Sunday, May 22, 2016

बुलाकी साव की नौवीं कविता

खाजासराय (लहेरियासराय, दरभंगा) में एक मिडिल स्‍कूल है, जहां मेरी बहन पढ़ती थी। मेरे गांव से उस स्‍कूल की दूरी लगभग दो किलोमीटर है। गांव से बहन अपनी सहेलियों के साथ स्‍कूल जाती थी। बरसात का महीना था। बागमती अपने उफान पर थी। बहन स्‍कूल के लिए निकली, तो मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। उस वक्‍त तक मैं स्‍कूल नहीं जाता था। गांव में ही कुइरा गुरुजी से पहाड़ा सीखता था। मैंने ज़ि‍द पकड़ ली कि बहन के साथ मुझे भी स्‍कूल जाना है। मेरा रोना देख कर बहन पसीज गयी और मुझे अपने साथ ले गयी। बीच में लवटोलिया (नवटोलिया) के पास एक नाला बहता था, जो आम तौर पर सूखा ही रहता। लेकिन बरसात थी तो नाले में पानी था। उसे टपना पड़ता था। बहन ने मुझे गोद में लिया और सहेलियों के साथ पानी में उतर गयी। मिट्टी गीली थी और पांव फिसल रहे थे। बहन की सहेलियां तो टप गयीं, लेकिन बहन एक जगह गिर गयी। उसकी सलवार और कमीज़ पानी और मिट्टी से भीग गयी। उसने मुझे बचा तो लिया, पर मैं भीतर से पूरी तरह डर गया था। उन दिनों बुलाकी साव की झोंपड़ी वहीं नाले के उस पार थी। झोंपड़ी के बाहर एक चापाकल लगा था। बहन ने वहीं अपने कपड़े साफ किये। स्‍कूल जाने का मेरा सारा उत्‍साह मर गया और मैं फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा। मुझे स्‍कूल नहीं जाना था। बुलाकी साव ने ही मुझे हमारे आंगन तक पहुंचाने का जिम्‍मा लिया। बहन और उनकी सहेलियां स्‍कूल चली गयीं। बुलाकी साव ने मुझे कंधे पर बिठाया, नाला पार किया और हमारे आंगन की ओर चल पड़ा। पूरे रास्‍ते मैं उसके कंधे पर बैठा रहा। हल्‍की हल्‍की बारिश हो रही थी और वह रस्‍ता भर एक कविता गुनगुना रहा था। चूंकि वह बच्‍चों के लिए कविता नहीं सोच पाता था, उसने लोकधुन की राह पकड़ी। मुझे उस कविता की गुनगुनाहट अब भी याद है।

बोलो एक दो तीन

मेरा सैयां नमकीन

चले चार कोस रोज धरे हीरो का पोज

जैसे एस्‍नो-पाउडर वैसे चम चम चम ओज

धनुकटोली का पंच खाये बाभन का भोज

छिपा ननदों के बीच उसे खोज खोज खोज

हाय हाय रंंगीन

मेरा सैयां नमकीन

मज़ेदार मारवाड़ी का नौकर झक्‍कास

पीये कैंपाकोला लगे उसको जो प्‍यास

भारी बज्‍जर गिरे करे मेम संग रास

धोखेबाज बीए पास चालबाज बीए पास

बड़ा बतिया महीन

मेरा सैयां नमकीन

No comments: