Sunday, May 27, 2007

शहर था शहर नहीं था

हर टोले में एक पोखरे वाला शहर था। उनमें एक तरफ भैंसें अपनी पीठ को काले टापू की तरह उगाये खामोश बैठी रहती थीं। दूसरी तरफ हल्‍की काई वाले चबूतरे पर कपड़े पीटती स्त्रियों के दृश्‍य के बावजूद दोपहर वीरान होती थी। इसी वीरानी में बीड़ी का धुआं छोड़ते चंद चेहरे कुछ तलाशते रहते थे। शायद प्‍यार। रहस्‍य से भरे रिश्‍तों की खुशबू। कंकड़ वाली सड़क पर सोने का एक सिक्‍का। या शायद कुछ भी नहीं। ये उन लोगों की दुनिया थी, जो जवान और अधेड़ थे। बचपन उन शहरों में रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे भागता था। बरसाती नालियों में बंसी गिरा कर मछलियों की लालसा के पीछे भागता था। उस बचपन में कॉमिक्‍स का भी दखल था। पतली सी रंगीन किताबें हाथ से हाथ होते हुए ग़ायब हो जाती थीं। फिर भी किस्‍से कम नहीं होते थे। उन किस्‍सों की तादाद किसी को याद नहीं। लेकिन शायद वे सैकड़ा पार नहीं कर पाये होंगे, और बचपन ख़त्‍म हो गया होगा।

(बहुत सारी चीज़ें इसी तरह ख़त्‍म हो जाती हैं। स्‍मृतियां भी। कोई ये कहे कि पुराने एक एक पल का हिसाब उसके पास है, तो यक़ीन मत करना। इतिहासकार कड़ी मेहनत के बाद अतीत की कड़ि‍यां जोड़ता है, फिर भी उसकी तरफ संदेह के सैकड़ों तीर तने रहते हैं। दुनिया की महान स्‍वीका‍रोक्तियां भी किसी शख्‍स का पूरा सच नहीं बयान कर सकी हैं। सच और झूठ के सांप-सीढ़ी वाले खेल की तरह चलने वाली ज़‍िन्‍दगी से चुन कर अगर मैं आपको कुछ कहानियां सुनाऊं, तो आप अपनी कसौटियों पर तौल कर ही यक़ीन करना। पात्र और उससे जुड़े हादसे अक्‍सर रुलाने के लिए रचे जाते हैं। और जो रचा जाता है, वो वास्‍तविक नहीं होता। इसलिए अपने आंसू बचाकर उन वास्‍तविक ज़‍िन्‍दग‍ियों के लिए रखना, जिनके लिए रोकर हम अपनी करुणा को एक अर्थ दे सकते हैं।)

एक स्‍कूल था, महाराजा लक्ष्‍मेश्‍वर सिंह अकादमी। चमकती हुई समानांतर खड़ी दो इमारतें और जहां इनके आख़‍िरी कमरे बने थे, वहां बीच में लाल रंग का एक भवन था। यहीं ख़ाली वक्‍त में शिक्षक बैठते थे। फीस यहीं जमा होती थी। प्रिंसिपल इसी भवन से निकल कर कैंपस में आता था। नोटिस इसी भवन के बरामदे की दीवार पर जालियों वाले फ्रेम में टंगते थे। सुबह, आकाश में कतार बना कर फिसलते पंछियों की तरह, धीरे-धीरे बच्‍चे स्‍कूल में घुसते थे। दोपहर बाद और शाम के दरवाज़े पर खड़ी धूप के वक्‍त उफनती नदी की तरह बाहर निकलते थे। कुछ गणेशी भूंजा वाले के यहां मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए 25-25 पैसे आगे बढ़ाते थे, कुछ आलू कट के मसालेदार स्‍वाद पाने के लिए बूढ़े होते बनारसी की तरफ दस-दस पैसे निकालते हुए बढ़ते। सामने से एक साम्राज्‍य की तरह खड़ा स्‍कूल अंधेरा गहराते तक ढहने लगता था।

चूंकि हमारा घर उसी टोले में था, हम अक्‍सर अपना अंधेरा स्‍कूल की टूटी चाहरदीवारी से फांदकर लाल रंग के भवन के पीछे बटोरते थे। वहां कुछ पुराने कमरे थे, जिसकी ईंटें हमेशा उखड़ती रहती थीं। उन कमरों में कुछ पीली देह, एक लालटेन और मच्‍छड़दानी स्‍थायी रूप से रहती थी। ये वे लड़के थे, जिन्‍हें हॉस्‍टल मिला हुआ था। खाना ये खुद बनाते थे, स्‍टोव जला कर। इनका घर गांवों में था- और माता-पिता की अदम्‍य इच्‍छाओं और कुछ अपनी हसरतों ने इन्‍हें इस छोटे से शहर में ऐसी ज़‍िन्‍दगियां जीने के लिए मजबूर किया था। सरकारी स्‍कूल में पैसा नाममात्र लगता था, इसलिए तमाम मुसीबतों का होना भी इनके लिए अदृश्‍य भाव की तरह था। ये ऐसे जीते थे, जैसे ज़‍िन्‍दगी अभी-अभी इनके हाथ से फिसल कर जाने वाली है।

फिर भी ज़‍िन्‍दगियां जाती थीं। हॉस्‍टल में एक साल के भीतर तीन लड़कों ने खुदकुशी की। या उन्‍हें मारा गया- इलाक़े में ऐसी भी चर्चा होती थी। जब जब ये वारदात हुई, स्‍कूल बंद कर दिया गया और पुलिस का पहरा उन टूटी चाहरदीवारियों पर लगा दिया गया, जिससे हम उधर झांक भी नहीं पाएं। दूसरों की तरह हमने भी उन वारदातों का किस्‍सा भर सुना। ऐसे किस्‍सों के कई कई पाठ एक ही समय में रच लिये जाते हैं। उन तमाम पाठों के बीच अब तक हमारी जिज्ञासाएं शांत नहीं हुईं कि आख़‍िर हुआ क्‍या होगा। हमने एक उम्र तक कोशिश भी नहीं हकीक़त जानने की। वे मौतें भुला दी गयीं। एक छोटे शहर की ज़‍िन्‍दगी में भी, पुलिस की फाइलों में भी और इंसाफ़ के शोर-शराबों में भी।

हम कोशिश करेंगे कि आपको ठीक-ठीक बता पाएं कि उस छोटे शहर में वक्‍त कैसे बीतता था, लोग कैसे जीते थे, साइकिल कैसे चलती थे, चौराहे कितने वीरान होते थे और ठीक-ठीक कितना इत्‍मीनान होता थे और इस सुकून में मुल्‍क के हादसे कैसे शेयर किये जाते थे। लेकिन इसके लिए हमारे साथ थोड़ा-थोड़ा वक्‍त बीच-बीच में आपको बिताना होगा।

(शीर्षक राजकमल चौधरी के उपन्‍यास से साभार)

4 comments:

Life On The Edge said...

वाकई हमें इंतज़ार रहेगा। इस शहर की कहानी का। वो लाल इमारतें भी हमने भी देखी है। लेकिन तब तक दिमाग़ थोड़ी मोटी हो चुकी थी। एहसास उतने कोमल नहीं थे। वक़्त के थपेड़ों ने सोच का रास्ता मोड़ दिया था। कुछ कहानियां यहां भी हैं लेकिन अलग तरह की। आपकी कहानियों से पहले निपट लूं। अगली क़िश्त जल्द लाएं।
-ओम
http://kharikhoti.wordpress.com

Pramod Singh said...

दुरुस्‍त हे.. लगे रहो.. बहुत बहकियाये-महटियाये नहीं तो अच्‍छा माल हाथ चढ़ेगा..

ganeshG said...

nice

ganeshG said...

nice