बंगाल की सरहद में पहुंचे तो धूप खिल चुकी थी। जाड़ा था। नौ बजते-बजते रेल हावड़ा जंक्शन पर रेंगते हुए रुक गयी। प्लेटफार्म पर ही कई सारी गाड़ियां लगी थीं। पीली टैक्सियों वाले कोलकाता में हमारी दिलचस्पी चौरंगी देखने की थी। शंकर का ये नॉविल हमें जीवकांत जी ने पढ़ाया था। जीवकांत मैथिली के बड़े राइटर हैं। मधुबनी ज़िले में झंझारपुर के आगे घोघरडीहा जंक्शन से सटा उनका गांव है- डेओढ़। हम अक्सर वहां जाकर उनके साथ वक्त बिताते थे। झोले में भर-भर कर किताबें ले आते थे।
अपने आख़िरी कुछ दिन मां मेरे साथ थी। पटना में। हमने उसे चौरंगी पढ़ायी थी। हार्डबॉन्ड संस्करण पर जीवकांत जी का स्टांप लगा हुआ था। अब वो प्रति पता नहीं किसके पास है। मां नशे की तरह पढ़ती थी नॉविल। दूसरी कक्षा तक पढ़ी थी और जासूसी उपन्यासों की दीवानी थी। मुझे ख़त लिखती थी। मेरे मन में लेखकों के चित्र की तरह मां का चित्र है। उंगलियों में फंसी हुई बीड़ी होंठों के बीच टिकी हुई। दूसरे हाथ में नॉविल। इस वक्त आसपास कितना भी शोर हो, उसे फर्क नहीं पड़ता था। हम किताब के पीछे, मां के कानों के पास हाथ-हाथ हिला-हिला कर उसकी एकाग्रता की परीक्षा लिया करते थे। चौरंगी पढ़ कर उसे अच्छा लगा था।
चौरंगी से गुज़रते हुए हम टेलीग्राफ के दफ्तर पहुंचे। उत्तम दा तब इस अंग्रेज़ी अख़बार के झारखंड संस्करण के एडिटर थे। उनसे पुराना राब्ता था। पटना के गर्दिश भरे दिनों में उन्होंने सहारा दिया था। ऊंची चमकती हुई बिल्डिंग में घुसने से पहले हमने दो महिलाओं को बाहर सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए देखा। एक आधी उम्र की थी, दूसरी नवयौवना। मैं दो मिनट ठहर कर इन्हें सिगरेट के संग-साथ में देखना चाहता था, लेकिन तहजीब में बने रहने की आदत ने फ़रमाया- ये ग़लत बात है।
सन 98 की जनवरी या फ़रवरी में दिल्ली में एक आधी रात प्रथमा बनर्जी के साथ थे। स्त्री संदर्भ के किसी लेख पर वो काम कर रही थीं और मैं अपनी बुद्धि भर उन्हें मदद कर रहा था। उस वक्त देशकाल के स्वर्ण जयंती विशेषांक के संपादक समूह में होने की हैसियत से उनका संग-साथ मिला था। उस आधी रात में उन्होंने दर्जनों सिगरेट जलायी-बुझायी होंगी। मैं थोड़ा चकित-विस्मित, जबकि मां को मैंने बरसों बीड़ी पीते हुए देखा था। आधुनिक स्त्रियों की ज़िंदगी में धुएं के इस दिलक़श नज़ारे से पहली बार परिचय हो रहा था।
हां, बीच में मोहब्बत की वजह से एक चक्कर मुंबई का लगा, तो अनीश भाई के जन्म दिन की पार्टी में ढेर सारी सिने-बालाओं को सिगरेट और शराब के साथ अंतरंगता बरतते देख कर नज़र चकरा गया। अब तो एनडीटीवी के स्मोकिंग ज़ोन में हर वक्त सिगरेट और दोस्तों से चिपकी हुई स्त्री सहकर्मियों को देख कर भी आंख निर्भाव ही बनी रहती है।
मेरी मां बीड़ी पीती है - पहली बार ये ज़िक्र मैंने अपने शहर के एक बुद्धिजीवी के सामने छेड़ा, (जो अच्छी-दुरुस्त हिंदी के हिमायती थे) तो वे बिफर पड़े। मुझे शराफत सिखायी। कहा कि अपने पूर्वजों के लिए सम्मानजनक भाषा होनी चाहिए। उनकी आदतों के ऐसे ज़िक्र से हमें बचना चाहिए। उसके बाद बरसों मैं सचमुच इस ज़िक्र से बचता रहा। अब जबकि स्त्रियां और धूम्रपान हमारी ज़िंदगी से जुड़े रोज़मर्रा के दृश्यों में शामिल है- मुझे ये बताते हुए दिक्कत नहीं हो रही है कि मेरी मां बीड़ी पीती थी।
मेरी दादी भी बीड़ी पीती थी, लेकिन वो पत्ते झाड़ कर तंबाकू भरती थी और अपनी बीड़ी खुद तैयार करती थी। हमारे यहां एक लकड़ी का मोटा-सा कठौत उनकी बीड़ी के पत्ते रखने के लिए होता था, जो उनके इंतक़ाल के बहुत दिनों बाद तक गांव के घर में दिखता था। अचानक एक दिन दिखना बंद हो गया। मेरी मां बाज़ार से बीड़ी मंगवाती थी। बाबूजी मां के लिए बीड़ी लाते थे। बड़े होने के बाद ये हमारा काम हो गया था।
जन संस्कृति मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन बनारस में था। दरभंगा से हमारी सांस्कृतिक टोली के प्रतिनिधि को भी हिस्सा लेना था। मेरी इच्छा थी, लेकिन संजीव स्नेही को भेजने का इंतज़ाम किया गया। वे दोस्त थे, लेकिन कसक मेरे दिल में थी। मैं यूं ही चल पड़ा। पटना से मुग़लसराय और फिर वहां से बनारस। पटना में संजीव स्नेही मिल गये थे। मुग़लसराय जंक्शन पर टीटीई ने धर लिया, तो मेरा जुर्माना भी संजीव स्नेही ने ही भरा। वहां कलकत्ता की एक रंग टोली भी आयी थी, जिसने मस्त कोरस सुनाया था- समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आयी। उनमें से एक बीड़ी पीते थे और उनके पास कई बंडल था। हमने रिक्वेस्ट करके एक बंडल मांग लिया कि मेरी मां बीड़ी पीती है, उसके लिए। उन्होंने खुशी-खुशी दे दिया।
बंगाल की बीड़ी ले जाकर मैंने मां के हाथ में रख दी। उसकी आंखों में आंसू थे। खुशी के या अपराधबोध के, कह नहीं सकता - लेकिन बाद में बीड़ी की वजह से उसके दोनों फेफड़े गल गये। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। तीन भाइयों में सबसे छोटी बहन थी मेरी मां। उनका बड़ा भतीजा, मेरे ममेरे भाई अमेरिका में डॉक्टर हैं। उनके पास पूरी रिपोर्ट भेजी गयी और जिस सुबह उनका फोन आया - मां गुज़र चुकी थी।
बीड़ी की आदत का किस्सा कुछ यूं सुनाया था मां ने कि उनकी बुआ बीड़ी की तलबगार थी। उनके लिए अक्सर चूल्हे से जला कर बीड़ी मां ही ले जाती थी। जब सात साल की रही होगी, तभी बीड़ी जलाने और बुआ के हाथ में थमाने के बीच रास्ते में एकाध कश ले लिया और फिर कई बार बीड़ी जला कर बुआ को थमाने के बीच रास्ते में कई-कई क़श। धीरे-धीरे चेन स्मोकर हो गयी। घर में सबको पता चल गया। शादी ठीक हुई, तो छुड़वाने की कोशिश की गयी। लेकिन इस कोशिश में मां बीमार पड़ गयी, तो नाना ने मां को बीड़ी से दूर नहीं रहने देने का सख्त एलान कर दिया।
शादी के बाद विदाई हुई, तो साथ आने वाली कमनाहरि (टहल-टिकोला करने वाली) केले के थंब में छिपा कर बीड़ी लेती आयी। इस तरह नइहर से ससुराल तक मां की बीड़ी आयी, जो उनकी मौत तक साथ रही। 7 जुलाई 1999 को मां का इंतकाल हुआ।
आठ साल बाद ओमकारा (2006) में बीड़ी जलाय ले गीत सुना, तो मां की याद आयी। याद भी बड़ी कमीनी चीज़ होती है। गीत का संदर्भ क्या है और याद किसकी आयी! ख़ैर, मन की ऐसी नियतियों का क्या किया जाए? मेरी अपनी यादों के बहाने आपकी खिदमत में पेश है ये गीत...
Tuesday, November 13, 2007
बीड़ी जलाय ले जिगर से पिया!
Posted by Avinash Das at 5:28 PM
Labels: स्मृतियों की अनुगूंजें
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6 comments:
बीड़ी पीते हुए उपन्यास पढ़ना ...अपनी अपनी आदतें होती हैं जो छूटे नहीं छूटतीं। बहरहाल आपका ये बीड़ी संस्मरण अच्छा लगा।
यादों का कमीनापन परस्पर असंबद्ध चीजों को ऎसे ही जोड देता है ! स्मृति की इसी क्रूरता और विश्वासधात से कई बार अच्छी रचनाओं का जन्म हो जाता है !
इस पूरे संस्मरण में जो सबसे बेहतरीन लगा वो थी आपकी स्वीकारोक्ति। कई ये और ऐसी कई बातें छुपाना ज्यादा पसंद करते हैं। परिवार और आपकी बीती जिंदगी कैसी भी हो,लेकिन उसे स्वीकार करने का साहस होना ज्यादा मायने रखता हैं। पिताजी कहते है, कई बार अतीत गर्व करने लायक नहीं होता है, लेकिन सबक लेने लायक हमेशा ही होता है।
दीप्ति।
बहुत अच्छा लिखा है भैया आपने.. बड़ी माँ की याद आ गई.. उनका हमारे प्रति स्नेह भी याद आ गया.. अभी आया था कुछ जरूरी काम कराने पर आपका ये पोस्ट देख कर वो सब छोड़ कमेन्ट लिखने बैठ गया..
"याद करने पर बीता हुआ सुख भी दुःख ही देता है....." और क्या कहूं.......
अविनाश जी,
बीड़ी वाली बात ने मुझे भी अपने अतीत में पटक दिया...
जब हम लोग रांची में रहने लगे पापा की नौकरी की वजह से, तो दादी मुजफ्फरपुर छूट गयीं, हमारे गाँव...
फ़िर उनकी हालत बिगाड़ने लगी तो पापा ने उनके स्वास्थ्य-लाभ के लिए रांची बुलवा लिया....
हमारे साथ रहने के लिए, दो कमरों के किराए के मकान में....हम चार-भाई बहनों को तो लगा कि जैसे हमसे हमारा एक कोना छिन गया.....खैर, दादी को उन्ही दो कमरों में खिड़की के पास की जगह मिली...वो खासती थीं, तो रात को उन्हें थूक फेकने के लिए खिड़की मिली थी....खिड़की के उस पार व्यस्त गली थी..रात में तो फ़िर भी चल जाता था, मगर दिन में दादी जब खिड़की से बाहर खखारती थीं, अक्सर किसी का माथा या आस्तीन भेंट चढ़ जाता था...फ़िर हमारे मकान-मालिक को शिकायतें जातीं, फ़िर हम दादी को मुजरिम की तरह दबाड़ते....लेकिन कुछ ख़ास नहीं बदला.....
मैं तो सबसे छोटा था, इसीलिए दादी मेरे मनोरंजन का हिस्सा भर थीं....मुझे पापा पार भी गुस्सा आता की क्या ज़रूरत थी इन्हे उठा लाने की...गुस्सा तब और चढ़ता जब दादी मुझसे ही अपनी बीड़ी लाने को कहती....मैं साफ मना कर देता तो मेरी माँ मुझसे मनुहार करती....मैं खीज कर दादी की खुराक ला देता...
फ़िर जब कभी हम चारों भाई-बहन एक साथ मूड में होते तो दादी को तबाह कर देते...कोई उनके बाल खींच लेता, तो कोई उन्हें बुढ़िया वगैरह कहकर उनकी आदतें दुहराता....लेकिन उनके जमकर बीड़ी पीना मुझे कभी रास नहीं आया....न ही उनका बात-बात पार हमें आशीष देना....ख़ास कर तब, जब हम सबसे ज्यादा गुस्से में होते.....
फ़िर एक दिन शायद पापा को लगा कि दादी का हमसे तालमेल गड़बड़ है तो दादी को वापस गाँव जाना पड़ा...फ़िर कुछ ही महीनों में उनके मरने की ख़बर आई.....वो भी होली की शाम को....मम्मी-पापा रो रहे थे....मुझे समझ नही आ रहा था, क्या करूँ....मैं रोया नहीं, मगर लगा कि जैसे दादी कुछ दिन और जी सकती थीं, शायद..........
निखिल आनंद गिरि
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