Thursday, May 3, 2007

हिंदी समाज के भविष्‍य का दुख

हमारे एक दोस्‍त को देखकर मैं सन्‍नाटे में आ जाता हूं। वो हमेशा दिप-दिप आत्‍मविश्‍वास से दमकते रहते हैं। कोई बात कहते हैं तो लहज़ा ये होता है कि यही एक बात है, जो कही जा सकती है, वरना सब बेकार की बातें करते हैं। हमारे आसपास ऐसे आत्‍मविश्‍वास वाले लोग बहुतायत में पाये जाते हैं। उन्‍हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कोई अरुंधति राय कहां-क्‍या लिख रही है, या स्त्रियों को प्रसव के दर्द से थोड़ी राहत देने वाली वाटर बेबी कैसे पैदा होती है। वे फूलों और बल्‍वों से सजे मंडप में वर-वधू को अक्षत छींटते हैं, तो लगता है जैसे कठिन छंद वाली कविता लिख दी हो। कहने का मतलब... ये जो आत्‍मविश्‍वास उन्‍हें सुखी रखता है, वो हिंदी समाज के भविष्‍य का दुख है।

इस दुख को बढ़ाने में मैं भी एक कड़ी हूं। मैं जो एक संशय में हमेशा रहता हूं। ये संशय है अपने घोर अधूरेपन का। शब्‍दों से एक शांत किस्‍म के अपरिचय का। अपनी उस कद-काठी का, जो दस लोगों के बीच और कमज़ोर नज़र आती है। इतना खाली होकर कोई किसी भाषा में सोच तो सकता है, लेकिन उसे काग़ज़ पर चढ़ा पाना अक्‍सर आसान नहीं होता। पसीने छूटते हैं। सोचना अधूरे वाक्‍यों में होता है और कहना पूरे वाक्‍यों में। हिंदी की दिक्‍कत ये है कि जो पूरा वाक्‍य सिरजना जानते हैं, वे सोचना नहीं जानते। और जो सोचना जानते हैं, उन्‍हें अधूरे वाक्‍यों की काबिलियत की वजह से चुप रह जाना पड़ता है।

पूरा वाक्‍य लिखने लायक अभ्‍यास और उत्‍साह भी हिंदी समाज के पास नहीं है। होता, तो प्रतिरोध और लोकतंत्र की व्‍यापक ललक होती। कहानियों-कविताओं में लालित्‍य दिखता है, कला दिखती है। कभी बेलौसपन दिखता भी है, तो वहां सोच-विचार का अनुशासन ग़ायब रहता है। हमारी बेचैनी भी उस वक्‍त हवा हो जाती है, जब लगातार सोचने के बाद कुछ लिखने बैठते हैं और कोई दोस्‍त आता है तो कहकहे में लग जाते हैं। प्राथमिकताओं से वंचित हमारा निजी समय भी हिंदी समाज के भविष्‍य का दुख है।
आइए, हिंदी के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए हम उस दोस्‍त को विनम्रतापूर्वक घर से जाने के लिए कह दें, जो बेवक्‍त आ गया है। वो जैसे ही किवाड़ से बाहर हो, हम ज़ोर से आवाज़ करने की हद तक किवाड़ बंद कर दें, ताकि विदाई के वक्‍त का दुख उस शोर से चनक कर टूट जाए। विचारों की वो फेहरिस्‍त बिना किसी भावुक व्‍यतिक्रम के बढ़ती रहेगी।

क्‍या मैं यह सोचते हुए असंवेदनशील हो रहा हूं? और क्‍या महान रचने के लिए संवेदनशील होना ज़रूरी है?

अगर आपकी हैसियत राह दिखाने की हो, तो कृपा कर दिखाएं।

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