहानियों ने आने वाली पीढ़‍ियों को एक नयी लीक, नया साहस दिया। महिषी में ही सिद्ध शक्तिपीठ तारास्‍थान है, जिसकी वजह से शहरी रहवासियों की भीड़ आये दिन जुटती रहती है। तारानंद की अपनी शख्सियत में महिषी के इन तीनों तत्‍वों का निचोड़ मौजूद है। एक सिरे से आप उनकी कविताएं पढ़‍िए, मंडन मिश्र का तर्क कौशल, राजकमल चौधरी का आधुनिक-बोध और तारास्‍थान की आस्‍था का त्रिकोण आपको हर जगह मिलेगा।

मिलनसार तारानंद एकांतिक भी हैं, जो उनकी अध्‍ययनशीलता को बनाये रखता है। वे संस्‍कृत के विद्यार्थी रहे हैं और अंग्रेजी की शतकाधिक पुस्‍तकें उन्‍होंने पढ़ी हैं। वे बचपन में अल्‍पकालिक चरवाहा भी रहे - बकरी चराते थे। वे उन समकालीन कवियों की तरह नहीं हैं, जिनके पांवों में हमेशा चप्‍पलें रहीं और जो संवेदना के कारोबार को एक शानदार सेल्‍समैन की तरह आगे बढ़ाना जानते हैं। उनका प्रिय श्‍लोक है - ईशावास्‍य मिदं सर्वम्। ईश्‍वर सभी जगह है। वो ईश्‍वर जो आपकी चालाकियों को उंगलियों पर गिन रहा है। वो ईश्‍वर जो आपके शार्टकट का हिसाब सहेज कर रख रहा है। इसलिए चाहे वो जीवन जीने का मोर्चा हो या कविता रचने का, ईमानदारी और पवित्रता तारानंद के लिए पहली शर्त है।

इस संग्रह में उनकी जितनी भी कविताएं हैं, उन्‍हें जोड़ेंगे तो आपको उनका जीवनवृत्त मिलेगा। एक ऐसा जीवनवृत्त जिसमें जितनी मात्रा में संताप है, तो उम्‍मीद के आसार भी लगभग उतनी ही मात्रा में है। उनकी कविताएं सिर्फ दृश्‍य नहीं हैं - दर्शन हैं, जो जीने की नयी राह देते हैं। तारानंद वियोगी कविताएं मनुष्‍यता के विविध आयामों की चर्चा करती चलती है। खेमों-जातियों में बंटे समाज की नयी व्‍याख्‍या करती चलती है। सरकारी दफ़्तरों में फैले भ्रष्‍टाचार की तल्‍ख रिपोर्ट करती चलती है। ये तीन तथ्‍य मैं उनकी महज तीन कविताओं को सामने रख कर जाहिर कर रहा हूं - बुद्ध का दुख, ब्राह्मणों का गांव और गांधी जी। वरना जितनी कविताएं, उतने अर्थ। हर कविता इतिहास और समाजशास्‍त्र की पगडंडी पर अनोखी संवेदना के क़दमों से चलती हुई। इन कविताओं का अनुवाद मेरे लिए संभव नहीं था। ठीक उसी तरह जैसे किसी भी लोकभाषा के साहित्‍य का अनुवाद किसी दूसरी भाषा में संभव नहीं, अगर उस साहित्‍य की चेतना भाषाई मौलिकता में नहायी हुई हो। यानी ये कविताएं अपनी मूल भाषाई लय में जो कह रही हैं - सिर्फ उसके सारों का ये संकलन है।

मेरे लिए तो यह उस काम की तरह है, जो अभी खत्‍म नहीं हुआ है और जो कायदे से शुरू भी नहीं हुआ है।

ईशावास्यमिदंसर्वम्

समूचे ब्रह्मांड में फैले हैं देवता
तीनों लोकों में चौदह भुवनों में दसों दिशाओं में
जल में थल में अनिल अनल में
ओह! कोई जगह खाली नहीं बची
जहां आदमी सिर्फ अपने साथ हो सके

तरस गया हूं तड़प रहा हूं एकांत के लिए
लेकिन ये देवता! जीना हराम कर दिया है इन्होंने!

पानी पीता हूं
तो बैक्टीरिया वायरस की तरह
जाने कितने देवता मेरे आमाशय में पहुंच जाते हैं
कैसे खाऊं अन्न?
वृक्ष के फल भी शुद्ध नहीं हैं न मुरगी के अंडे
जाने किस धूर्त्त ने इस मिलावट की शुरुआत की
कि पांच हजार वर्षों से
मेरा स्वास्थ्य चौपट चल रहा है!

चीलर की तरह ये
अंडे बच्चे देते जा रहे हैं
बढ़ती जा रही है मिलावट
हराम होता जाता है आदमी का जीवन

पत्नी से प्रेमालाप तक नहीं कर सकता चुपचाप
जाने कितने देवता
टकटकी लगाकर
घूरते रहते हैं

अपना वीर्य तक नहीं बचा विशुद्ध
कि हम वो बच्चे पैदा कर सकें
जो सिर्फ हमारे हों

दुख समझो मेरा दुख
देवता मेरे सपने चुराते हैं
और महंथों को बेच आते हैं!

त्वया समं यास्यति

बड़े तेजस्वी थे वह राजा
मगर एक दिन चले गये।

बड़े खूंखार थे
थे बड़े मायावी
एक और राजा

बड़े मेधावी थे
जाने कैसे सूंघ लेते थे ख़तरा
और पैदा होने से पहले मार डालते थे
मगर एक दिन
खुद भी मार डाले गये।

एक और आये
वह भगवान थे
एक और आये
वह शैतान थे।

समंदर को चूस लेने वाले आये
सूरज को ढंक देने वाले आये
कुछ घोड़ों पर कुछ बैलों पर
कुछ गोलों पर कुछ थैलों पर
कुछ खाली आये कुछ भरे हुए
कुछ ज़िन्दा कुछ मरे हुए
मगर सब गये
सबके सब चले गये।

चमको बमको राजा
अकड़ो पकड़ो
जो चले गए वह तुम नहीं थे

और चलाओ गोलियां
और स्वादो मछलियां
चप्पा-चप्पा जमीन नपवा लो
टके-टके पर लिख लो अपना नाम

खाओ गाओ राजा
पीओ जीओ
मस्ती करो राजा मस्ती
दुश्मन के हिस्से जाए पस्ती

भरभराओ राजा
मगर चरमराओ मत

यह बेबस धरती
किसी के साथ गयी तो नहीं
पर तुम्हारे साथ जाएगी
पक्का जाएगी

तुम्हारे साथ नहीं
तो क्या ज़हन्नुम में जाएगी?

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Tuesday, August 19, 2008

अब मैं यहीं ठीक हूं

एक गांव था जो कभी वही एक जगह थी जहां हम पहुंचना चाहते थे
एक घर बनाना चाहते थे ज़‍िंदगी के आख़‍िरी वर्षों की योजना में खाली पड़ी कुल चार कट्ठा ज़मीन पर
एक दालान का नक्‍शा भी था जहां खाट से लगी बेंत की एक छड़ी के बारे में हम सोचते थे
बाबूजी के पास कुछ सालों में नयी डिजाइन की एक छड़ी आ जाती थी
बाबा के पास एक छड़ी उस रंग की थी, जिसका नाम पीले और मटमैले के बीच कुछ हो सकता है
उनके चलने की कुछ डूबती सी स्‍मृतियां हैं जिसमें सिर्फ़ आवाज़ें हैं
खट खट खट एक लय में गुंथी हुई ध्‍वनि
अक्‍सर अचानक नींद से हम जागते हैं जैसे वैसी ही खट खट अभी भी सीढ़‍ियों से चढ़ कर ऊपर तक आ रही है

वही एक जगह थी, जहां जाकर हम रोना चाहते थे
लगभग चीखते हुए आम के बगीचों के बीच खड़े होकर
रुदन जो बगीचा ख़त्‍म होने के बाद नदी की धीमी धार से टकरा कर हम तक लौट आती
सिर्फ़ हम जानते कि हम रोये

थकान और अपमान से भरी यात्राओं में बहुत देर तक हम सिर्फ़ गांव लौटने के बारे में सोचते रहे
सोचते हुए हमने शहर में एक छत खरीदी
सोचते हुए हमने नयी रिश्‍तेदारियों का जंगल खड़ा किया
साचते हुए हमने तय किया कि ये दोस्‍त है ये दुश्‍मन ये ऐसा है जिससे कोई रिश्‍ता नहीं
सोचते हुए ही हमने भुला दिये गांव के सारे के सारे चेहरे

एक दिन गूगल टॉक पर ललित मनोहर दास का आमंत्रण देख कर चौंके
ऐसे नाम तो हमारे गांव में हुआ करते थे
जैसे हमारे पिता का नाम लक्ष्‍मीकांत दास और उनके चचेरे भाई का नाम उदयकांत दास है
स्‍वीकार के बाद का पहला संदेश एक आत्‍मीय संबोधन था

मुन्‍ना चा

हैरानी इस बात की है कि इस संबोधन का मुझ पर कोई असर नहीं था
इस बात की जानकारी और ज़‍िक्र के बावजूद कि संबोधन का स्रोत दरअसल गांव ही है
वो एक लड़का जो मेरी ही तरह गांव से निकल कर अब भी गांव लौटने की बात सोच रहा है

लेकिन अब मैं सोच रहा हूं एक दूसरे घर के बारे में
जो बुंदेलखंड या पहाड़ के किसी खाली कस्‍बे में मुझे मिल जाता
मंगल पर पानी की तस्‍वीरों के बाद
एक वेबसाइट पर मामूली रकम पर
अंतरिक्ष में ज़मीन खरीदने की इच्‍छा भी जाग रही है

अपनों के बगैर की गयी यात्रा में बहुत दूर तक साथ रहीं स्‍मृतियां
जिसमें चेहरे थे और थे कुछ संबोधन
सब छूट गया सब मिट गया अब सिर्फ़ मैं हूं
मेरी उंगलियां कंप्‍यूटर पर चलती हैं आंखें स्‍क्रीन पर जमती हैं
कोई दे जाता है चाय की एक प्‍याली बगल में

मै कृतज्ञ हूं अपने वर्तमान का
पुरानी तस्‍वीरों से भरा अलबम पिछली बार शहर बदलते हुए कहीं खो गया!

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Friday, August 15, 2008

पांच रुपये का चमकता सिक्‍का तब भी हमारी जेब में था

(ज्ञानेंद्रपति से क्षमायाचना सहित)

नौ बरस पहले भोपाल आया था। बारिश के दिन नहीं थे। दिन भर धूप चढ़ी रहती थी। चौराहों के पास दुकानों में पीले पोहे में धंसी हुई धनिया की छोटी-छोटी पत्तियां तब भी हमारी तरफ झांकती थीं। मुझे ज्ञानेंद्रपति ने सुबह सुबह बुला लिया था। इससे पहले हिंदी के इस शानदार कवि से मेरी एकमात्र मुलाकात बनारस जन संस्‍कृति मंच के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन के दौरान 94 या 95 में हुई थी। मेरी कविताएं उन दिनों संभवा में छपी थीं, जिसके संपादक बिहार पुलिस सेवा के अधिकारी ध्रुवनारायण गुप्‍त थे। दिन में हमारा परिचय ज्ञानेंद्रपति से हुआ, तो मैंने काफी आत्‍मविश्‍वास के साथ उन्‍हें बताया था कि मैं कवि हूं और मेरी कविताएं अमुक जगह छपी हैं। रात में कवि सम्‍मेलन था, जिसमें अष्टभुजा शुक्‍ल ने भी कविताएं पढ़ी थीं और ज्ञानेंद्र जी ने संभवा की कविताओं के जिक्र के साथ कविता पढ़ने के लिए मुझे मंच पर आमंत्रित किया था। मैंने एक कविता पढ़ी थी, मुझे आज भी याद है...

गे सजनी पोरुकों ने देलियउ साड़ी तोरा दिबाली मे
छलहुं कतेक बदहाली मे... ना

सभ घर सभ दरबज्‍जा गेलहुं
सजनी नंगटे मुंह छिछिएलहुं
तहियो बीतल पछिला दिन सभ सुनू अकाली मे
छलहुं कतेक बदहाली मे... ना

की होइ छई ई कालाजार
बाबू छोड़ि‍ देलनि संसार
आ हुन कर श्राद्ध केलहुं मां कें सोनक कनबाली मे
छलहुं कतेक बदहाली मे... ना

किछुए खेत हमर बांचल छल
ओकरो एक सांझ लए बेचल
आ सभटा सपना बहल दियादक घर कें नाली मे
छलहुं कतेक बदहाली मे... ना

(प्रिय, माफ करना, पिछली दिवाली में भी मैं तुम्‍हारे लिए साड़ी नहीं ला सका। घर की माली हालत ठीक नहीं थी। सबके दरवाजे गया। सब जगह नंगा होना पड़ा। फिर भी दुख में ही दिन बीते। पता नहीं ये कालाजार क्‍या होता है कि पिता जी स्‍वर्गवासी हो गये। उनका श्राद्ध मां की सोने की कनबाली बेच कर करना पड़ा। थोड़े खेत बचे थे, उसे भी एक शाम की भूख के लिए बेच देना पड़ा। सारे सपने रिश्‍तेदारों के घर से निकलने वाली नाली में बह गये। प्रिय माफ करना, पिछली दिवाली में भी मैं तुम्‍हारे लिए साड़ी नहीं ला सका। घर की माली हालत ठीक नहीं थी।)
ये कविता उन दिनों दिल्‍ली से छपने वाले समकालीन जनमत के एक अंक में छपी। उन्‍हीं दिनों के परिचय का हवाला भोपाल में मिलने पर मैंने दिया, तो ज्ञानेंद्रपति पहचान गये। भोपाल सीएसई की फेलोशिप के चक्‍कर में आया था और आग्‍नेय जी के कहने पर धर्मनिरपेक्षता पर आयोजित वृहद संवाद में रुक गया था। उन्‍होंने होटल में ठहरने का इंतजाम कर दिया था और आने-जाने का एसी किराया भी आवंटित किया था, जिसका एक बड़ा हिस्‍सा मैंने सेकंड क्‍लास स्‍लीपर में सफर करके बचा लिया था।

ज्ञानेंद्रपति भोपाल स्‍टेशन के पास ही किसी होटल में रुके थे। सुबह उनके पास पहुंचा, तो करीब आठ बज रहे थे। वे बेसब्री से मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। हमदोनों निकले और लगभग पूरे दिन भोपाल के चक्‍कर काटते रहे। पैदल। रात हो गयी। जब घर लौटे तो पांव वैसे ही फूले हुए लग रहे थे, जैसे कांवर यात्रा से घर लौटे श्रद्धालुओं के पैर फूले हुए होते हैं। पार्क, मस्जिदों (जिनमें एक ताजुल मस्जिद भी थी), झीलों से गुजरते हुए भोपाल से गले तक भर गये और दूसरी सुबह ज्ञानेंद्रपति के पास जाने की हिम्‍मत नहीं हुई। वे आज भी मेरा इंतजार कर रहे हैं, लेकिन मैं उन्‍हें उतनी फुर्सत से आज तक नहीं मिला हूं।

एक वाकया इसी बीच का है। उसी शाम हमसे एक भिखारी टकराया। हाथ मेरी जेब में चला गया। ज्ञानेंद्रपति ने मेरा हाथ पकड़‍ लिया। भिखारी को डांट कर भगाया और फिर मुझे बुरी तरह डांटा। कहा कि भीख देना कितना बड़ा अपराध है! उस शाम जेब के भीतर मेरी उंगलियों में फंसा पांच का सिक्‍का जेब में ही फिसल गया था।

लेकिन आज इसी भोपाल में मैंने एक बच्‍ची को पांच का सिक्‍का थमाया। भास्‍कर के कॉर्पोरेट एडिटोरियल के स्‍थानीय संपादक मुकेश भूषण के साथ जब मैं एक रेस्‍टोरेंट से दोपहर का भोजन करके निकला, तो आठ-नौ साल की एक बच्‍ची मेरे पीछे-पीछे चलने लगी। मुझे लगा कि पद्मिनी है।

पद्मिनी यूनियन कार्बाइड की विनाशलीला में नष्‍ट हो गयी उड़‍िया बस्‍ती की वो बच्‍ची थी, जो अपने पिता के साथ भोपाल आयी थी और एक शाम घर के प्‍यारे तोते को पका कर घर के लोगों ने जब कई दिनों की अपनी भूख मिटायी, उसके अगले दिन से पद्मिनी बस्‍ती के दोस्‍त भाइयों के साथ रेलों में झाड़ू लगा कर पैसे जुटाने लगी। एक बार बनारस स्‍टेशन पर वो अकेली रह गयी, तो जिस्‍म के दलालों ने उसे वेश्‍या मंडी में पहुंचाना चाहा। लेकिन बहादुर पद्मिनी उन्‍हें चकमा देने में सफल हो गयी। पद्मिनी इन दिनों मेरी रूह में बसी हुई है, क्‍योंकि डोमिनीक लापिएर और जेवियर मोरो की किताब भोपाल बारह बज कर पांच मिनट मेरे साथ हमेशा रह रही है।

मैं इस बात में यकीन करता हूं कि किसी वंचित पर इस तरह दया दिखाने से कुछ भी नहीं बदलेगा। इसके बावजूद मैं इन्‍हें अब यूं ही सामान्‍य नजरों से नहीं देख सकूंगा। मेरे पांच रुपये इनकी किस्‍मत की तारीख नहीं लिखेंगे - लेकिन चंद मिनटों के लिए ही सही, किसी की आंखों में चमक और रोशनी और उम्‍मीद तो उतार ही सकते हैं।

इसलिए मैंने तय किया है कि अब मैं ज्ञानेंद्रपति की बात नहीं मानूंगा।

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Saturday, July 5, 2008

शुक्रिया कहने की इजाज़त चाहूंगा सर

यह एक बड़े पुरस्‍कार की तरह है। आज जनसत्ता में शिक्षाशास्‍त्री और एनसीईआरटी के निदेशक कृष्‍ण कुमार ने लिखने के रियाज़ में लगे मुझ जैसे अल्‍पज्ञात लेखक को तवज्‍जो दी है। पहले इसी ब्‍लॉग पर छपे रैंप पर अंतिम औरत का इतिहास और बाद में जनसत्ता के ‘दुनिया मेरे आगे ’ स्‍तंभ में ‘वह आख़‍िरी औरत ’ शीर्षक से छपे निबंध को पढ़ कर उन्‍होंने मुझे फोन किया था। फोन पर उन्‍होंने जिस तरह की खुशी ज़ाहिर की, उसे बताना मेरे लिए असमंजस की तरह था। मुझे लगता था कि जो मेरे उल्‍लास, मेरी खुशी को ‘अपने मुंह मियां मिट्ठू ’ के मुहावरे वाले झोले में नहीं रखेंगे, उन सबको मैंने बताया कि कृष्‍ण कुमार जी ने मुझे कंप्‍लीमेंट दिया है। बाद में मैंने पता लगा ही लिया कि अपूर्वानंद से उन्‍होंने मेरा फोन नंबर जुटाया था। मैंने उन्‍हें याद दिलाया कि 97-98 के साल में कुछ दोपहरी और सांझ मैं आपके यहां आता था। लेकिन मिलने-जुलने को लेकर मेरे निरुत्‍साह में एक लंबा अरसा यूं ही गुज़र गया। कृष्‍ण कुमार जी ने जनसत्ता में फोन पर की गयी उस प्रशंसा को जिस तरह से सार्वजनिक किया है, उसे पढ़ कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। जिन शहरों में जनसत्ता नहीं जाता है और जो जनसत्ता के पाठक नहीं हैं - उनके लिए कृष्‍ण कुमार जी का आलेख मैं दिल्‍ली-दरभंगा छोटी लाइन पर भी डाल रहा हूं।

मुक्ति की चाल

कृष्‍ण कुमार

हर शब्‍द अपने भीतर एक छोटा-सा इतिहास समाये रहता है, यह बात मुझे मालूम थी, पर यह समानांतर सत्‍य - कि शब्‍द में भविष्‍य भी झिलमिलाता है - मेरे लिए इसी पखवाड़े खुला। इस अख़बार में ‘दुनिया मेरे आगे’ एक स्‍तंभ छपता है, जिसमें कभी-कभी कुछ ग़ैरनिष्‍कर्षी गद्य पढ़ने को मिल जाता है। आठ-दस दिन पहले इस स्‍तंभ के तहत अविनाश की टिप्‍पणी पढ़ कर उस ख़बर का खुलासा मेरे लिए थोड़ी देर से हुआ, जो कई दिन पहले अख़बारों में सचित्र आ चुकी थी। ख़बर उन औरतों के बारे में थी, जो सुलभ इंटरनेशनल की पहल और मदद से मैला उठाने के काम से हटायी जा सकी हैं। अलवर की ये महिलाएं संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा घोषित ‘सफाई वर्ष’ के अंतर्गत न्‍यूयार्क में होने वाले एक कार्यक्रम के लिए चुनी गयी हैं। इस कार्यक्रम का एक तरह का पूर्वाभ्‍यास, जो दिल्‍ली में हुआ, अविनाश के संक्षिप्‍त निबंध का विषय था।

अविनाश के निबंध का शीर्षक ‘वह आख़‍िरी औरत’ सतह पर महात्‍मा गांधी के मशहूर उद्धरण की गूंज लिये था, जिसमें उन्‍होंने आख़‍िरी आदमी की फिक्र की ज़रूरत बतायी है। मगर शुरुआती पैरा सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम के मंच और अगला पैरा गांव को शहर से जोड़ने वाली कंकरीली पगडंडी पर बचपन में बाबूजी द्वारा देख लिये जाने के बारे में था। शेष लेख में उस कैटवॉक का चित्रण था, जो अलवर की महिलाओं ने भारत के विख्‍यात फैशन मॉडलों के साथ सीरीफोर्ट सभागार के मंच पर की। इंटरनेट पर विकीपीडिया देख कर अविनाश यह पता लगा चुके थे कि कैटवॉक उस नुमाइशी चाल के लिए इस्‍तेमाल किया जाने वाला शब्‍द है, जो कपड़ों के नये फैशन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित की जाती है। मैला ढोने जैसा काम करने वाली महिलाएं नीली साड़ी पहन कर, अमीर मॉडलों के साथ चलीं, फिर अमेरिका जाकर वहां भी कैटवॉक करेंगी। अविनाश ने इस प्रसंग की जटिलता को बड़ी संभली हुई तराश के साथ याद किया था। लेख के आख़‍िरी हिस्‍से में एक अधूरी खुशी के आंसू भी थे, एक बड़े-से अंधेरे की घुटन भी, और एकदम अंत में मेरे जैसे कस्‍बाई संस्‍कार वाले लोगों को महानगर में पीढ़ी-दर-पीढ़ी राहत देता आया समोसा भी बदस्‍तूर मौजूद था। इस तरह वह लेख नहीं, पूरी दुनिया थी।

परसों वह दुनिया न्‍यूयार्क में साकार हुई। संयुक्‍त राष्‍ट्र के उच्‍च पदासीन अधिकारियों के सम्‍मुख वह कैटवॉक अपनी पूरी शोभा सहित संपन्‍न हुई। अलवर की औरतों का मुक्‍त गीत विश्‍व की समाचार एजेंसियों की ख़बर बना। अंतत: मेरा भी मन हुआ कि पुस्‍तकालय के वृहद शब्‍दकोश में कैटवॉक का अर्थ देखूं। फैशन परेड वाला अर्थ सबसे पहले दिया गया था, जिसके तहत मॉडल नये कपड़े पहने एक उठी हुई सतह पर दर्शकों और कैमरे के सामने चलती हैं। इसके बाद भी कई अर्थ दिये थे। मुझे उन सभी अर्थों को पढ़ना ज़रूरी लगा, क्‍योंकि बिल्लियों में मेरी दिलचस्‍पी बचपन से रही है। मैं यह जानने को उत्‍सुक था कि फैशन की दुनिया में बिल्‍ली कैसे शामिल हो गयी। भाषा के इतिहास में चले किसी अनोखे खेल के नियम समझने की जिज्ञासावश मैंने पत्‍नी से कहा कि वे शब्‍दकोश की महीन छपाई पढ़ें, क्‍योंकि मेरी आंखों में इतनी रोशनी नहीं है।

शब्‍दकोश में लिखा था कि ‘कैटवॉक’ मूलत: संकरे पुलनुमा ढांचे को कहा जाता था, जिसे निर्माणाधीन इमारतों में, जहाजों और रेलों में मज़दूरों और सफाई कर्मचारियों के लिए बनाया जाता है। लकड़ी, बांस या धातु का यह संकरा ढांचा ऊंचाई पर स्थित छज्‍जों या पानी की टंकियों तक पहुंचने में मदद करता है। टंकी साफ करके कर्मचारी के लौट आने के बाद ढांचा हटाया जा सकता है। इसे कैटवॉक कहते थे। पीछे बिल्‍ली की तरह संभल कर कदम रखने और चौकन्‍ना रहने की ज़रूरत है।

इस सघन अर्थछाया के आलोक में अलवर की मैला ढोने वाली औरतों का पहले दिल्‍ली, फिर न्‍यूयार्क में प्रायोजित कैटवॉक थोड़ा दूर तक देखा जा सकता है। फैशन मॉडलों के साथ कैटवॉक की उपयुक्‍तता प्रायोजकों को संभवत: इसलिए सूझी होगी, क्‍योंकि मैला ढोने से मुक्‍त किये गये ये इंसान नारी थे, पुरुष नहीं। कपड़ों के नये फैशन का विज्ञापन करने वाली कैटवॉक मुख्‍यत: औरतों की परेड रही है, आदमी अभी-अभी और बहुत कम संख्‍या में आने शुरू हुए हैं। मैला ढोने वाली महिला को शख्सियत मिली, अविनाश के लेख में आये आंसू इसी बात की खुशी के थे। शख्सियत एक ऐसे आयोजन से मिली, जो भूमंडलीकरण के युग में नारी की घुटन के अभूतपूर्व विस्‍तार से जुड़ा है, यह बात उसी अंधेरे का ख़ौफ़ पैदा करती है, जो जनगढ़ सिंह श्‍याम ने जापान की व्‍यापारिक आर्ट गैलरी में अपनी आदिवासी आंखों के एकदम सामने महसूस किया होगा। जानकार लोग कहते हैं कि कैटवॉक कर रही औरत को अपनी आंखों में वही भाव लाना सिखाया जाता है, जो उमंग के साथ कंघी कर रहे किशोर के चेहरे पर स्‍वाभाविक रूप से इस सोच के साथ आ जाता है कि कोई मुझे देख रहा है। संकरे, रपटे या मुंडेर पर चल रही बिल्‍ली में यह भाव नहीं होता। पर बिल्‍ली मनुष्‍य को क्‍या-क्‍या सिखाये। हजारों साल के साहचर्य के बाद भी वह मानव को यह नहीं सिखा सकी कि आत्‍मसम्‍मान एक ऐसा भाव है, जो कहीं और जाकर नहीं, यहीं व्‍यक्‍त होना चाहिए और अपने ही मन और देह में प्रकटना चाहिए, मुजरे के दर्शकों की आंखों से नहीं।

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